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महाराष्ट्र छोड़िए अब बंगाल और बिहार देखिए !

बंगाल में ममता ने छीन ली सीट 

रीता तिवारी

कोलकाता.पश्चिम बंगाल में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा को करार झटका देते हुए उपचुनाव में विधानसबा की तीनों सीटें जीत ली हैं. वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावो में इनमें से कांग्रेस, भाजपा और तृणमूल कांग्रेस को एक-एक सीट मिली थी. खड़गपुर सदर सीट भाजपा के लिए नाक का सवाल थी. पिछली बार प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने यह सीट जीती थी. उनके इस्तीफे से खाली हुई यह सीट अबकी तृणमूल कांग्रेस के प्रदीप सरकार ने 20 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीती है. तृणमूल कांग्रेस ने खड़गपुर और उत्तर दिनाजपुर जिले कालियागंज सीट पहली बार जीती है.

तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष औऱ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उपचानव के नतीजों के बाद पत्रकारों से बातचीत में कहा कि यह जनता और विकास की जीत है. बंगाल में किसी भी राजनीतिक दल की हेकड़ी नहीं चलेगी. इन नतीजों ने भाजपा को सत्ता के उन्माद और राज्य के लोगों के अपमान का करारा जवाब दिया है. चुनावी नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कांग्रेस और वामपंथी दल बंगाल में अप्रासंगिक हो चुके हैं. इन दोनों दलों ने तीन साल बाद एक बार फिर मिल कर चुनाव लड़ा था. लेकिन उनकी किस्मत नहीं बदली.


यह उपचुनाव खासकर सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस और उसे टक्कर देने वाली भाजपा के लिए कड़ी चुनौती थे. बीते लोकसभा चुनावों के बाद यह पहला मौका था जब यह दोनों राजनीतिक दल चुनावी मैदान में एक-दूसरे के आमने-सामने थे. भाजपा के सामने इन चुनावों में जहां लोकसभा के प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती थी वहीं तृणमूल कांग्रेस इन तीनों सीटों को जीत कर अपने पैरों तली खिसकती जमीन को बचाने का प्रयास कर रही थी. कांग्रेस और माकपा ने इन उपचुनावों में मिल कर लड़ने का फैसला किया है. इसके तहत कांग्रेस खड़गपुर व कालियगंज सीटों पर मैदान में थी और वाममोर्चा खड़गपुर सीट पर. लेकिन दोनों को तीसरे स्थान से ही संतोष करना पड़ा.

दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल में राज्यपाल जगदीफ धनखड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेत्तव वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार के बीच तल्खी लगातार बढ़ रही है. धनखड़ ने बीती जुलाई में राज्यपाल के तौर पर कार्यभार संभाला था. उसके बाद शायद ही कोई दिन ऐसा बीता है जब उनके औऱ तृणमूल कांग्रेस के साथ विवाद नहीं हुआ हो. तृणमूल कांग्रेस के लोग राज्यपाल के काले झंडे भी दिखा चुके हैं. ऐसा बंगाल में शायद पहली बार हुआ है.


धनकड़ का कहना था कि वह राज्य के संवैधानिक प्रमुख हैं और उनके पद का सम्मान किया जाना चाहिए. उसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने राज्यपाल पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि वे सरकारी अधिकारियों के खिलाफ राजनीतिक बयान दे रहे हैं. तृणमूल महासचिव पार्थ चटर्जी ने कहा कि राज्यपाल को बंगाल के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाना चाहिए. संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति की वेबजह अति-सक्रियता और सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप उचित नहीं है.


जादवपुर विश्वविद्यालय में केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के वामपंथी छात्र संगठनों की ओर से घेराव और उसके बाद उनको बचाने के लिए राज्यपाल के मौके पर जाने के बाद यह टकराव चरम पर पहुंच गया. राज्यपाल ने इस घटना को राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति का गंभीर प्रतिबिंब बताया था. तृणमूल कांग्रेस ने तब दावा किया था कि राज्यपाल पुलिस और सरकार को सूचित किए बिना ही विश्वविद्यालय चले गए थे. लेकिन राजभवन से जारी बयान में कहा गया था कि राज्यपाल ने चांसलर के तौर पर वहां जाने का फैसला किया. वह भी पर्याप्त इंतजार करने और तमाम विकल्प आजमाने के बाद. राज्यपाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी कई बार बात की थी.

तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी ने दावा किया था कि ममता बनर्जी के मना करने के बावजूद राज्यपाल जादवपुर विश्वविद्यालय पहुंच गए. चटर्जी ने उस समय भी राज्यपाल पर पक्षपात का आरोप लगाया था. लेकिन अगले दिन रपाजभवन की ओर से जारी एक बयान में पार्थ चटर्जी के आरोप का खंडन करते हुए कहा गया कि राज्यपाल ने जो भी किया वह चांसलर के नाते संस्थान की गरिमा को बचाने के लिए किया.


हुगली जिले में दुर्गापूजा के दौरान एक पंडाल के उद्घाटन के दौरान राज्यपाल ने किसी का नाम लिए बिना कहा कि लोगों को लक्ष्मण रेखा पार किए बिना अपनी ड्यूटी करनी चाहिए. मैं कभी लक्ष्मणरेखा पार नहीं करूंगा. लेकिन आप सबको भी इसका ख्याल रखना चाहिए. तृणमूल के स्थानीय सांसद कल्याण बनर्जी कहते हैं कि राज्यपाल बीजेपी में रहे हैं. इसलिए उनको पहले बीजेपी के लोगों को इस मंत्र का पालन करने की सीख देनी चाहिए. वे हाल में बंगाल आए हैं और उनको राज्य के बारे में बहुत कम जानकारी है.

वैसे, इससे पहले भी खासकर हिंसा और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर पूर्व राज्यपाल केसरी नात्र त्रिपाठी के साथ भी सरकार का टकराव होता रहा था. त्रिपाठी के कार्यकाल के आखिरी दौर में तो यह चरम पर पहुंच गया था. तत्कालीन राज्यपाल ने सरकार पर अल्पसंख्यकों को तुष्किरण का आरोप लगाते हुए कहा था कि इससे राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव का माहौल खराब हो रहा है. शायद यही वजह थी कि उनको विदा करने मुख्यमंत्री ममता नहीं पहुंची. केसरी नाथ ने ममता के नहीं आने पर दुख भी जताया था.


ममता ने धनखड़ का नाम लिए बिना कहा था कि संवैधानिक पदों पर बैठे कुछ लोग भाजपा प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं. ममता बनर्जी ने धनखड़ पर समानांतर सरकार चलाने का भी आरोप लगाया था.  इस पर पलटवार करते हुए राज्यपाल ने कहा कि कुछ लोग अपनी जुबान ज्यादा ही चला रहे हैं और इस पर लगाम नहीं लगा रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद वह राज्य में लोगों की सेवा करने से पीछे नहीं हटेंगे.


राज्यपाल ने मालदा जिले के फरक्का में एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सरकार से हेलीकाप्टर मुहैया कराने की पील की थी. लेकिन सरकार ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया. नतीजतन धनकड़ को आज लगभग छह सौ किमी का सफर सड़क मार्ग से ही करना पड़ा. धनकड़ ने ममता बनर्जी सरकार पर हमला करते हुए कहा था कि किसी को भी लक्ष्मण रेखा पार नहीं करनी चाहिए. ममता बनर्जी सरकार के मंत्रियों को लताड़ते हुए उनका कहना था कि वे अपनी बॉस को खुश करने के लिए उनके बयानों पर प्रतिक्रिया जताने की बजाय अपने विभागों पर ध्यान दें.


उन्होंने कहा कि उनके बयानों पर या तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद प्रतिक्रिया दें या फिर इस काम के लिए एक विशेष मंत्री की नियुक्ति करें. राज्यपाल ने कहा कि सभी मंत्रियों को महज अपनी बॉस (ममता बनर्जी) को खुश करने के लिए मेरे बयानों पर प्रतिक्रिया जताना बंद कर अपने विभागों पर ध्यान देना चाहिए. धनखड़ ने बुधवार को आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संविधान दिवस के मौके पर विधानसभा के विशेष अधिवेशन में जाने पर उनके प्रति बेरुखी दिखाई और सामान्य शिष्टाचार तक नहीं निभाया. धनखड़ ने कहा कि ममता बनर्जी के रवैए से उनको धक्का लगा है.

उन्होंने कहा कि संविधान दिवस के मौके पर विधानसभा परिसर में पहुंचने या डा. अंबेडकर को श्रद्धांजलि देने के लिए जाते समय ममता ने काफी बेरुखी दिखाई और अभिवादन के लिए आगे नहीं आईं.इन दोनों नेताओं के रुख से साफ है कि राजभवन औऱ राज्य सचिवालय में निकट भविष्य में खाई कम होने के आसार कम ही हैं.फोटो साभार 


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