एचआइवी के शिकंजे में पटना जिला

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एचआइवी के शिकंजे में पटना जिला

आलोक कुमार 

पटना.आज सूबे के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सही मार्गदर्शन में स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत से लेकर चिकित्सक और कर्मी शानदार ढंग से वैश्विक कोरोना से मुकाबला कर रहे हैं.इनका सभी तरह का पर्व व छुट्टी कोरोना को खदेरने में लगा है.इसका मतलब कदापि नहीं है कि अन्य बीमारियों की ओर ध्यान नहीं देते हैं.सभी तरह का कार्य व्यवस्थित ढंग से की जा रही है.आज उन्होंने सात नये एआरटी सेंटर का उद्घाटन किया.

बताते चले कि प्रदेश में एचआइवी (ह्यूमन इम्यूनो डिफिशिएंसी वायरस) का शिकंजा कसता जा रहा है.पांच साल में इस रोग  के पीड़‍ितों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है.किसी भी अन्य जिले से दोगुने संक्रमितों के साथ पटना पहले स्थान पर है. इसके बाद मधेपुरा , सुपौल , पूर्णिया , बांका , सहरसा , नवादा , बांका ) जैसे उन 12 जिलों का स्थान है, जहां के लोग रोजगार  के लिए दूसरे राज्यों में ज्यादा  जाते हैं.


राज्य एड्स कंट्रोल सोसाइटी  के संयुक्त निदेशक आइएएस मनोज कुमार सिन्हा ने कहा कि 2016 में 29 हजार 715 से 2020 में संक्रमितों  की संख्या 60 हजार 544 होने का कारण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों  तक जांच  सुविधा को मानते हैं.वहीं युवाओं में संक्रमण का बड़ा कारण जानकारी का अभाव, इस अवस्था में अधिक ऊर्जा के संचार, कुछ रोमांचकारी करने का पागलपन और इंजेक्टेबल ड्रग्स  को मानते हैं.

एड्स कंट्रोल सोसाइटी के जांच अभियान में 32.48 लाख गर्भवती महिलाओं में से 689 एचआइवी पॉजिटिव मिली हैं. वहीं  6.94 लाख अन्य आशंकितों में से 11 हजार की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी.94 फीसद असुरक्षित यौन संबंध से 03 फीसद संक्रमित माता से बच्चों में 0.1 फीसद संक्रमित खून से 0.9 फीसद संक्रमित सुई से.


बिहार नेटवर्क फॉर पीपल लिविंग विद एचआइवी-एड्स सोसाइटी के अध्यक्ष ज्ञानरंजन ने बताया कि पीएमसीएच में कई जिलों के करीब 45 सौ संक्रमित पंजीकृत हैं. इनके इलाज के लिए यहां केवल एक डॉक्टर हैं और हर दिन करीब तीन से चार सौ लोग इलाज के लिए आते हैं.वहीं डाटा ऑपरेटर व अन्य कर्मचारियों की कमी से कई समस्याएं होती हैं. वहीं महिला संक्रमितों के इलाज के लिए पूरे प्रदेश में दरभंगा को छोड़ कर किसी एआरटी सेंटर में महिला डॉक्टर नहीं है.


बिहार में एड्स पीड़ितों के लिए सात नये एआरटी सेंटर खुला है. एक दिसंबर को विश्व एड्स दिवस के अवसर पर इनका उद्घाटन किया गया. ये एआरटी सेंटर मुंगेर, नालंदा, जमुई, सीवान, कैमूर, सुपौल और पूर्णिया जिले में खुले. पूर्व में इनकी कुल संख्या 20 थी जो कि अब बढ़ कर 27 हो गयी. यहां एड्स पीड़ितों की जरूरी जांच, काउंसेलिंग, इलाज और नि:शुल्क दवा दी जाती है.



इन सेंटरों पर ही सीडी 4 जांच होती है जिसके बाद डॉक्टर निर्णय लेते हैं कि इन्हें एआरटी दवा शुरू करनी है कि नहीं. अगर मरीज को दवा देने की जरूरत महसूस की जाती है तो उसका एआरटी सेंटर पर ही रजिस्ट्रेशन किया जाता है और सरकार की ओर से उन्हें मिलने वाली चिकित्सीय सहायता-काउंसेलिंग इन्हीं सेंटरों के माध्यम से मिलती है.

मालूम हो कि भारत में एचआईवी का पहला मामला 1986 में सामने आया. इसके पश्चात यह पूरे देश भर में तेजी से फैल गया एवं जल्द ही इसके 135 और मामले सामने आये जिसमें 14 एड्स 2 के मामले थे.यहाँ एचआईवी/एड्स के ज्यादातर मामले यौनकर्मियों में पाए गए.इस दिशा में सरकार ने पहला कदम यह उठाया कि अलग-अलग जगहों पर जाँच केन्द्रों की स्थापना की गई.इन केन्द्रों का कार्य जाँच करने के साथ-साथ ब्लड बैंकों की क्रियाविधियों का संचालन करना था.बाद में उसी वर्ष देश में एड्स संबंधी आँकड़ों के विश्लेषण, रक्त जाँच संबंधी विवरणों एवं स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों में समन्वय के उद्देश्य से राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की गई।

दुनियाभर में एड्स के संक्रमण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है वहीं इस बीमारी से जिसकी मौत हो गई है उनका शोक भी मनाया जाता है.एड्स या एक्वायर्ड इम्यूनो डिफिशिएंसी सिंड्रोम एक महामारी रोग है जो ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस  के कारण होता है. विश्व एड्स दिवस को दुनियाभर में मनाने की शुरुआत अगस्त 1987 में की थी

 इस साल के विश्व एड्स दिवस की थीम है  वर्ल्ड एड्स डे मनाने का उद्देश्य हर उम्र के लोगों के बीच इस बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ाना है. अनुसार दुनियाभर में अब तक 36.9 मिलियन से ज्यादा लोग  शिकार हो चुके हैं जबकि भारत सरकार द्वारा जारी किए गए आकड़ों के अनुसार भारत में एचआईवी के रोगियों की संख्या लगभग 2.7 मिलियन के आसपास है.बता दें कि किसी भी अन्य बीमारी की तरह एचआईवी एड्स के भी कुछ लक्षण होते हैं, जो उसकी शुरूआत के संकेत देते हैं.




बता दें कि चुनाव आचार संहिता का बहाना कर एड्स रोगियों को राशि भुगतान नहीं जा रहा था.एड्स कंट्रोल सोसाइटी में सी.एस.टी. (केयर सपोर्ट ट्रीटमेंट) के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. राजेश कहते हैं कि अक्टूबर तक की राशि खाता में भेजी जा रही है.मरीजों के एफिडेविट मिलने में देर हुई है. चुनाव आचार संहिता भी वजह है.यह राशि समाज कल्याण विभाग से आती है.बिहार की बड़ी आबादी को देखते हुए नये सेंटरों की जरूरत काफी दिनों से महसूस की जा रही थी. बिहार एड्स कंट्रोल सोसाइटी से मिले आंकड़ों के मुताबिक राज्य में करीब 62 हजार एड्स पीड़ित हैं जबकि एचआइवी संक्रमितों की संख्या करीब एक लाख 14 हजार है.

राज्य के एड्स पीड़ित मरीजों के लिए एक दिसंबर राहत लेकर आया है. इस अवसर पर स्वास्थ्य विभाग की इकाई बिहार एड्स कंट्रोल सोसाइटी की ओर से राज्य के हजारों एड्स पीड़ितों की नौ महीने से बकाया राशि उनके बैंक अकाउंट में ट्रांसफर की जायेगी. पिछले नौ महीने से इन एड्स पीड़ितों को हर महीने मिलने वाली 1500 रुपये की राशि नहीं मिल रही थी. यह उन्हें भोजन और दूसरे खर्चों के लिए दी जाती है. राशि समाज कल्याण विभाग सोसाइटी को देता है और फिर सोसाइटी की ओर से एड्स पीड़ितों को भेजी जाती है.

प्राप्त सूचना के मुताबिक विभाग की ओर से महीनों से यह राशि नहीं मिलने के कारण यह अब तक बकाया थी. बिहार शताब्दी एड्स पीड़ित कल्याण योजना के तहत फरवरी 2020 से लेकर अक्तूबर 2020 तक की अवधि के नौ महीने की कुल राशि 36.11 करोड़ उनके खातों में हस्तांतरित की जायेगी. बिहार शताब्दी एड्स पीड़ित कल्याण योजना के लाभुकों के खातों में फरवरी 2020 से लेकर अक्तूबर 2020 तक की राशि डीबीटी के माध्यम से हस्तांतरित की जायेंगी.

आज 1 दिसंबर को 'विश्व एड्स दिवस' मनाया जा रहा है. इस गंभीर बीमारी से लड़ रहे लोगों की हौसला आफजाई का दिन है.लेकिन यह काम तब असंभव हो जाता है, जब एड्स पीड़ितों की देखभाल को मिलने वाली सरकारी सहायता राशि अपनी सरकारी चाल चलने लगती है.बिहार में एचआईवी पॉजिटिव मरीजों को मिलने वाली 'बिहार एड्स शताब्दी योजना' की राशि फरवरी के बाद से नहीं मिली है. यानी इस साल यह राशि नौ माह से नहीं मिली है.इस योजना के तहत वैसे एचआईवी मरीजों को प्रतिमाह पंद्रह सौ रुपए की राशि मिलती है जो एआरटी सेंटर से दवा लेते हैं.समाज कल्याण विभाग से यह राशि एड्स कंट्रोल सोसाइटी को जाती है और फिर मरीजों के बैंक खाते में. 27 नवंबर 2019 से यह राशि ऑनलाइन भेजी जा रही है.

यह राशि इसलिए दी जाती है कि एचआईवी पॉजिटिव मरीज ठीक से डाइट ले सकें.एचआईवी मरीजों को एआरटी सेंटर पर दवाएं तो मुफ्त मिलती हैं.साथ ही 1500 रुपए प्रतिमाह देने के पीछे का मकसद यह है कि काम-काज नहीं मिलने पर इस राशि से वे अपना जीवन- यापन कर सकें. अभी बिहार में 53 हजार ऐसे मरीज हैं जो रेगुलर दवा ले रहे हैं. यह राशि 18 साल से ऊपर के एचआईवी पॉजिटिव को दी जाती है. इससे कम उम्र के लोगों को परवरिश योजना के तहत एक हजार रुपए प्रतिमाह दिए जा रहे हैं.


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