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अदरक डालिए साग में अगर कफ से बचना है तो

 पूर्णिमा अरूण

बस या रेलगाड़ी का सफर करते समय कभी-कभी ऐसे सहयात्री मिल जाते हैं जिन्हें रास्ते भर उल्टी होती रहती है या उल्टी का अहसास बना रहता है. जिन्हें यह तकलीफ होती है वे सफर करने से कतराते हैं. सफर  के डर से वे कई अच्छे अवसरों को खो देते हैं. आयुर्वेद में इस तकलीफ को हमेशा के लिए दूर किया जा सकता है. इसके लिए हमें पहले कफ प्रकृति को समझना पड़ेगा.

कफ को सामान्यतः बलगम समझा जाता है लोकिन यह इसका प्रकोपित रूप है.कफ प्रकृति से ही हमारे अन्दर धैर्य और सहनशीलता आती है.लेकिन इसकी अधिकता मोटापा बढ़ा देती है.आपने कई जन को कहते सुना होगा 'अरे हम खाते तो ज्यादा नहीं है फिर भी मोटे हुए जा रहे है.'

कफ का समय प्रातः 6 बजे से 10 बजे तक रहता है.रात में भी यही समय कफ का होता है. उम्र के हिसाब से बचपन से जवानी के बीच का समय कफकारी है.यानि जन्म से 18 साल की उम्र तक. इसलिए ख्याल न रखा जाएं तो बच्चों को सर्दी जुकाम लगा ही रहता है.ऋतुओं में शिशिर(जनवरी व फरवरी) में कफ का संचय होता है.कम तापमान होने से हम ठंड खाते रहते हैं साथ ही घी-मक्खन वाला गरिष्ठ भोजन भी. इससे कफ का संचय शरीर में होता रहता है.बसंत ऋतु(मार्च व अप्रैल) में यह प्रकोपित हो जाता है.सावधानी न बरतें तो इस समय बलगम बहुत परेशान करता है.

कफ को कम करने के लिए गर्म,खुशक(बिना घी-तेल का)कटु(तीखा),तिक्त(कड़वा),कषाय(कसैला) रस वाला भोजन करना चाहिए.इसके विपरीत ठंडा,मीठा,नमकीन,खट्टा व चिकना(घी-तेल वाला) भोजन कफ बढ़ाता है. जाड़े में हरे टमाटर डला साग और मक्खन लगी मक्का की रोटी खानी सभी को प्रिय है.लेकिन यह भोजन कफ बढ़ाता है.अगर इस भोजन में हम कटु व तिक्त रस को मिला लें तो कफ की अधिकता से बच सकते हैं.जैसे- अदरक व हरी मैथी को साग में जरूर डालें और मक्खन में काली मिर्च या त्रिकुट मिला लें. त्रिकुट सौंठ व पीपली को काली मिर्च के साथ पीस लेने से बनता है. ऐसा करने से स्वाद भी बना रहेगा और सेहत भी.

सर्दी में घी खाने का भी मन करता है. घी ठंडा व चिकनाई वाले गुण की वजह से कफकारी है.कफ से बचने के लिए सौंठिया घी(सौंठ से सिद्ध) या लहसुन से छुका घी खाएं. इस मौसम में अचार भी नहीं खाना चाहिए.दालों में उड़द की दाल की मनाही है.सरसों के तेल में छुका भोजन ठीक रहता है.कफ प्रवृति वाले को सिर पर भी सरसों का तेल लगाना चाहिए.छांछ या जूस पीना हो तो त्रिकुट मिला कर और कम से कम सुबह कफ के समय न पीयें.

कफकारी रोग जुकाम,खाँसी,गला बैठना,निमोनिया,यात्रा में उल्टी आना,साइनस सक्रिय होना,सिर दर्द,मन्द जठराग्नि आदि हैं.इनसे बचने के लिए कड़वा,तीखा ,कसैले रस वाला बिना घी-तेल का गर्म-गर्म भोजन करें.यदि नियम तोड़ते हैं तो सावधानी जरूरी है.शरीर में कफ का स्थान पेट(अमाश्य)माना गया है.इसकी अधिकता होने पर सफर में उल्टी होने की संभावना रहती है.इससे बचने के लिए वमन क्रिया की जाती है.वमन क्रिया में काफी मात्रा में विशेष पानी खाली पेट पिलाया जाता है फिर उल्टी करा कर निकाला जाता है. इससे कफ का प्रकोप नहीं रहता. यह किसी जानकार की देखभाल में करना चाहिए.कभी कभी कफ की अधिकता पागलपन भी पैदा कर देती है जिसे अदरक के रस और वमन से ठीक किया जा सकता है.व्यवहारिक तौर पर भावनाओं को दबाने से कफ बढ़ता है. कफ कम करने के लिए उत्तेजित होने की जरूरत होती है.इसके लिए ऐसे काम में लगे जिसमें ज्यादा सोच-विचार करना हो.कफ प्रवृति वाले भावुक होते हैं किसी दूसरे के दुःख को देखकर भी इनके आँसू निकल जाते हैं.ये इतने धैर्यवान और सहनशील होते हैं कि इन्हें शवआसन करने की जरूरत नहीं पड़ती.शुक्रवार के सेहत और स्वाद कालम से 

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