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किसान संगठनों ने किया ग्रामीण भारत बंद का एलान

नई दिल्ली .अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी), का तीसरा राष्ट्रीय अधिवेशन मावलंकर हाल, कौन्स्टिट्यूशन क्लब, नयी दिल्ली में 29-30 नवम्बर को वीएम सिंह की अध्यक्षता में 25 राज्यों के 800 प्रतिनिधियों की भागीदारी के साथ जोश और उत्साह के साथ सम्पन्न हुआ. सम्मेलन को राष्ट्रीय वर्किंग ग्रुप के सभी सदस्यों ने किसानों के विभिन्न सवालों पर संबोधित किया; जिनमें वन अधिकार कानून, एलएआरआर 2013 के सख्ती के साथ अमल, आदिवासियों और किसानों के जबरन विस्थापन के विरूद्ध, मुक्त व्यापार संधियों के विरूद्ध जो फसलों की डम्पिंग और विदेशी कम्पनियों के खेती में हस्क्षेप बढ़ाने व नियंत्रण करने की अनुमति देती हैं, कृषि मजदूरों व बटाईदार किसानों के हक के लिए एक समग्र कानून बनाने, कारपोरेट की लूट के विरूद्ध, सभी ग्रामीण लोगों के लिए 10,000 रुपये की पेंशन देने, फसल बीमा योजना तथा आपदा मुआवजा को सुधारने तथा जम्मू-कश्मीर के किसानों के नुकसान की भरपाई, आदि मुद्दे शामिल थे.

दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान देश भर से आए 100 से अधिक किसान संगठनों के नेताओं ने अधिवेशन को संबोधित किया, अपने क्षेत्र के महत्वपूर्ण सवालों व गतिविधियों को प्रस्तुत किया तथा कार्ययोजना पर अपने सुझाव रखे.

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने किसानों को इतिहास में पहली बार विस्तृत तौर पर परिभाषित किया, जो भी प्रकृति की कोख से प्राथमिक कृषि-उत्पाद पैदा करते हैं, वो सब जो फसल उगाने से लेकर, झूम की खेती करने, मधुमक्खी पालन, रेशम-कीट के पालन, कृमिपालन और कृषि-वानिकी में लगे हैं; जिनमें महिला, दलित, घुमन्तू और आदिवासी किसान, भूस्वामी, पट्टेदार, बंटाईदार, खेतिहर मजदूर तथा बागान श्रमिक, मछुआरे, दुग्ध-उत्पादक, मुर्गीपालक, पशुपालक, पशुचारक तथा लघु वनोपज को एकत्र करने वालों को शामिल किया गया है.इस सम्मेलन कि खासियत यह थी कि इसमें विभिन्न विचारों एवं विभिन्न रंगों के झंडों सहित 250 किसान संगठन शामिल हुये. इसके पूर्व मंदसौर पुलिस गोलीचालन के बाद इन संगठनों ने मिलकर दिल्ली में दो बार लाखों किसानों की किसान मुक्ति संसद का जंतर-मंतर पर आयोजन कर तथा देशभर की हजारों किलोमीटर की किसान मुक्ति यात्रा तथा 500 से अधिक किसान मुक्ति सम्मेलन कर यह साबित किया था कि इतिहास में पहली बार देश के किसान संगठन एकजुट हो रहे हैं, इन्हीं संगठनों ने मिलकर किसानों की सम्पूर्ण कर्जा मुक्ति और लाभकारी मूल्य कि गारंटी को लेकर अपने क़ानून तैयार कर अपने सांसदों से संसद में पेश कराये थे जिनका समर्थन 22 गैर भाजपा पार्टियों ने किया था.

 दिल्ली के प्रदूषण और पराली के धुएं का मसला अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन में छाया रहा. किसान प्रतिनिधियों ने दो टूक शब्दों में कहा कि दिल्ली के प्रदूषण की प्रकृति शहरी है. इसमें पराली के धुएं की कोई भूमिका अंशमात्र है. वहीं, अगर सरकारें इसको ही प्रदूषण की वजह मान रही हैं तो किसानों को महादोषी ठहराने की जगह व्यावहारिक समाधान भी देना चाहिए.

एआईकेएससीसी के वर्किंग ग्रुप के सदस्यों ने कहा कि पराली के धुएं के नाम पर आज किसानों को तंग किया जा रहा है. गन्ने की पत्ती तक जलाने पर एफआईआर हो रही है. सरकार को पराली को खरीदने के साथ उससे बायोगैस, पेपर, सीएनजी और एथेनॉल सरीखे बाई-प्रोडक्ट तैयार करने का इन्तजाम करना चाहिए. वर्किंग ग्रुप के सदस्यों ने किसानों के साथ किया जा रहे भेदभाव और किसान आन्दोलन के दमन का मुद्दा भी उठाया तथा सरकारों से किसानों पर लादे गए सभी फर्जी मुकदमे वापिस लेने की मांग की. वक्ताओं ने कश्मीर के किसानों को दस हजार करोड़ का पैकेज देने की मांग भी दोहराई.


सम्मेलन के दौरान किसान वक्ताओं ने भारतीय कृषि का संकट, जो आर्थिक के साथ सामाजिक भी है, आबोहवा के संग अस्तित्व को भी डुबो सकता है, किसानों के जीवन व आजीविका पर पारिस्थितिकीय क्षय तथा विनाश  का दुष्प्रभाव, कृषि-भूमि की अभूतपूर्व सिकुड़न और विनाश, पानी के निजीकरण, जबरन विस्थापन, वंचना और पलायन से खाद्य सुरक्षा और जीविका पर पड़ती चोट, राजसत्ता की ओर से कृषि की निरंतर होती उपेक्षा और किसान-समुदाय के साथ हो रहा भेदभाव, गांव के दबंगों और अफसरों की लूट के आगे किसानों की लगातार बढ़ती बेबसी, बड़े, आखेट-वृत्ति तथा मुनाफाखोर कारपोरेशनों का भारतीय कृषि के एक व्यापक हिस्से पर नियंत्रण, देश भर में कर्जे के तले डूबते और आत्महत्या करते किसान, किसानों तथा गैर-किसानों के बीच बढ़ती विषमता तथा किसान-संघर्षों पर सरकार के बढ़ते दमन को लेकर चिंता व्यक्त की.सम्मेलन में किसानों की ओर से ऐलान करते हुए एक घोषणापत्र जारी किया गया.


 


सम्मेलन में जीवन और गरिमामय आजीविका का, सामाजिक सुरक्षा तथा प्राकृतिक एवं अन्य आपदाओं से बचाव का, जल, जंगल, जमीन तथा सामुदायिक संपदा समेत प्राकृतिक संसाधनों का, बीज और आहार-प्रणाली में विविधता तथा टिकाऊ प्रौद्योगिक विकल्पों के चयन का और अपने अरमानों को साकार करने एवं अपनी नियती खुद गढ़ने की खातिर अभिव्यक्ति, संगठन, प्रतिनिधित्व तथा वैधानिक संघर्ष, तत्काल कृषि-संकट के समाधान की आवश्यकता हेतु  किसानों के हाथों और किसानों के लिए तैयार विधेयकों को पारित और क्रियान्वित करने की अपील की गई.


 


दिल्ली के प्रदूषण और पराली के धुएं का मसला अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन में छाया रहा. किसान प्रतिनिधियों ने दो टूक शब्दों में कहा कि दिल्ली के प्रदूषण की प्रकृति शहरी है. इसमें पराली के धुएं की कोई भूमिका अंशमात्र है. वहीं, अगर सरकारें इसको ही प्रदूषण की वजह मान रही हैं तो किसानों को महादोषी ठहराने की जगह व्यावहारिक समाधान भी देना चाहिए.


एआईकेएससीसी के वर्किंग ग्रुप के सदस्यों ने कहा कि पराली के धुएं के नाम पर आज किसानों को तंग किया जा रहा है. गन्ने की पत्ती तक जलाने पर एफआईआर हो रही है. सरकार को पराली को खरीदने के साथ उससे बायोगैस, पेपर, सीएनजी और एथेनॉल सरीखे बाई-प्रोडक्ट तैयार करने का इन्तजाम करना चाहिए. वर्किंग ग्रुप के सदस्यों ने किसानों के साथ किया जा रहे भेदभाव और किसान आन्दोलन के दमन का मुद्दा भी उठाया तथा सरकारों से किसानों पर लादे गए सभी फर्जी मुकदमे वापिस लेने की मांग की| वक्ताओं ने कश्मीर के किसानों को दस हजार करोड़ का पैकेज देने की मांग भी दोहराई|


पहले 15-31 दिसंबर तक सभी संगठन अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र वाले इलाके में किसानों के बीच ग्रामीण भारत बंद को लेकर जागरूकता अभियान चलाएंगे. इस दौरान सम्मेलन में उठाए गए मसलों की जानकारी किसानों को दी जाएगी. इसके बाद एक जनवरी से पांच जनवरी के बीच किसान राष्ट्रपति के नाम पत्र लिखेंगे. आखिर में आठ जनवरी को ग्रामीण भारत बंद रहेगा. किसान अपने गांव में रहेगा. वह किसी भी तरह का कोई काम नहीं करेगा.


किसान प्रतिनिधियों ने बताया कि कृषि की बर्बादी बदस्तूर जारी है. खरीफ की मौजूदा फसल में किसानों पर दोहरी मार पड़ी है. पहले सूखे ने और बाद में बारिश ने फसलों को तबाह किया है. देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पूरी तरह बर्बादी हो रही है. दो दिन तक खेती-किसानी से जुड़े बहुत सारे मसलों पर विस्तृत चर्चा हुई.


सम्मेलन में देश भर में 8 जनवरी को सरकार की किसान विरोधी नीतियों और केन्द्र व राज्यों द्वारा समस्याओं के हल के लिए कुछ न करने के विरूद्ध ‘राष्ट्रीय ग्रामीण बन्द’ करने की घोषणा की गयी. यह विरोध सरकार की विभिन्न सवालों पर विफलता को प्रकाश में लाएगा जिनमें किसान घोषणा पत्र के सभी मुद्दों के साथ-साथ राज्यों एवं स्थानीय मुद्दों को भी शामिल किया जाएगा. अधिवेशन में तय किया गया कि सभी राज्यों में इकाईयों को मजबूत किया जायेगा और 8 जनवरी के विरोध में बढ़चढ़कर भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु राज्य इकाईयों द्वारा ठोस योजना तैयार की जायेगी.


सम्मेलन में किसानों की ओर से ऐलान करते हुए एक घोषणापत्र जारी किया गया जिसमें :



1. किसान कर्ज-मुक्ति विधेयक, 2018 पारित करने


2. कृषि-उत्पाद पर गारंटीशुदा लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य का अधिकार (किसान) विधेयक, 2018 पारित करने


3. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत गारंटीशुदा रोजगार की सीमा प्रति परिवार बढ़ाकर 200 दिन की जाये, कानून में निर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर दिहाड़ी का भुगतान हो तथा पारिश्रमिक अकुशल खेतिहर मजदूर के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के समान करने;


4. औद्योगिक मूल्यों के नियंत्रण के जरिए या फिर प्रत्यक्ष अनुदान के जरिए किसानों के लागत-मूल्य में कमी लायी जाने;


5. सभी खेतिहर परिवारों को व्यापक सामाजिक सुरक्षा मुहैया की जाये जिसमें 60 साल से ज्यादा उम्र के हर किसान को 10000 रुपये प्रति माह पेंशन देने;


6. आधार अथवा बायोमेट्रिक सत्यापन से बगैर लिंक किए और प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण की राह ना अपनाते हुए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सार्विक (यूनिवेर्सल) किया जाये और राशन में खाद्यान्न के साथ मोटा (पोषक) अनाज, दाल, चीनी तथा तेल शामिल हो;


7. कानून अथवा दबंगई के मार्फत पशुओं के व्यापार पर आयद सभी प्रतिबंधों को हटाते हुए आवारा पशुओं की समस्या का निदान किया जाय, किसानों को जंगली तथा आवारा पशुओं से फसलों को पहुंचे नुकसान की भरपायी हो तथा पशुशाला के निर्माण में मदद मुहैया करायी जाय;


8. किसान की सहमति के बगैर भूमि-अधिग्रहण और भूमि-समुच्चयन ना हो; व्यावसायिक भूमि के विकास अथवा भूमि-बैंक के निर्माण के लिए कृषि-भूमि का अधिग्रहण या उसके उपयोग में बदलाव ना किया जाय; भूमि-अधिग्रहण, पुनर्वास तथा पुनर्स्थापना अधिनियम 2013 में वर्णित उचित मुआवजे तथा पारदर्शिता संबंधी अधिकार के राज्य स्तर पर हो रहे हनन या इस कानून के उल्लंघन को रोका जाय; भूमि के उपयोग तथा कृषि-भूमि की सुरक्षा बाबत नीति बनायी जाय;


9. चीनी मिलों को आदेश दिया जाय कि गन्ना किसानों को गन्ने की बिक्री के 14 दिनों के भीतर अगर वे बकाया नहीं चुकाते तो बकाया रकम पर 15 फीसद सालाना दर से ब्याज दें; गन्ने की एफआरपी चीनी की 9.5 प्रतिशत रिकवरी से जोड़ते हुए निर्धारित की जाय;


10. जिन कीटनाशकों को अन्यत्र प्रतिबंधित कर दिया गया है उन्हें वापस ले लिया जाय और व्यापक जरुरत, विकल्प तथा प्रभाव के आकलन के बगैर जीन-संवर्धित जी-एम बीजों को अनुमति ना दी जाये;


11. खेती तथा खाद्य-प्रसंस्करण में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति ना दी जाये, खेती को मुक्त व्यापार समझौते -जिसमें प्रस्तावित रिजनल कंप्रेहेंसिव इकॉनॉमिक पार्टनरशिप(आरसीईपी) भी शामिल है- से बाहर रखा जाये;


12. सरकारी योजनाओं के लाभ प्राप्त करने के निमित्त सभी काश्तकारों का पंजीकरण और सत्यापन अनिवार्य हो, चाहे वे खुदकाश्त करते हों, चाहे बंटाईदार किसान, महिला किसान, ठेके पर खेती करने वाले किसान, पट्टे पर खेती करने वाले किसान या फिर खेतिहर मजदूर हों; तथा


13. निर्वनीकरण के नाम पर आदिवासियों किसानों को उजाड़ना बंद हो, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम तथा वनाधिकार अधिनियम, 2006 को हल्का किये बिना सख्ती से लागू किया जाये;


 


और, आगे सरकार से आग्रह करते हैं कि वह ऐसी नीतियां बनायें जो :


14. भूमिहीनों को भूमि तथा जीविका का अधिकार प्रदान करे जिसमें खेती की जमीन तथा घर की जमीन, मछली मारने के लिए पानी तथा मामूली खनिजों के खनन आदि का अधिकार शामिल है;


15. प्राकृतिक आपदा से फसल को हुए नुकसान की भरपायी पर्याप्त, समय पर और कारगर तरीके से हो; ऐसी व्यापक फसल बीमा अमल में आये जो किसानों को लाभ पहुंचाये ना कि सिर्फ बीमा कंपनियों को और जिसमें हर किसान को सभी फसलों पर हर किस्म के जोखिम से बीमा कवर प्रदान किया जाये, फसल बीमा में नुकसान के आकलन के लिए हर खेत को एक इकाई माना जाये, सूखा प्रबंधन से संबंधित नियमावली में हुए किसान-विरोधी परिवर्तनों को वापस लिया जाये;


16. किसानों के लिए टिकाऊ साधनों के मार्फत सुनिश्चित सुरक्षाकारी सिंचाई की व्यवस्था हो, खासकर वर्षासिंचित इलाकों में;


17. दूध पर गारंटीशुदा लाभकारी मूल्य सुनिश्चित हो, उस मूल्य पर खरीद की व्यवस्था बने और मिड डे मील तथा समेकित बाल विकास कार्यक्रम आदि के जरिए दूध को पूरक पोषाहार के रूप में दिया जाये;


18. आत्महत्या के शिकार किसान-परिवारों के सभी कर्ज माफ हों और ऐसे परिवारों के बच्चों को विशेष अवसर मुहैया कराये जायें;


19. अनुबंध कृषि अधिनियम (कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट 2018) का पुनर्विचार हो और इसके नाम पर हो रही कारपोरेट लूट से किसानों को बचाया जाये;


20. कृषि के कारपोरेटीकरण तथा कृषि पर बहुराष्ट्रीय निगमों का दबदबा बढ़ाने की जगह कृषक उत्पादक संगठनों तथा कृषक सहकारी समितियों के तहत उपार्जन, प्रसंस्करण तथा विपणन को बढ़ावा दिया जाये; और


21. खेती-बाड़ी को लेकर उपयुक्त फसल-चक्र पर आधारित तथा स्थानीय बीज-विविधता को बढ़ावा देने वाली एक पारिस्थितिगत समझ को बढ़ावा दिया जाये जो आर्थिक रुप से कमाऊ, पारिस्थिकीय रुप से टिकाऊ, स्वावलम्बी तथा जलवायु-परिवर्तन को सह सकने में सक्षम कृषि का मार्ग प्रशस्त कर सके आदि मुद्दे शामिल किये गये|


 


 

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