जनादेश

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ढोरपाटन का वह शिकारगाह !

डा शारीक अहमद खान 

तय कार्यक्रम के अनुसार बुटवल से सुबह छह बजे कूच हो गया ताकि शाम तक किसी हाल में ढोरपाटन पहुंच जाएं .वहां से ढोरपाटन लगभग दो सौ किलोमीटर था.रास्ता बेहद ख़राब और दुर्गम.जब बुटवल से तानसेन पहुँचे तो कस्बे में पहुँचते ही पता चला कि वहाँ ज़ोरदार बमबाज़ी और फ़ायरिंग हो रही है.माओवादियों से सेना और पुलिस का मुकाबला चल रहा था.आवाज़ें आ रहीं थीं.लेकिन पब्लिक सामान्य थी.वजह कि वहाँ ये रोज़ का टंटा था.देखा कि वहाँ की सेना और पुलिस के पास आधुनिक हथियार थे.जबकि हमारे यहाँ की पुलिस के पास उस समय पचासों साल पुराने हथियार थे.ज़ंग लगी और कई बार जाम हो जाने वाली संगीनों वाली रायफ़लें थीं. देखकर लगा कि ग़रीब देश नेपाल अपने नागरिकों की हिफ़ाज़त के लिए जी खोलकर हथियारों के मद में ख़र्च करता है. हम लोगों ने तानसेन में खाना खाया और तानसेन से अमरही रोड पर बढ़े.रास्ता संकरा और गिट्टीदार था.गहरी खाइयाँ नमूदार थीं.बाइक चलाने में ज़रा भी चूके तो गए सैकड़ों मीटर गहरी खाई में.अमरही तक मुझे मतलब शारिक़ को बाइक चलाना था और उसके आगे अगले पचास किलोमीटर सीपी सिंह को चलानी थी. हम लोग बारी -बारी से बाइक चलाते थे.बीच -बीच में रुकते हुए बढ़ रहे थे.अमरही आ गया.चाय पी गई.जैसे-जैसे पहाड़ पर चढ़ते जाते लोगों की शक्लों में ये तब्दीली आती जाती कि पहाड़ की चढ़ाई पर बढ़ते क्रम में वहाँ के लोगों की नाक और चिपटी और आँखें छोटी छोटी होती जातीं.चेहरे का रंग गोरा होता जाता.नेपालियों के गालों पर हल्का लालपन बढ़ा दिखता.तब राजशाही का ज़माना था और नेपाली बहुत पिछड़े हुए थे.आज तो बहुत आगे बढ़ गए हैं और चालाक भी हो गए हैं.उस वक्त पहाड़ों पर वैसे ही नेपाली दिखते थे जैसे भारत की सड़कों पर हींग बेचने वाले नेपाली.बड़ी म्यानी का चुस्त नेपाली पाजामा पहने.अब तो चीन से आई जींस वहाँ के बूढ़े भी पहन रहे हैं.ख़ैर.अमरही से बुर्टिबांग के लिए बढ़े.रास्ते में एक आदमी दिखा तो उससे रास्ते के बारे में पूछा.अब सीपी सिंह बाइक चला रहे थे और हम पीछे बैठे थे.हमने मतलब शारिक़ ने जैसे ही उससे रास्ता पूछा,वो नेपाली आदमी डरकर बुरी तरह चीख पड़ा और ' चिंकारा -चिंकारा ' कहते हुए जंगलों की तरफ़ भाग गया.सीपी सिंह ने कहा कि उस आदमी ने तुमको देखकर ' चिंकारा ' क्यों कहा.यही सब हंसते -बोलते चले जा रहे थे कि बुलेट पंचर हो गई.घनघोर जंगल और पहाड़ी, कभी कभार फौजी जीप किस्म की बख़्तरबंद गाड़ियां दिख जातीं.सड़क सुनसान. ना आदम ना आदम ज़ात.दो ट्यूब आज़मगढ़ से रख ही लिए थे.सीपी सिंह एक्सपर्ट थे.वो बाइक और जीप-कार की मरम्मत के बारे में काफ़ी इल्म रखते थे.अब हम लोगों ने सामान उतारा और सीपी सिंह ने चक्का खोल दिया.नया ट्यूब लगाया और हैंडीपंप हम लोगों के पास था ही, हवा भर ली गई.आगे बढ़े बुर्टिबांग आ गया.उबले अंडे खाए गए.देशी नेपाली मुर्ग़ी के अंडे.बुर्टिबांग से ढोरपाटन की तरफ़ बढ़े.अब बाइक हम चला रहे थे.थोड़ी दूर बाद देखा कि एक विदेशी कार बहुत गहरे नहीं बल्कि थोड़े गहरे खड्ड में गिरी हुई है. ड्राइवर मर गया है और किसी लोकल स्टेट के राजा की गाड़ी है.स्थानीय लोग निकाल रहे हैं.आगे चलकर रोड और ख़तरनाक हो गया.एक इंच चूकने पर बाइक समेत हम लोग गहरी खाइयों में दफ़न हो जाते.पता ही नहीं चलता कि कौन था और कहाँ गया.वो राजशाही का दौर था,भीतरी इलाकों में सड़कों का हाल ख़राब था..काठमांडू से बुटवल रोड कुछ सही था.महाराजा नेपाल वीरेंद्र वीर विक्रम सिंह देव भी कभी-कभार ख़ुद काठमांडू से कार चलाते हुए गोरखपुर के गोरखनाथ मठ दर्शन के लिए आ जाया करते थे.कार चलाना राजा नेपाल का शौक़ था.राजा नेपाल के दो शौक़ और थे, शाम को बीबीसी लंदन सुनना और सुनते हुए अपनी पसंदीदा वाइन पीना.हम लोगों की यात्रा के कुछ महीने बाद ही जून 2001 में नेपाल नरेश की सपरिवार हत्या हो गई थी और महाराजा ज्ञानेंद्र नेपाल नरेश हो गए थे.ख़ैर.रास्ते में एक जंगली हाथी रोड पर आकर बैठ गया.हार्न बजाया तो शराफ़त से जंगल में चला गया.रास्ते में और भी कई जंगली जानवर दिखे.भला हो कि शेर नहीं दिखा.उधर कोई बाइक से नहीं जाता है.आख़िर हम लोग बुर्टिबांग से ढोरपाटन पहुंच ही गए.अंधेरा होने को आया.हंटिंग रिज़र्व का आफ़िस बंद हो चुका था लेकिन प्राइवेट हट बाहर बनी हुईं थीं.लोगों ने बताया कि अब कल ही परमिट मिल पाएगा. लिहाज़ा मैं शारिक़ और सीपी सिंह वहीं बाहर हट में रूक गए.बिजली वहाँ नहीं थी.बाकी खाने -पीने सुविधा थी.रहने का इंतेज़ाम था.हम लोगों ने गाड़ी पर सामान बंधा रहने दिया और उसे चौकीदार के हवाले कर दिया.खाने में दाल -भात सब्जी मिली. रेडियो सुनते रहे फिर सो गए.सुबह उठकर दस बजे तक इंतज़ार किया तब परमिट आफ़िस खुला.नेपाल के ढोरपाटन रिज़र्व में शिकार लीगल है और नेपाली सरकार करवाती है.पूरी दुनिया के किसी भी देश का नागरिक वहाँ जाकर शिकार खेल सकता है.हमारे भारत में शिकार पर पाबंदी है. सलमान ख़ान एक हिरन मारकर पकड़े गए.इतना ही शौक़ था सलमान ख़ान को शिकार का तो शारिक़ ख़ान की तरह नेपाल के ढोरपाटन जाकर करते.सतीश शाह और सोनाली बेंद्रे को भी ले जाते.मज़ा भी आता और वो तो इतने बड़े हीरो हैं,उनको तो शिकार के लिए ट्राफ़ी भी देती नेपाल सरकार.लेकिन यहीं भारत में ग़ैरकानूनी तरीके से शिकार किया सलमान ने और धरे गए.ख़ैर.नेपाल सरकार के परमिट आफ़िस में सभी काग़ज़ी कोरम पूरे हुए.हम लोगों ने दो लोगों की फ़ीस साठ हज़ार रूपया इंडियन करेंसी जमा करा दी.दस हज़ार अन्य मद में जमा हुआ.वहाँ कहा गया कि अब इससे आगे जंगल में बाइक नहीं जा सकती.कैमरा नहीं जा सकता.खुखरी और गुप्ती समेत कोई निजी हथियार नहीं जाएगा.बाइक समेत सब चीज़ें वहीं जमा हो गई.इंस्ट्रक्टर ने एक घंटे तक हम लोगों को शिकार के नियम -कानून बताए.बताया कि ये शिकार की ट्रिप तीन दिन के लिए होगी.बंदूक चलाने की जानकारी दी.वो तो ख़ैर हमें मालूम थी क्योंकि हमारे परिवार में अंग्रेज़ों के ज़माने सन् 1901 से ही लाइसेंसी दोनाली बंदूक है.मेड इन बेल्जियम है.बेहद हल्की और शानदार.आज भी वैसी की वैसी है.सीपी सिंह को तो ख़ैर रायफ़ल चलाने के बारे में कमाल का इल्म था ही.दो सरकारी रायफ़लें दी गईं और छब्बीस -छब्बीस गोलियां दोनों को.दो -दो रायफ़लधारी दोनों लोगों के साथ.दस -दस पैदल नेपाली पोर्टर जो कई तरह के टेंट,खाने -पीने का सामान,ईधन,बर्तन,लाठी -बल्लम समेत हम लोगों का सामान लेकर आगे -आगे पैदल चलेंगे.दस पैदल नेपालियों के साथ एक -एक रायफ़लमैन पैदल चलेगा .मतलब दो रायफ़लमैन पैदल चल रहे थे.हम लोगों को दो जीपें दी गईं.बताया गया कि यहाँ शेर -चीते समेत तमाम हिंसक जानवर हैं इसलिए सरकारी कर्मचारियों के इंस्ट्रक्शन को फ़ालो करें.हम लोगों को सिर्फ़ एक -एक ब्लू शीप और हिमालयन थार जिसको झरल कहते थे उसका शिकार करने की छूट थी.

जीप पर सवार होकर चले.अमेरिकन पेट्रोल जीप थी.ड्राइवर चला रहा था.हम दोनों एक ही जीप में बैठे.दूसरी जीप पीछे चल रही थी.पैदल पोर्टरों ने आगे के सुरतिबांग जंगल ब्लाक में जाकर तंबू गाड़ा और खाना बना रहे थे.हम लोग जंगल की सैर करते वहाँ पहुँचे. क्योंकि पहले ही बता दिया था कि हम लोग मांसाहारी हैं इसलिए अंडों का सालन पका हुआ था.. वहाँ लोग गेहूँ की रोटी नहीं खाते हैं लेकिन गेहूँ की रोटी भी थी.हम लोगों के नहाने के लिए और टॉयलेट के लिए अलग से तंबू लगाया गया था.अमेरिकन टेंट था.टेंट देखकर हम लोग फिर एक राउंड नहा लिए.वरना बाहर के हट से तो नहाकर ही चले थे.नहाने के बाद खाना खाया गया. फ़ोल्डिंग कुर्सी -मेज़ पोर्टर साथ लाए थे,उसी पर भोजन हुआ.आराम करने के लिए टेंट अलग थे.थोड़ा आराम किया.एक घंटा आराम कर टेंट से निकले तो पहनने के लिए जूते और नी कैप,दस्ताने ,हाइकिंग पोल, हेड लैंप समेत एकस्ट्रा बैटरी दी गई.तैयार हो लिए और रायफ़लें लेकर जीप पर सवार हो गए.साथ में दो रायफ़लधारी सरकारी शूटर जीप में और दो रायफ़लधारी दस पैदल पोर्टरों के साथ आगे -आगे जानवरों को हांक लगाने के लिए.थोड़ी देर बाद दूरबीन से देखकर एक पैदल रायफ़लधारी ने ब्लू शीप होने का इशारा किया.हमने दूरबीन से देखा तो एक अजीब सी शक्ल का जानवर दिखा.यही ब्लू शीप थी.अब पैदल उतरकर धीरे -धीरे आगे बढ़े.पोर्टरों ने हांक लगाई तो झाड़ी से निकलकर ब्लू शीप भागी.पहले हमने निशाना साधा.चूक गया.दूसरी गोली भी दागी.पता नहीं कहाँ गई.नेपाली पिट्ठू दौड़े और फिर हांक लगाई.ब्लू शीप बारीक चट्टानों पर दौड़ी.इस बार सीपी सिंह ने रायफ़ल दागी.पहली ही गोली में ब्लू शीप का काम तमाम.गोली निशाने पर लगी थी.पोर्टर दौड़े और खुखरी से ब्लू शीप का गला रेत दिया.डंडे पर टांगकर कैंप लेकर चलने लगे.हम लोग जब कैंप पहुँचे तो देखते हैं कि चार अमेरिकी नागरिकों का एक दल भी वहाँ पहुँचा हुआ है और उनके तंबू गड़ रहे हैं.दो लड़के हैं और दो लड़कियाँ.हम लोगों को देखते ही वो लोग दौड़े आए.लड़कियों को देखते ही सीपी सिंह की तो बांछें खिल गईं.उनकी आँखें चमक उठीं.बातचीत होने लगी.उन लोगों ने बताया कि वो लोग हेलीकॉप्टर से काठमांडू से यहाँ पास की एक हेली स्ट्रिप पर आए और वहाँ से सीधे आ रहे हैं.तब तक डंडे पर लदी हुई ब्लू शीप भी आ गई. पचास किलो की है वहाँ के पोर्टरों ने बताया.शाम को यही ब्लू शीप बनी.अमेरिकन लोगों को भी सिंह साहब ने आमंत्रित कर लिया.कैंप फ़ायर हुआ.कुछ गोश्त भूना गया.बाकी बावर्चियों ने सालनदार पकाया.अमेरिकनों ने नाच -गाना किया.सीपी सिंह मुफ़्त में अमेरिकन लड़कियों संग नाचे.हमको भी खींच लिया.बड़ा मज़ा आ रहा था. हम भी भगवान दादा की तरह नाच लिए.ग़रीब नेपाली तालियाँ बजा रहे थे.सभी नेपाली टूटी -फूटी हिंदी बोल दे रहे थे और समझ ले रहे थे.रायफ़लधारी नेपाली फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलते और हिंदी भी ठीक -ठाक .नेपाली रायफ़लधारी अलग-अलग दिशा में मुँह किए हुए बिल्कुल चौकन्ना थे.तभी एक रायफ़लधारी चिल्लाया.साऊथ -साऊथ लाइट. झम्म से सर्च लाइट एक नेपाली ने जला दी.सभी रायफ़लधारी उसी दिशा में भागे.एक ने कहा ' फ़ोल्ड, बेंड, फ़ायर ' ...दनादन गोलियां चलने लगीं.नेपालियों ने कहा कि चितरंजन था.. इसलिए गोली नहीं मारी.हवाई फ़ायर किया.भाग गया है.हमने पूछा कौन 'चितरंजन 'उन लोगों ने बताया कि महाराजा नेपाल का गोद लिया चीता है.उसका नाम चितरंजन है.यह शाही कर्मचारी है.ख़ैर,मौसम में सर्दी बढ़ गई थी. हम लोग जैकेट वग़ैरह पहने हुए थे.भोजन हुआ और अपने -अपने स्लीपिंग बैग में जाकर सो गए.रात को सेंटर से आए नए सिक्योरिटी गार्डों की ड्यूटी पहरेदारी की थी.अगली सुबह उठकर चाय पी, फ़्रेश होने के बाद नाश्ते में ऑमलेट खाया और जीप से फाल्गुना रेंज पहुँचे.चार मिनी मोटर लोडरों में लदकर पोर्टरों ने 'बरसे रेंज' पहुँचकर अपना तंबू लगा लिया और इंतेज़ाम में जुट गए.हम लोग और अमेरिकन लोग अभी फाल्गुना रेंज में थे वहाँ हम लोगों ने रेड पांडा देखा और दो चीते देखे ..जंगली हाथियों के गोल के गोल टहल रहे थे.अब हम लोग बरसे रेंज पहुँचे.अमेरिकन दल के गार्डों ने हिमालयन थार की तरफ़ अमेरिकन को शिकार करने भेजा.उन लोगों ने दस गोलियां चलाई लेकिन कुछ हाथ न आया.थोड़ी देर बाद हमने मतलब शारिक़ ने ब्लू शीप देखी.सीपी सिंह को दिखाई.उन्होंने छह गोलियां चलाईं. भाग गईं.हम लोग वापस बरसे रेंज के टेंट आ गए.आराम किया. शाम को फिर निकले तो एक ब्लू शीप दिखी.इस बार हमने साध के निशाना लगाया तो एक ही गोली में ब्लू शीप ऊपर पहाड़ी से नीचे लुढ़क आई.पोर्टर टांग कर टेंट लाये.अमेरिकन शाम को टेंट पर ही थे.आज हमने उन लोगों को दावत दे दी.ब्लू शीप का गोश्त काफ़ी मीठा सा और अलग होता है.कुछ बना और कुछ भूना गया.उन्हीं जंगलों के पास तिब्बती रिफ्यूजी भी रहते हैं,वो खाल के लिए आकर खड़े थे.हमने कहा ले जाओ.नाच -गाना हुआ.नेपालियों ने नेपाली गीत सुनाए.वापस टेंट आकर आराम किया.यूँ तो तीन दिन का परमिट था.लेकिन हम लोग अगले दिन सेंटर पर वापस आ गए.क्योंकि हम लोग दो शिकार कर चुके थे.अमेरिकन वहीं रूके रहे.वापस आकर बाइक और सामान लिया और जिस रास्ते आज़मगढ़ से गए थे, उसी रास्ते वापस आ गए.ये पोस्ट पहले भी कर चुके हैं,नए लोगों के लिए शिकार का अनुभव पुन: साझा किया.फोटो साभार 


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