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चलो सोनपुर का मेला तो देखें !

संजय कुमार

पटना. विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र, सोनपुर पशु मेला अपना ऐतिहासिक महत्व को खोता ही जा रहा है. 2003 में पशु-पक्षियों की बिक्री पर लगी रोक के बाद साल दर साल सोनपुर पशु मेला की रौनक फीकी होती जा रही है. पंजाब की गाय-बैल, असम-पश्चिम बंगाल की भैंस और देश के अन्य राज्यों के घोड़े और हाथी से कभी सोनपुर मेला गुलजार हुआ करता था. लेकिन इस साल मेला में नाम मात्र के गाय, घोड़ा और बकरी का बाजार लगा हैं. एक वक्त था जब सोनपुर मेला में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का घोड़ा पवन का जलवा हुआ करता था, तो कई बहुबलिओं के घोड़ें सोनपुर मेला में चर्चा का केंद्र हुआ करते थे.

घोडा, हाथी, ऊंट सहित देश के अन्य राज्यों से आये पशुओं को देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती थी. लेकिन इस बार मेला उदास है. पशु बाजार में गड़े खूंटों में पशुओं के पग नहीं लगे हैं. मेला के 15 दिन गुजर जाने के बाद भी खूंटों को पशुओं का इंतजार है. कभी आठ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगने वाला यह मेला मात्र दो वर्ग किलोमीटर में सिमट कर रह गया है. पशु बाजार के फीका रहने का प्रभाव, पशुओं लिए सामान बिक्री बाजार पर देखा गया. मुज्जफरपुर से आये कारीगर मोहनदास ने बताया कि पशु है नहीं ऐसे में पट्टा से लेकर पीठ पर रखने वाला गद्दा यूं  ही पड़ा हुआ है. और भी पहनावे नहीं बिक रहे हैं. वे बताते हैं कि पशु कोई हो उसके सजावटी पोषक एक समय खूब बिकते थे.


सोनपुर मेले में हाथियों की बिक्री बंद होने के बाद पशु मेला का  क्रेज कम होता चला गया.आंकड़े के मुताबिक 2007 के मेले में 77 हाथी आये थे. 2014 में 39, 2015 में 17, 2016 में 13 और 2017 में सिर्फ तीन हाथी मेले में दिखें.  2018 में केवल एक हथिनी मेले में थी. हाथी की बिक्री बंद होने के बाद स्थानीय लोग दो से तीन हाथी सिर्फ दिखाने के लिए बाजार में रखते हैं. इस बार वह भी नहीं दिखा. तो वहीँ, भैसों की बुकिंग पर रोक से भैंस बाजार भी खत्म हो गया है. स्थानीय लोगों की माने तो बैल भी अब नहीं आते. इसकी वजह है खेत अब मशीन के हवाले हो गया है. खेत में हल कम, टैक्टर ज्यादा चलते हैं. बात में दम भी था. लोहा बाजार में हल कम ही बिकते दिखें.   


सोनपुर मेला में पक्षियों का बाजार भी लगता था. हर तरह के पक्षी यहाँ मिलते थे लेकिन दो साल पहले बिहार के पर्यावरण एवं वन विभाग ने रोक लगा दी और पक्षियों का बाजार खत्म हो गया. यह एक अच्छी पहल थी. हाडवेयर यानी लोहा से बने सामान हल-खल, हसुआ, खुरपी, कुदाल, छेनी–हथोडा आदि की के बाजार में इस बार तलवार खरीदने वालों के बीच उदासी रही. पिछले दो साल मेले में सबसे ज्यादा तलवारों की बिक्री हुई थी. इस बार प्रशासन ने इस पर रोक लगा दीतो दूकानदारों ने तलवार की जगह गुप्ती बेचते दिखे. लुधियाना और दिल्ली से गरम कपड़े लाकर बेचने वाले ही अब इस बाजार में बच गए हैं. सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर थियेटर देखने वालों की भीड़ इस मेले में जुटती है. अश्लीलता को लेकर बदनाम थियेटर रात में गुलजार हो जाता है. हालाँकि प्रशासन की टेढ़ी नजर से यह कुछ सुधार तो है लेकिन बीच-बीच में थियेटर वाले अपना पुराना खेल, खेल जाते है और यही थियेटर की पहचान व जान रही है.

11 नवम्बर से एक माह के लिए शुरू हुए मेला में कृषि से जुड़ें उत्पाद, गरम कपड़ा, पशुओं के इस्तेमाल के सामान, दैनिक सामान, लोहा के घरलू सामान, लड़की के सामान के बाजार जहाँ लगते है. वहीँ, मेला को जीवंत बनाने के लिए झूला और खानपान का ग्रामीण और फ़ास्टफ़ूड की दूकानें भी सजती है. तेल्हा जलेबी हमेशा छनता रहता है. देखा जाये तो बिहार की लगभग 80 फीसदी आबादी कृषि से जुड़ी हुई है. और बिहार के आम, लीची, मकई, मखाना, केला पूरे देश में प्रसिद्ध हैं. ऐसे में सोनपुर मेला को कृषि से जुड़ी उत्पादों का बाजार बनाये जाने की जरूरत है. वैसे, बिहार सरकार का कृषि विभाग और निजी संस्थान सामग्री बेचते और कृषि के गुर सिखाते रहते हैं. फिर भी इसकी व्यापक बनाये जाने की  आवश्यकत है. इस मेले में ग्रामीण क्षेत्र से भारी संख्य में लोगों आते हैं और जम कर खरीदारी करते हैं. हर कोई अपनी जरूरत के मुताबिक सामान खरीदता है. इसकी खूबसूरती यह है कि मेला में बड़ा व्यवसायी भी आता है और अति छोटा भी. यह कहे कि हर कोई कमाने आता है. अंगूठी पर नाम उकेरने वाला या आचार बेचने वाला या फिर सोनपुर मेला की पहचान मिटटी से बनी सिटी और घिरनी, कोई हजारों रूपये देकर स्टाल लेता है तो कोई सड़क किनारे छोटा टेबल या गमछा बिछाकर ठेकेदार को पैसे देकर अपनी दुकान सजा लेता है.

लेकिन यह मेला सिमटा जा रहा हैं. हाजीपुर के कोनहारा घाट से सारण के पहलेजा घाट तक फैले सोनपुर मेला घूमने में पर्यटकों को कई दिन लग जाते थे. हर साल हजारों विदेश पर्यटक मेला देखने आते थे. उनके लिए खास कुटिया बनती है. अब चंद घंटे में सोनपुर मेला देख लिया जाता है. सरकारी योजनाओं से सजे स्टाल पर नहीं के बराबर भीड़ दिखती है. केवल कार्तिक पूर्णिमा स्नान के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश से जुटने वाले लाखों के भीड़ ही इसे मेले का एहसास कराती है फिर भी यह मेला जिंदा है,तो सिर्फ ग्रामीणनों की वजह से. बहरहाल, ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व के गजग्राह युद्ध की भूमि सोनपुर मेला की पहली पहचान पशु मेला है खत्म हो चूका है. बच गया है तो सिर्फ ग्रामीण मेला का पुट,क्योंकि इस मेले में ग्रामीण संस्कृति की मोहक खुशबू की महक महसूस की जा सकती है.

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