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चुनाव नतीजों से अछूती नहीं रहेगी बिहार की सियासत

फज़ल इमाम मल्लिक

पटना .झारखंड में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई. झामुमो नेता हेमंत सोरेन की अगुआई वाले महागठबंधन ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया. महागठबंधन में झामुमो के आलावा कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल शामिल था. महागठबंधन के 47 सीटें मिलीं हैं. इनमें झामुमो को 30, कांग्रेस को सोलह और एक सीट राजद के खाते में गई है. पिछले चुनाव में तीनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. झामुमो ने पहली बार 30 सीटें जीतीं और अकेले भी वे विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी.झारखंड के चुनाव नतीजों का बिहार की सियासत पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है. अगले ही साल बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है. इसलिए एनडीए और महागठबंधन दोनों में ही नतीजों को लेकर मंथन चल रहा है.

बिहार में महागठबंधन को झारखंड के नतीजों से ताकत भी मिली होगी और सीख भी. बीच-बीच में महागठबंधन के दलों में बेचैनी दिखाई देती है. बिहार बंद के दौरान राजद नेता तेजस्वी यादव का व्यवहार भी सुर्खियों में रहा. डाकबंगला चौराहे पर उन्होंने रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा की जिस तरह उपेक्षा की उसे लेकर खूब चर्चा हुई और हो रही है. सियासी गलियारे में इसे तेजस्वी की बचकानी हरकत माना जा रहा है. यूं भी लोकसभा चुनाव के बाद से ही तेजस्वी यादव की साख गिरी है. मुद्दों से मुंह चुराने वाला उन्हें माना जा रहा है, अब साथी दलों के नेताओं के साथ उनकी इस हरकत पर भी राजद में भी घमासान है.


पार्टी नेता इसे गठबंधन के लिए ठीक नहीं मान रहे हैं. सियासी गलियारे में तो इसे लेकर इस बात की चर्चा भी है कि हाल के कुछ महीनों में उपेंद्र कुशवाहा जनता के सरोकारों से लगातार जुड़े रहे और महागठबंधन के दूसरे नेताओं से उनका कद अब अलग से दिखाई देने लगा है इससे तेजस्वी यादव परेशान हैं. इसलिए वे उपेंद्र कुशवाहा की अनदेखी करने में लगे हैं. लेकिन झारखंड के नतीजों से तेजस्वी को भी सबक लेना होगा. राजद ने सात में सिर्फ एक ही सीट पर जीत दर्ज की है. उनके लिए यह चिंता का सबब होना चाहिए.


यूं झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों में बेहतर और कमजोर प्रदर्शन करने वाले दलों की पूछ-परख भी उसी हिसाब से तय होगी. भाजपा अकेले चुनाव लड़ी थी. बिहार में उसके साथी जदयू और लोजपा ने अकेले अपने बूते चुनाव लड़ा लेकिन दोनों दल धाराशायी हो गए. दोनों ही दलों को एक फीसद वोट भी झारखंड में नहीं मिला. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यह चिंता का सबब है तो राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पहला चुनाव लड़ने वाले चिराग पासवान के लिए भी आत्ममंथन का समय है. वैसे झारखंड में भाजपा की हार को नीतीश कुमार अपने पक्ष में करने की कोशिश भी करेंगे. वे इस कलाकारी में माहिर हैं. संभव है कि वे अगले दो-तीन महीनों में ही सीटों का एलान भी भाजपा पर दबाव डाल कर करवा लें, जिस तरह लोकसभा चुनाव के वक्त किया था.


झारखंड पांचवा राज्य है जहां भाजपा ने सत्ता गंवाई है. झारखंड बिहार से ही अलग होकर बना है. दोनों राज्यों की सामाजिक-राजनीतिक हालात एक जैसे हैं. इसलिए झारखंड के नतीजे बिहार में सत्तासीन दलों को परेशान कर रहे हैं. वैसे जदयू और भाजपा के बीच खटपट फिर शुरू हो गई है. एनआरसी के मुद्दे पर टकराव है. नीतीश कुमार ने तो एलान कर डाला है कि बिहार में एनआरसी वे लागू नहीं करेंगे, लेकिन भाजपा ने म्यान से तलवार निकाल रखी है कि वह इसे हर हाल में लागू करेगी. इस पर तकरार होना तय है. हाल के दिनों में जदयू-भाजपा के नेताओं के बीच खूब बयानबाजी हुई.


हालांकि इसे दोनों दलों के प्रमुख नेता समय-समय पर शांत करते भी दिखे. लेकिन बयान आते रहे. वार होता रहा और पलटलार भी. जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर तो सीएए और एनआरसी के खिलाफ शुरू से ही आक्रामक रहे हैं. पार्टी के रुख के विपरीत उन्होंने खुल कर पार्टी की मुखालफत की थी और नागरिकता संशोधन विधेयक पर संसद के दोनों सदनों में जदयू के साथ देने पर सवाल उठाया था. सीएए और एनआरसी पर राजघाट पर कांग्रेस के प्रदर्शन पर प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी को ट्वीट के जरिए धन्यवाद देकर फिर से नया विवाद खड़ा कर डाला है.


दूसरी तरफ, झारखंड में बेहतर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस बिहार में महागठबंधन में अपनी हिस्सेदारी को लेकर वह बहुत ज्यादा समझौता नहीं करेगी, ऐसा लगता नहीं है. हालांकि अभी बैठकों का दौर चलेगा. कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा, यह भी तय होना है. ऐसे कई वजहें हैं जिसे लेकर झारखंड चुनाव पर बिहार के सभी दलों की नजरें टिकीं थीं. बिहार में जदयू-भाजपा की सरकार है. लोजपा भी एक सहयोगी दल है. झारखंड में भाजपा फिर सत्ता में आती तो बिहार में वह अपनी दादागिरी चलाने से नहीं चूकती. सारा सियासी परिदृश्य बदला नजर आता और भाजपा बड़ी हिस्सेदारी मांगती.


लेकिन नतीजों ने उसे मायूस किया तो नीतीश कुमार की बांछें खिलीं होंगी, इस सच के बावजूद कि झारखंड में उनकी पार्टी हाशिए से भी गायब हो गई. लोकसभा चुनाव में लोजपा को छह सीटें देने के बाद भाजपा और जदयू ने बाकी सीटों का बराबर-बराबर बंटवारा कर लिया था. देश का आमचुनाव भारी बहुमत से जीतने के बाद झारखंड में भी भाजपा जीत जाती तो बिहार में भी वह चुनावी सौदेबाजी में हावी होने की कोशिश कर सकती थी. लेकिन भाजपा पिटी और बुरी तरह पिटी. इसलिए अब वह बिहार में फ्रंट फुट पर नहीं, बैकफुट पर ही खेलेगी और जदयू पहले की तरह ही बड़े भाई की भूमिका में नजर आएगा.


झारखंड के नतीजे बिहार में महागठबंधन को ताकत दे गया. हालांकि राजद को एक ही सीट मिली है लेकिन इतना तय है कि बिहार में महागठबंधन की कमान उसके हाथ में ही होगा. कांग्रेस दूसरी बड़ी पार्टी है. रालोसपा, हम और वीआईपी के अलावा इस बार वाम दल भी गठबंधन के साथ आ सकते हैं. इसलिए सीटों के तालमेल को लेकर किचकिच तो होगी लेकिन बड़ा सवाल मुख्यमंत्री को लेकर है. तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री के तौर पर कोई भी स्वीकार करने के मूड में नहीं है.


उपेंद्र कुशवाहा गठबंधन का बड़ा और बेदाग चेहरा हैं. हाल के दिनों में महागठबंधन को एकजुट करने में उन्होंने सूत्रधार की भूमिका निभाई है. जन सरोकारों को लेकर भी वे मैदान में डटे रहते हैं. कांग्रेस और वीआईपी और वाम दलों को उनके नाम पर एतराज शायद ही हो. राजद ही उनकी मुखालफत कर सकता है. लेकिन अभी इस पर बातचीत होनी है. झारखंड के नतीजों ने एक बात तो साफ कर दी है कि बिहार में भी महागठबंधन के दलों को एक साथ, एक सुर में और एक सोच के साथ चुनाव लड़ना होगा, वक्त तो यही मांग करता है. देखना यह है कि नतीजों से महागठबंधन और एनडीए कितना सबक लेता है.

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