जनादेश

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शाहनजफ़ इमामबाड़ा में ईद-ए-ज़हरा !

डा शारिक़ अहमद ख़ान

लखनऊ .आओ सफ़र-ए-इश्क़ पर चलें.शाहनजफ़ इमामबाड़ा लखनऊ में आज ईद-ए-ज़हरा पर मेला लगा हुआ है.बेग़म साहिबा ने कहा कि सुना है आज आपका त्योहार है.सुबह से आपने धूम मचा रखी है.कई कर्मचारियों को ये कहकर छुट्टी दे दी कि ईद-ए-ज़हरा पर छुट्टी का एलान किया जाता है.हमने तो पहली बार इस त्योहार का नाम सुना है.हमें भी मेला दिखाएँ.हमने कहा सब त्योहार हमारे हैं.सबके मेले हमारे मेले हैं.हम मेले में आपको लेकर चलेंगे लेकिन स्कूटर से चलेंगे.बहरहाल,स्कूटर से शाहनजफ़ इमामबाड़े में पहुंचे.हमने अपनी स्कूटर वहाँ बिछी कार्पेट पर दौड़ा दी और सीधे मेले में घुसकर स्कूटर पार्क कर दी.लोग हैरत से देखने लगे.एक साहब दौड़कर आए और पूछा कि आप कौन साहब हैं.हमने कहा हम डॉक्टर साहब हैं.उन्होंने कहा आपका नाम हमने बहुत सुना है,पहली बार देखा,मंच पर शारिब रूदौलवी साहब आ गए हैं.हमने कहा आने दीजिए.अब मेले में घूमने निकले.एक युवक पेंसिल स्केच वाली तस्वीरें बना रहा था,कहने लगा बीस मिनट में बना देंगे अगर आप बैठेंगे.हमने उसी की तस्वीर खींच ली और आगे बढ़े.मंच से एक वक्ता बोल रहे थे,उनको कोई सुन ही नहीं रहा था,उन्होंने कहा कि मैं सीरिया से आ रहा हूँ,वहीं पढ़ाता हूँ.हमने सोचा कोई आलिम होंगे.लेकिन आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि जो मेरी चाय की पत्ती से साल भर में बारह किलो चाय बनाकर पिएगा,उसको हम लकी ड्रा में शामिल करेंगे.लकी विनर को उमरा कराएंगे.ख़ैर,मेले में तरह-तरह की स्टालें थीं.तनज़ीमुल मकातिब की किताबें भी बिक रही थीं और सेल्फ़ी ज़ोन भी एक स्टाल पर बना था.एक बूढ़ी महिला एक युवती से कह रही थी कि अगली बार अगर तुम बिना सिर पर दुपट्टा रखे दिखीं तो तुम्हारी ख़ैर नहीं.चंद बरसों से लग रहा ये मेला ख़दीजा ट्रेड फ़ेयर के नाम से भी है लिहाज़ा कई तरह के व्यापारी अपनी दुकानें सजाए बैठे थे.मेले में एक बच्चा मेरे पास आया और उसने एक किताब दी,कहा इंग्लिश है,आप पढ़िए,मुफ़्त है,हमने किताब ले ली.खाने की नियामतों में मुर्ग़ बम,ज़ाफ़रानी गुलगुले,सींक कबाब,बिरियानी,खीर,पेशावरी चपली कबाब,फ़्राई रोहू,कुल्फ़ी और कप केक वग़ैरह का लुत्फ़ लिया.एक परिचित भी फ़ेमिली के साथ मिल गए.फिर थोड़ी-बहुत ख़रीददारी की और शाहनजफ़ इमामबाड़े के मुख्य भवन में आए.वहाँ लॉन में शमाँ रोशन थी और अगरबत्तियाँ एक अलम के नीचे जल रही थीं.मन्नत मानने वाले अलम पर एक हाथ रखकर मन्नत मान रहे थे,उनका कहना था कि यहाँ मुराद पूरी होती है.मेले में महिलाएं ख़ूब मेकअप में नज़र आ रही थीं जो हिजाब बांधे थीं.दो महीने और आठ दिन के बाद आज शिया महिलाएं सजती हैं और पुरूष भी सजे-संवरे नज़र आते हैं.

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