फिर मोटे अनाज की तरफ लौटता समाज

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फिर मोटे अनाज की तरफ लौटता समाज

अंबरीश कुमार

बड़े महानगरों में लोग आन लाइन बाजार से अब जैविक ,प्राकृतिक और मोटे अनाज मंगाने भी लगे हैं. ये वही अनाज है जिसे सत्तर के दशक के दशक में ग्रामीण और मध्य वर्गीय परिवारों ने छोड़ दिया था.वजह खेती में खतरनाक कीटनाशक और उर्वरक का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जाना है जिससे तरह तरह की बीमारियां फ़ैल रही हैं.ऐसा नहीं कि किसान इससे अंजान हो.कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर के ग्रामीण अंचल में अपना जाना हुआ.यह अंचल अपनी खुसबू के लिए मशहूर काला नमक चावल के लिए जाना जाता है.कहते हैं कि अगर आपके घर में यह चावल पाक रहा हो तो आसपास के कई घरों तक इसकी खुसबू जाती है.यह देश के एरोमैटिक यानी सुगंधित चावल में एक है.पर यह चावल स्थानीय बाजार में भी दो तरह का मिलेगा. एक वह जो जैविक विधि से यानी बिना रासायनिक कीटनाशक और उर्वरक के उगाया जाता है. दरअसल यह ज्यादा महंगा होता है और बड़े किसान इसे ज्यादातर अपने इस्तेमाल के लिए बोते हैं. पर जबसे प्राकृतिक और जैविक उत्पादों की मांग बढ़ी तबसे वे कुछ हिस्सा बाजार में देने लगे हैं.उनके खेत भी दो तरह के हो गए हैं ,एक जिसमें वे अपने घर के लिए प्राकृतिक ढंग से बोते है तो दूसरा जो प्रचलित रासायनिक खेती का तरीका है उसके लिए .साफ़ है कि वे खुद रासायनिक फसल से दूरी बना रहे हैं. पर ज्यादा मुनाफा के चलते बाजार में वे रासायनिक उर्वरक से पैदा हुआ अन्न बेचते हैं. पर यह पहला कदम है.यह स्थिति देश के विभिन्न हिस्सों की है.  दूसरी तरफ देश में कुछ अंचल ऐसे भी हैं जहां की खेती अगर जैविक नहीं भी है तो प्राकृतिक जरुर है. इसकी वजह किसानो की गरीबी भी है.  उदाहरण उतराखंड के ज्यादातर इलाके हैं जहां आज भी रासायनिक कीटनाशक और उर्वरक का इस्तेमाल नहीं होता. चाहे अल्मोड़ा के आसपास की भट की दाल हो या फिर चंपावत का मशहूर आलू राजमा हो. इनमें रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल बहुत कम होता है.

रामगढ़ जो फल पट्टी के रूप में जाना जाता है वहां भी आडू सेब को छोड़ दें तो ज्यादातर फल सब्जी में वे गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद का इस्तेमाल करते हैं.इस अंचल से जैविक उत्पादों के बारे में जब किसानो से बात हुई तो उन्होंने बताया कि वे जैविक खेती तो नहीं करते पर रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल भी नहीं करते. ऐसे में इस अंचल के कृषि उत्पादों को जैविक भले न माना जाए पर वह प्राकृतिक ही माने जाएंगे. यही स्थिति छतीसगढ़ और मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल की भी यही स्थिति है. उनके पास इतना पैसा ही नहीं होता कि वे महंगे कीटनाशक और उर्वरक खरीद पाएं.  ऐसे में वे  जो भी उगाते हैं वह रासायनिक खेती से बेहतर होता है.  ऐसे अन्न का इस्तेमाल अगर  वे करते हैं तो बड़े शहरों में लोग आर्गेनिक उत्पाद के रूप में भी करते हैं. पर यह बहुत महंगा होता है.  जिस जौ को कोई हमारे पूर्वांचल में दो दशक पहले कोई पूछता नही था और वह गेंहू के मुकाबले उसके आधे दाम में मिलता था वह काफी महंगा बिक रहा है.  मुंबई में एक वरिष्ठ पत्रकार हर महीने करीब ढाई सौ रुपए किलो का जौ हर महीने आन लाइन मंगाते हैं.  सिर्फ यही नहीं वे सरसों का तेल ,दाल से लेकर हल्दी गुड़ आदि ही मंगाते हैं.  इसकी कीमत बाजार से ज्यादा तो होती है पर यह गारंटी भी होती है कि आप शुद्ध अन्न खा रहे हैं. यह जागरूकता

हाल के कुछ वर्षों की है. अब पंजाब के अन्न से लोग बचना चाहते है क्योंकि समूचा पंजाब रासायनिक खेती के दुष्परिणाम झेल रहा है.  ज्यादातर गांव में कैसर के मरीजों कि संख्या तेजी से बढी है.  यह पंजाब की हरित क्रांति का काला पक्ष है. यही वजह है कि बहुत से लोग अब जैविक अन्न पर जोर देने लगे हैं .  पर जैविक अन्न कम उत्पादन की वजह से महंगा पड़ता है. दूसरे इसका प्रमाण पत्र लेना भी कम झमेले का काम नहीं है. दूसरे इसकी फीस बहुत छोटे किसानो को महंगी पड़ती है जिसकी वजह से वे अपना उत्पाद जैविक उत्पाद के रूप में नहीं बेच पाते हैं. ऐसे में उनका कृषि उत्पाद जो जैविक होने के बावजूद जैविक उत्पाद के रूप में नहीं बिक पाता यह उनके लिए घाटे का सौदा बन जाता है.  उदाहरण अरहर की आम दाल जो बाजार में अस्सी से सौ रुपए किलो बिकती है वह जैविक दाल के रूप में सवा सौ से डेढ़ सौ रुपए के भाव बिकती है. अगर सरकार जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना चाहती है तो उसे इन सब बातों पर गौर करना चाहिए .  

दरअसल सेहत को लेकर लोगों में जो जागरूकता बढ़ी है उसके चलते लोग मोटे अनाज को भी अपने भोजन का हिस्सा बना रहे हैं.  जौ,ज्वार ,बाजरा ,मक्का ,रागी ,मंडुआ से लेकर जई अलसी सब इस्तेमाल होने लगे हैं. शहरी इलाकों में लोगों का खानपान बदल रहा है तो बाजार भी बदल रहा है.  अब पैकेट बंद आटा में मल्टी ग्रेन के कई ब्रांड बाजार में आ गए हैं.  यह बात अलग है कि गेंहू के आटा में कौन सा अनाज कितना मिलाना चाहिए इसकी समझ नहीं विकसित हुई है जिसके चलते सोयाबीन या अन्य मोटे अनाज की मात्रा भी लोग जरुरत से ज्यादा मिला देते हैं जिससे वह सेहत को नुकसान  भी पहुंचा देता है. मोटा अनाज खाना चाहिए पर उसकी मात्रा का भी ध्यान रखना चाहिए.उदाहरण के लिए पहाड़ पर जो भट की  दाल होती है उसके आटें की रोटी डायबिटीज वालों के लिए भुत फायदेमंद है क्योंकि इसमें बहुत ज्यादा प्रोटीन होता है.यह एक छोटा सा उदाहरण है.खानपान में जो बदलाव आ रहा है उसे शहरी समाज भी धीरे धीरे आत्मसात कर रहा है.  जैसे कुछ सब्जियां तो लोग खुद घर में उगा लेते हैं जो रासायनिक खाद से मुक्त होती है.  अगर फ़्लैट में आप रहते हैं तो आठ दस गमले से भी यह प्रयोग हो सकता है.  हरी मिर्च .नींबू ,धनिया ,टमाटर ,करी पत्ता ,पालक ,बैगन ,करेला से लेका तुरई तक आप खुद आसानी स उगा सकते हैं.  किचन वेस्ट से प्राकृतिक खाद बना सकते हैं.इससे रोज आप कुछ तो ऐसी सब्जी खा सकतें है जो पूरी तरह रासायनिक खाद से मुक्त होगी.  दूसरी बात मोटा अन्न बाजार से खरीदिए इनमें उर्वरक और कीटनाशक का प्रयोग बहुत कम होता है जबकि अच्छी गुणवत्ता वाले महीन अनाज रासायनि खाद के इस्तेमाल वाले होते हैं.  जिस बासमती का चारो तरफ जोर है वह अमूमन रासायनिक खाद और कीटनाशक से ही तैयार होता है जबकि किसी भी अंचल के मोटे चावल या एरोमैटिक यानी सुगंधित चावल का इस्तेमाल कर देखें.  छतीसगढ़ में ही ऐसी दर्जनों प्रजातियों का धान उपलब्ध है. कोई जरूरी नहीं कि सिर्फ जैविक अन्न ही लेन अगर प्राकृतिक ढंग से उगाया गया अन्न भी मिले तो उसका लोग इस्तेमाल करते हैं .मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र में बहुत से किसान प्राकृतिक खेती से भी रासयनिक उर्वरक और कीटनाशक से दूरी बनाने लगे हैं.  साभार 

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