जनादेश

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जेएनयू में यह सब क्यों हो रहा है.

उर्मिलेश 

अपने देस-समाज में सब लोग पहले कहां पढ़ते-लिखते थे. पढ़ने-लिखने की उन्हें न इजाजत थी और न हैसियत. सिर्फ राजे-महराजे, बड़े जमींदार, द्विज और अन्य कुलीन परिवार के लोग ही पढ़ने जाते थे. अपने मौजूदा हिन्दुत्ववादी शासक जिस प्राचीन भारत पर बहुत गर्व करते हैं, उसका बड़ा हिस्सा ऐसा ही था. शिक्षा का अधिकार सीमित था। मध्य काल में भी वह सिलसिला काफ़ी हद तक जारी रहा. ब्रिटिश काल में सिलसिला टूटता नजर आया और आजादी के बाद शिक्षा का यह क्षेत्र चंद लोगों के एकाधिकार से मुक्त हुआ. अवर्ण, गैर-कुलीन और सबाल्टर्न हिस्सों से पढ़ने वालों की संख्या हर साल बढ़ती गई. आजादी के बाद के शासकीय प्रयासों के अलावा ज्योति बा फुले, पेरियार और डॉ अम्बेडकर की शिक्षाओं और आह्वानों का भी जबरदस्त असर पड़ा..

इससे मनुवादी और हिन्दुत्ववादी मान-मूल्यों को गंभीर चुनौती मिलने लगी. समाज में समता, सुसंगत लोकतंत्र और सौहार्द्र की लिए आवाजें उठने लगीं. शिक्षा ने सदियों से दबे-कुचले लोगों की दुनिया ही बदल दी. वे अपनी दुनिया को अौर अच्छी बनाने के लिए आगे बढ़ने लगे. यह बात 'कुछ खास लोगों' को भला कैसे अच्छी लगती?

अपने मुल्क में आज ऐसे ही 'खास लोगों' के पास सत्ता है, जो भारत को पुराने जमाने वाला 'हिन्दुस्थान' बनाना चाहते हैं, जहां पढ़ना-लिखना, खासकर उच्च शिक्षा 'कुछ ही लोगों' तक सीमित रहे. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में इस वक्त जो कुछ हो रहा है, वह भारत को 'हिन्दुस्थान' बनाकर सदियों पीछे ले जाने के 'मनुवादी प्रोजेक्ट' का हिस्सा है. आगे बहुत कुछ होना बाक़ी है.

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