खमीरी खानों की खूबी और खुमार

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खमीरी खानों की खूबी और खुमार

जनादेश ब्यूरो 

खमीरी खानों का अलग स्वाद होता है. मुगलई नान में भी खमीर की महक को महसूस किया जा सकता है तो दक्षिण के इडली-डोसा के जरिए भी इसका जायका लिया जा सकता है. फिर कश्मीरी खमीरी रोटियां हों या ओड़ीशा का पखाल या गली-चौराहों पर बिकती जलेबियां, खमीर के बिना इनका लुत्फ कहां. खमीरी व्यंजन लोकप्रिय तो हैं ही, सेहत के लिए भी इन्हें बेहतर माना जाता है. देश के विभिन्न हिस्सों में खमीरी व्यंजन रोज के भोजन का हिस्सा है. आदिवासी से लेकर शहरी समाज तक में खमीरी व्यंजन खूब चाव से खाया जाता है. जनादेश चर्चा में रविवार को भोजन के बाद-भोजन की बात कार्यक्रम में खमीरी व्यंजनों पर चर्चा हुई. चर्चा का संचालन किया पत्रकार आलोक जोशी ने और इसमें हिस्सा लिया खानपान विशेषज्ञ पूर्णिमा अरुण, बर्लिन से अंजना सिंह (जर्मनी), शेफ अनन्या खरे और जनादेश के संपादक अंबरीश कुमार ने. बातचीत की शुरुआत करते हुए अंबरीश कुमार ने कशमीर से बात शुरू की और कहा कि खमीरी रोटी का स्वाद वहां लिया. हालांकि बचपन में हम लोग गुलगुले खूब चाव से खाते थे. वह भी खमीरी ही होते थे. रात में जो आटा बचता था उसे गुड़ में मिला कर बनाया जाता था. फिर उत्तर भारत की जलेबियों, यह एक तरह से खमीरी व्यंजन है. पूर्वोत्तर भारत में खमीरी खानों का बहुत इस्तेमाल होता है. देश के विभिन्न हिस्सों में खमीरी खानों का खूब प्रचलन है तो पंजाब में चले जाएं तो कुलचे हैं. तो खमीरी खाना हमारे जीवन में कई तरह से हस्तक्षेप करता जा रहा है. वैसे खमीरी खानों को लेकर भ्रम भी है तो इस पर पूर्णिमा जी बेहतर बता सकती हैं क्योंकि एक दर्शक ने कहा है कि खमीरी खानों की वजह से गैस वगैरह की उन्हें शिकायत हो गई.

पूर्णिमा बर्मन ने बातचीत को आगे बढ़ाते हुआ कहा कि जिन्होंने खमीर से गैस होने की बात कही है, मैं इसे सही नहीं मानती कि खमीर से ऐसा हुआ होगा. क्योंकि जब हम आटे का खमीर बनाते हैं तो उनमें कुछ ऐसे एनजाइम बनते हैं जो हमारे पाचन को सरल बनाते हैं. इसलिए ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि खमीरी रोटी खाने के बाद आपको गैस हो जाए. यह हो सकता है कि खमीर सही नहीं बना हो या फिर ज्यादा खा लिया हो या समय पर भूख न लगने पर बिना भूख के ही खाना खा लिया हो, ऐसा भी हो सकता है. आलोक जोशी ने कहा कि खाना तो इस पर भी निर्भर करता है कि आपकी अपनी स्थिति क्या है, आपके पेट का हाल क्या है. कई बार बहुत अच्छी चीज खाने पर भी वह नुकसान पहुंचाती है. लेकिन हमारे यहां तो खमीर का सबसे बड़ा इंग्रिडियेंट हैं, उसका जिक्र अंबरीश जी ने नहीं किया, वह है दही. दही खमीर ही तो है. पूरे भारत में ही नहीं दुनिया भर में यह खाया जाता है. बल्कि विदेश में था तो वहां मुझे तकलीफ होती थी, वहां बायो योगर्ट बोलते हैं उसमें जो खमीर के तत्व होते हैं वह कंट्रोल्ड होते हैं, दही जमाने के बाद वह खत्म हो जाते हैं उससे फिर दही नहीं जमाया जा सकता. उसे सिर्फ खाया जा सकता है. कई दिनों तक रहते है, काफी जायकेदार होता है और खट्टा नहीं होता लेकिन उससे फिर आप नया दही नहीं जमा सकते. पूर्णिमा जी ने कहा कि उस दही से खमीर का काम नहीं लिया जा सकता. सिरका के साथ भी ऐसा ही है. सिरका बनने के बाद यीस्ट या जो फंग्स है वह अपने आप खत्म हो जाता है.


अंजना सिंह ने पश्चिमी दुनिया के समाज में खमीर का जिक्र करते हुए कहा कि यहां तो दैनिक जीवन में खमीर के बिना हम सोच भी नहीं सकते क्योंकि शुरुआत ब्रेड से होती है. जिस तरह भारत में दही के लिए जोड़न मांगा जाता है वैसे ही यहां हम ब्रेड के लिए खमीर मांगते हैं. या तो हम इसे खरीदते हैं या फिर किसी ने बनाया है तो उनसे थोड़ा सा लेकर अपने लिए इस्तेमाल करते हैं. यहां तो अब सब्जियों को फ्रमेंटेशन करके खाते हैं और यह प्रचलन बढ़ रहा है. प्रचलन बढ़ा है क्योंकि उसमें लैकिटक एसिड बैक्टेरिया होती हैं और वह पेट के लिए अच्छा होता है, इसलिए काफी लोग इस तरफ ध्यान दे रहे हैं. तो खमीरी खाना काफी प्रचिलत है जो हर रूप में यहां मिल जाएगी.

अन्नया खरे ने बताया कि नए जमाने में खमीर का इस्तेमाल बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि बायोटेक योगर्ट या ग्रीक योगर्ट का भी प्रचलन बढ़ रहा है. लोगों को पसंद आ रही हैं यह चीजें क्योंकि उन्हें लग रहा है कि यह सेहत के लिए भी मुफीद हैं. आजकल तो फ्रोजन योगर्ट भी बहुत ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है. आइस्क्रीम की जगह इसका इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है क्योंकि लोगों को एक बेहतर विकल्प मिल गया है. इसके अलावा होटल में तंदूर में जितने भी कुलचा हो, नान हो, भटूरे हो या रोटी खमीर से ही बनाई जाती हैं. फिर बेकरी में केक वगैरह का इस्तेमाल होता है. पूर्वोत्तर में तो लगभग हर खाने में लगभग खमीर का इस्तेमाल होता है. 


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