जनादेश

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पर रात का खीरा तो पीड़ा !

 पूर्णिमा अरूण

 सेहत जीवन की पहली जरूरत है.सेहत के बिना न काम करने को जी करता है,न मनोरंजन.बल्कि आजकल हम दर्द को भुलाने के लिए  ही टीवी के आगे बैठ जाते हैं.हमारे जीने के तौर तरिकों में जो तब्दीली आयी है उसने सेहत को नुकसान ही पहुँचाया है.भागते दौड़ते खाना, वक्त बेवक्त खाना,कुछ भी खा लेना, देर रात को खाना ऐसी आदतों ने सेहत का बेड़ा गरक कर दिया है.उस पर तुर्रा यह कि बीमार होने पर डॉक्टर के यहाँ तुरन्त पहुँच जाते हैं.गोया डॉक्टर ही आपकी सेहत के लिए जिम्मेदार है या उसी के पास आपके सेहत की कुंजी है.

 अब सवाल ये है कि सेहत को अपने बस में किया कैसे जाए ? क्या हम ऐसा कर सकते हैं ? क्यों नहीं ? आखिर हमारे बुजुर्ग भी तो सेहतमंद जिन्दगी जीते थे.अपने बचपन में झाँक कर देखिए ,आपकी छोटी-मोटी तकलीफें तो घर की दादी-नानी ही ठीक कर देती थी अपने घरेलु नुस्खों से.आज भी अगर भूले भटके अजमाते हैं तो कारगर ही साबित होते हैं.हमारी पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच की पीढ़ी ने कुछ घपला तो किया ही है,जाने-अनजाने घर की वैद्यगीरी डॉक्टर के हाथों चली गई.और आधुनिक इलाज के चक्रव्यूह में फँस गए जिसमें बीमारी को बस दवाईयों की हिफाजत में रखा जाता है ताकि जिन्दगी चलती रहे.लेकिन जीवन का नूर चला जाता है.भारत में तो कमोबेश ऐसा ही है.जिनके पास पैसा है वे बीमा कम्पनियों की मदद से बड़े-बड़े बजट में आधुनिक तरिके से इलाज करवाते ही रहते हैं.लेकिन जिनकी झोली इतनी भरी न हो वे क्या करें?

  एक ही रास्ता नज़र आता है- जीवन को भरपूर जीने के लिए हमें फिर से सेहत को अपने हाथों में लेना होगा .स्वस्थ रहने के लिए स्वयं ही जिम्मेवार होना पड़ेगा.इसके लिए कुछ लिखना-पढ़ना-समझना जरूर पड़ेगा.लेकिन यह इतना मुश्किल भी नहीं है.आयुर्वेद के कुछ सूत्रों को समझना होगा जो हमारे बुजुर्ग जानते थे,अपनाते थे.अगली पीढ़ी को समझाते भी रहते थे जिसे हम टोका टोकी समझते रहे.मसलन- 'अरे! रात में खीरा खा रहे हो? अरे भई सुबह का खीरा हीरा,दिन का खीरा खीरा और रात का खीरा पीड़ा '.कभी भी घर से बाहर निकलने से पहले दूध पीने को नहीं दिया जाता था.मौसम के अनुसार सब्जी फल खाएं जाते थे.सिर्फ खाने पर ही नहीं उपवास का भी ध्यान रखा जाता था.और उपवास भी आज जैसा नहीं,पूरे नियम धरम से.सोचेंगें तो ऐसे ही कितनी बातें याद आ जाएंगी.जिनका आधार आयुर्वेद ही रहा है.सेहत से जुड़े ये जुमलें अपने-अपने इलाकों ,अंचलों के हिसाब से प्रचलित थे.कुछ सार्वभौम भी थे.अगर हम इन्हें समझ लें तब सेहत हमारे बस में आ जाएगी.लेकिन इन्हें समझने से पहले आयुर्वेद के सूत्रों को समझना होगा ताकि आज का तर्कशील युवा उसे अपना सके. सेहत और स्वाद संवाद में आयुर्वेद के सूत्रों की सरलतम चर्चा होगी जिन्हें आप सरलता से अपना सकते हैं.

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