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छुपा कर छापना भी एक कला है !

संजय कुमार सिंह 

कोलकाता के अंग्रेजी अखबार, द टेलीग्राफ में गुरुवार, 26 दिसंबर का अंक रोज से अलग था. अखबार का पहला पन्ना अमूमन ऐसा नहीं होता है. चार कॉलम की लीड, साथ में छोटी सी फोटो और छोटे फौन्ट में शीर्षक. वह भी सिंगल इनवर्टेड कॉमा में. बेशक इनवर्टेड कॉमा में जो कहा गया है वह ध्यान खींचता है पर इस अखबार को ऐसा कब देखा था याद नहीं है. यहां सात कॉलम की लीड होती है, एक, दो, चार शब्द का शीर्षक हो सकता है, आम अखबारों से अलग कुछ भी हो सकता है. पर वैसा बहुत कम देखने को मिलता है जैसा आम अखबारों में अक्सर देखने को मिलता है या पहले मिलता था. इस खबर का शीर्षक हिन्दी में इस प्रकार होता, 'तुम्हारे लिए दो ही जगहें हैं, पाकिस्तान या कब्रिस्तान'. खबर पढ़ने पर याद आया कि यह खबर एनडीटीवी पर दिखाई गई थी. 

घटना के अगले दिन और बाद में यह खबर अखबारों में प्रमुखता से नहीं छपी यह ज्यादा महत्वपूर्ण है. आम आदमी को मारा-पीटा जाए, परेशान किया जाए तो वह पुलिस में जाता है. पुलिस न सुने तो आदमी अखबारों में जाता है. पुलिस की ज्यादती अखबारों में नहीं छपे ऐसा बहुत कम होता था. मुख्यरूप से इसका कारण यही है कि पुलिस कुछ छिपा कर नहीं करती. जो करती है, खुल्लम खुल्ला करती है. पर अब सीसीटीवी ज्यादा होने और हर आदमी के हाथ में कैमरा होने से पुलिस की परेशानी बढ़ी है पर अखबारों ने पुलिस का सहयोग करना शुरू कर दिया है या पुलिस से डर गई है या पुलिस के खिलाफ खबर नहीं छाप रहे हैं यह अहसास मुझे कल टेलीग्राफ पढ़कर हुआ. शुक्रवार की खबर अगर टेलीग्राफ ने लगभग एक हफ्ते बाद गुरुवार को छापी तो इसीलिए कि हिन्दी अखबारों ने इसे नहीं छापा, कम छापा या छिपाकर छापा. 

मामला जो हो, यह खबर पहले पन्ने पर तो नहीं दिखी. और आज टेलीग्राफ ने अखबारों खासकर हिन्दी अखबारों की पोल खोल दी. खबर यही है कि पिछले शुक्रवार यानी 20 दिसंबर को कोई 30 पुलिसवालों ने मुजफ्फरनगर में 72 साल के हाजी हामिद हसन के घर तोड़फोड़ की और मारा-पीटा. दया दिखाने की अपील पर जो कहा वही शीर्षक है. इतना ही नहीं, पुलिस वाले उनके घर से जेवर और पांच लाख की नकदी भी लूट ले गए जो उन्होंने अपनी पोती की शादी के लिए रखे थे. कहने की जरूरत नहीं है कि यह ज्यादती जबरदस्त है और उतना ही शर्मनाक है इसे अखबारों में प्रमुखता नहीं मिलना. टेलीग्राफ में इतने दिन बाद इतनी प्रमुखता से छपने का कारण यही होगा. 

इंटरनेट पर उपलब्ध शनिवार, 21 दिसंबर के दैनिक जागरण में लीड थी, उत्तर प्रदेश में हालात बेकाबू. उपशीर्षक में यह भी लिखा था, पुलिस को बनाया जा रहा है निशाना.  लीड के साथ एक खबर थी, सिर्फ लखनऊ में दिखा पुलिस की सख्ती का असर. इसके साथ ही दूसरी खबर थी, 667 आरोपित हिरासत में. पुलिस प्रमुख ओपी सिंह की फोटो के साथ उनका बयान था, शुक्रवार को नमाज के बाद सुनियोजित ढंग से प्रदर्शनकारी सड़क पर उतरे और पुलिस पर हमला बोला. उपद्रवियों ने कम उम्र के बच्चों को आगे किया, जिनकी सुरक्षा के दृष्टि से पुलिस ने संयम बरतते हुए त्वरित कार्रवाई की. 

अमर उजाला में 21 दिसंबर को लीड थी, देश भर में उग्र प्रदर्शन, यूपी में 13 की मौत. उपशीर्षक में और बातों के अलावा यह भी बताया गया था, राजधानी में कुल 13 पुलिसकर्मी और 32 उपद्रवी घायल. मुख्य खबर के साथ अखबार ने दो छोटी खबरें भी छापी थीं, बांटे गए भड़काऊ पर्चे और उसी के नीचे, नागरिकता देने की शुरुआत. मुख्य खबर के साथ सरकार का स्पष्टीकरण भी थी, 1987 से पहले जन्मे सभी नागरिक भारतीय. उत्तर प्रदेश में हिंसा और सीएए के विरोध से संबंधित कई खबर लीड के साथ थीं. इनमें भीम आर्मी प्रमुख फरार और शर्मिष्ठा मुखर्जी हिरासत में तथा यूपी में सबसे ज्यादा बवाल, परीक्षा रद्द जैसे शीर्षक भी हैं. पुलिस की बाइक फूंक दी, पुलिस पर पथराव , पुलिस चौकियों को फूंक देने की  सूचना बहुत कुछ है. पर पुलिस की इस करतूत पर (पहले पन्ने पर) एक शब्द नहीं मिला.

दैनिक भास्कर में जरूर एक फोटो के ऊपर लिखा था, विरोध में संयम खोया पुलिस ने भी सीमा लांघी. लेकिन खबर थी, .... 20 जिलों में हिंसक घटनाएं हुईं. झड़पों में 50 पुलिस कर्मियों सहित कई लोग घायल हुए हैं. पुलिसकर्मियों की गिनती है, लोगों की नहीं. घायल लोगों की गिनती अखबारों को खुद करनी थी या पुलिस से मांगना था. पर पुलिस ने नहीं बताया और मांगा भी नहीं गया. पुलिस अपने घायलों की संख्या बता रही है यह नहीं बता रही कि उसने कितनों की जान ले ली. और अखबार भी ऐसे ही रिपोर्ट कर रहा है. इसी खबर यह भी सूचना थी कि पुलिसकर्मियों की छुट्टियां रदद कर दी गई हैं. दैनिक भास्कर की खबर का शीर्षक था, हिंसा भारत छोड़ो. उत्तर प्रदरेश में छह प्रदर्शनकारियों की मौत फ्लैग शीर्षक था.

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