इस मौसम में भिंडी ,अरबी और कटहल से बचें !

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इस मौसम में भिंडी ,अरबी और कटहल से बचें !

पूर्णिमा अरूण

आयुर्वेद की नज़र से वात-पित-कफ को जाने बिना सेहत की बात हो ही नहीं सकती.इनको संतुलित रखना ही सेहत का राज है.आज तक के संवाद में इनके बारे में जान चुके हैं .अब हमें स्वयं कि मूल प्रवृति और वर्तमान की बिगड़ी प्रवृति को पहचानना  जरूरी है.तभी हम बिगड़ी सेहत को सुधार सकते हैं और भविष्य में सेहतमंद रह सकते हैं.      हर व्यक्ति स्वयं की विशेष प्रवृति ले कर जन्मता है जो उसकी मूल प्रवृति मानी जाती है.आप कफ प्रवृति वाले या पित प्रवृति वाले या वात प्रवृति  हो सकते हैं.ये भी हो सकता है कि आप दो प्रवृति के मेल वाले हो जैसे- कफ पित या वायु पित.एक अच्छा वैद्य आपकी शारीरिक गठन,रंग,नैन-नक्श और व्यवहार को देख कर मूल प्रवृति को बता सकता है.नब्ज देख कर वर्तमान दोष को जान सकता है.इस आधार पर आप अपना भोजन और व्यवहार तय कर सकते हैं ताकि स्वस्थ हो सकें.

बचपन में लालन-पालन के तरिकों से या बड़े होने पर अपनायी लाइफ़-स्टाइल की वजह से हमारी मूल प्रवृति में दोष जुड़ जाते हैं.माना आप कफ- पित प्रवृति ले कर जन्में लेकिन खाने की गड़बड़ी होने से वायु दोष भी पैदा हो गया.ऐसे में वात-पित-कफ असंतुलित हो जाने से रोग ग्रसित  हो जाते हैं.वात बिगड़ने पर जोड़ों के दर्द,गठिया,पेट फूलना आदि परेशानी बढ़ जाती है.कफ बिगड़ने पर सर्दी- जुकाम,नज़ला,निमोनिया हो जाते हैं.पित बढ़ने से पेट में जलन,फोड़े-फुंसी निकलना आदि कष्ट हाेते हैं.इनके अलावा शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता(इम्यूनिटी) भी घट जाती है फलस्वरूप छूत के रोग भी लग जाते हैं जैसे मलेरिया,चिकनगुनिया,डेंगू,वायरल आदि.तरह-तरह के रोगों से बचने का एक ही रास्ता है कि त्रिदोष को संतुलित रखें.और त्रिदोष को संतुलित रखने का उत्तम रास्ता है प्रवृति के अनुरूप ही भोजन व व्यवहार करें.पूर्व में हम जान ही चुके हैं कि प्रवृति के अनुसार आहार- व्यवहार कैसे रखना है .जैसे आपके जोड़ों में दर्द है या खाने के बाद पेट फूलता है तो आप वात रोगी है.आपको वात नाशक भोजन करना होगा.मीठा,खट्टा,नमकीन रस वाला घी में बना गर्म भोजन.जैसे-गर्म गर्म पूरी सब्जी.यदि खिचड़ी खानी हो तो घी के साथ ही खायें.कफ जनित रोगों- जुकाम खांसी में कफ कम करने वाला कड़वा,कसैला बिना घी का गर्म भोजन करें.जैसे- सरसों के तेल में बनी हरी मेथी गाज़र की सब्जी बिना घी चुपड़ी रोटी के साथ गर्म गर्म खाएं.खिचड़ी खानी हो तो बिना घी की खाएं.पित बढ़ने पर ठंडा व मीठा भोजन करें जैसे शर्बत,खीर आदि.खिचड़ी खानी हो तो मक्खन के साथ.


स्वयं की प्रकृति के साथ-साथ मौसम की प्रकृती का भी ख्याल रखना होगा.वर्षा में वात बढ़ाने वाला ,शरद में पित बढ़ाने वाला और बसंत में कफ बढ़ाने वाला भोजन नहीं करना चाहिए.इसके अलावा दिन-रात के समय  को भी ध्यान में रखना है.सुबह शाम के 6 से 10 बजे का भोजन ठंडा,मीठा व चिकना नहीं होना चाहिए अन्यथा कफ बढ़ जाएगा.10 से 2 बजे खट्टा,नमकीन,गर्म,मिर्ची वाला भोजन करने से पित बढ़ता है.2 से 6 बजे के बीच कड़वा,कसैला,ठंडा,रूखा  भोजन न करें.नहीं तो वात बढ़ जाएगी.स्वयं की प्रकृति,मौसम की प्रकृति,दिन- रात की प्रकृति और उम्र की भी प्रकृति को ध्यान में रख कर भोजन तय करने से काया निरोगी रह सकती है.इसका सीधा सरल उपाय अपने अपने इलाके के मौसमी सब्जी- फल व अनाज से पारम्परिक  तरीके  से पकाया भोजन करें.जैसे जाड़े में मटर,गोभी,शलजम की सब्जी बनाते हुए हींग,अजवाइन,अदरक का प्रयोग अवश्य करेंगें तो सब्जी न तो बाय करेगी न कफ बढ़ाएगी.

 गैर परम्परा में भिंडी ,अरबी और कटहल खाएंगें तो रोग पालेगें ही.ये सर्दी के मौसम की सब्जी नहीं है .पर सब्जी की दूकान पर मिलती है और लोग खरीद लेते हैं .यह ठीक नहीं .यदि जानकारी न हो तो बड़े बुजुर्गों से पूछ लें कि किस मौसम में क्या खाना है और कैसे छौंकना है.हमारी भोजन परम्परा में छौंक  का विशेष ध्यान रखा गया है.अलग अलग जगहों में मौसम के हिसाब से सब्जी  के अनुसार छोंक बदलते जाते हैं.हालांकि छौंक वाली सामग्री की मात्रा कम होती है लेकिन यह घी- तेल में अपने गुण छोड़ देती है जो भोजन को दोष रहित कर देता है.

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