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पित्त से बढ़ता है बीपी,आंवला खाएं!

पूर्णिमा अरुण 

आपकी जान पहचान में ऐसे एक-दो जन जरूर होंगे जो खूब खाते हैं और मोटे नहीं होते.असल में झ्नका मेटाबॉलिक रेट ज्यादा होता है. यानि शरीर को अपने भीतरी क्रियाकलापों के लिए ज्यादा ऊर्जा चाहिए होती है. अतः ये जितना भी खायें पच जाता है और पचे भोजन से बनी ऊर्जा खप जाती है तो मोटापा नहीं चढ़ता. ऐसा पित प्रकृति की वजह से होता है.

पित प्रकृति को सामान्यतः ऐसिडिटी के रूप में समझा जाता है. जब पेट में जलन महसूस होती है.लेकिन यह पित का प्रकोपित रूप है.वास्तव में पित वो बला है जो हमें कर्मठ बनाती है.सक्रिय रखती है. इसकी कमी या अधिकता रोग का कारण बनती है.जिनकी पित प्रकृति कम होती है उनका पाचन कमजोर होता है,जिससे शरीर बलवान नहीं बन पाता.वर्षा ऋतु में पित का संचय होता है. वर्षा ऋतु की वात को कम करने के लिए अजवाइन की गर्म गर्म पकौड़ी खायी जाती है ,मौसम में उमस भी होती है फलस्वरूप शरीर में पित का संचय हो जाता है.यह पित शरद ऋतु मैं प्रकोपित होता है यानि अपना प्रभाव दिखाता हैं. इसलिए शरद ऋतु पितकारी मानी जाती है. सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक तथा रात्रि में भी 10 बजे से 2 बजे तक का समय पित का होता है. उम्र के हिसाब से युवावस्था 18 से  40 वर्ष तक की पित प्रमुख मानी जाती है.

पितकारी शरद ऋतु,दिन व रात के 10 से 2 बजे तक का समय और युवावस्था में पित बढ़ाने वाला भोजन नहीं खाना चाहिए बल्कि पित कम करने वाला खाना चाहिए. पितवर्धक भोजन गर्म,कटु(तीखा),खट्टा और नमकीन रस वाला होता है. जबकि ठंडा,मीठा,तिक्त(कड़वा)और कसैले रसवाला भोजन पितनाशक होता है. एसिडिटी को शांत करता है.

व्यवहार में ज्यादा गुस्सा होना पित प्रवृति का सूचक है. 'गुस्से में क्यों अपना खून जला रहे हो' यह बात जब तब सुनने को मिलती ही रहती है जोकि सोलह आने सच है. पित बढ़ने से बल्ड प्रेशर ,सिर दर्द,नकसीर फूटना,फोड़े फूंसी निकलना ,पेट में जलन होना आदि रोग होते हैं. जब खून में भी एसिडीटी बढ़ जाती है तो कई असाध्य रोग हो सकते हैं. पित की अधिकता से पागलपन भी हो सकता है. इनसे बचने के लिए पित को संतुलित रखना जरूरी है.हमारी परम्परा में पितकारी शरद ऋतु के उत्सवों में खीर जरूर बनती है. शरद पूर्णिमा के दिन की खीर का तो विशेष महत्व है. चांदनी की शीतलता से ठंडी हुई खीर पित को शांत कर देती है.इस दौरान होने वाले दीपोत्सव में मिष्ठानों की भरमार रहती है. कार्तिक की अक्षय नवमी आंवला नवमी के नाम से भी जानी जाती है. कसैले स्वाद का आंवला पित को शांत करने वाला अनोखा फल है. इसलिए परम्परा में इसकी पूजा का दिन तय किया गया है. इसके अलावा देशी गाय का घी पित को संतुलित करता है. उड़द और कुलथ की दालों को छोड़ कर बाकि दालें पित प्रवृति वाले लोग खा सकते हैं. मीठी छांछ (लस्सी) भी लाभ करती है.लेकिन पित वालों को सूखे मेवे (बादाम,अखरोट आदि)भिगोने के बाद ही खाने चाहिए. आम,खरबूजे आदि फलों का भी पानी में काफी देर भिगोने के बाद ही सेवन करना चाहिए. नहीं तो फोड़े फुंसी निकल ही आते हैं या दस्त लग जाते हैं.  व्यवहार में सहनशीलता बढ़ा कर मन में सब्र का भाव लाने से पित प्रवृति  संतुलित होती है.इसके लिए प्राणायाम व शवआसन कारगर तरिके हैं.कर देती है.इस दौरान होने वाले दीपोत्सव में मिष्ठानों की भरमार रहती है. कार्तिक की अक्षय नवमी आंवला नवमी के नाम से भी जानी जाती है. कसैले स्वाद का आंवला पित को शांत करने वाला अनोखा फल है. इसलिए परम्परा में इसकी पूजा का दिन तय किया गया है. इसके अलावा देशी गाय का घी पित को संतुलित करता है. उड़द और कुलथ की दालों को छोड़ कर बाकि दालें पित प्रवृति वाले लोग खा सकते हैं. मीठी छांछ (लस्सी) भी लाभ करती है.लेकिन पित वालों को सूखे मेवे (बादाम,अखरोट आदि)भिगोने के बाद ही खाने चाहिए. आम,खरबूजे आदि फलों का भी पानी में काफी देर भिगोने के बाद ही सेवन करना चाहिए. नहीं तो फोड़े फुंसी निकल ही आते हैं या दस्त लग जाते हैं.  व्यवहार में सहनशीलता बढ़ा कर मन में सब्र का भाव लाने से पित प्रवृति  संतुलित होती है.इसके लिए प्राणायाम व शवआसन कारगर तरिके हैं.

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