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भून कर बनाएं दाल ,जल्दी पचेगी

पूर्णिमा अरूण

दाल के बिना भारतीय भोजन की कल्पना नहीं की जा सकती. चाहे उतर भारत हो या दक्षिण भारत सब जगह दाल बहुतायत से खायी जाती है. हर इलाके में तरह तरह की दालें होती हैं. इनके आकार और रंगों में बहुत विभिन्नता होती है. लाल,काली ,हरी,पीली,भूरी,सफेद ,गुलाबी,नारंगी,चितकबरी दालें हर पंसारी की दुकान पर दिख ही जाती हैं. इनके नामों की फेहरिस्त बहुत लम्बी होगी लेकिन अरहर,उरद,मलका,मसूर,मूंग,मोठ,चना दाल से सभी परिचित हैं. इसके अलावा कुछ फलियों के दाने साबूत भी बनाए जाते हैं जैसे- राजमा,लोबिया,सोयाबीन आदि. फलियों के दानों को जब दल दिया जाता है तो दाल कहलाने लगते हैं. आजकल औषधीय गुण की वजह से कुछ पहाडी दालें भी चलन में आने लगी हैं.इनमें गैथ यानि कुलथ,काले भट्ट हैं. कुलथ पत्थरी के इलाज में कारगर मानी जा रही है. काले भट्ट सोयाबीन का विकल्प लगते हैं.

दालों में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है इसलिए शाकाहारियों के लिए इसे खाना लाजमी हो जाता है . इनमें फाइबर होने से पेट भी साफ होता है.दालों के प्रोटीन समेत सभी पौषक तत्व हमारे शरीर को मिले इसके लिए इसको पकाने का विशेष ध्यान रखना होता है. दालों को हमेशा भीगो कर ही बनाना चाहिए . भिगोने से इसके अनावश्यक तत्व पानी में निकल जाते हैं साथ ही थोडा सा मलने पर छिलका अलग हो जाता है. सभी दालों का छिलका खाना जरूरी नहीं है. अगर उम्र वातकारी हो तो बिल्कुल भी न खाएं. आंच पर उबलते समय जो झाग बनें उन्हें उतारते जाएं. इस प्रकार पकी दाल लाभकारी होगी और गैस नहीं करेगी. आजकल बिकने वाली पॉलिस दालों को बनाते समय यह तरिका अपनाना जरूरी है.

भारत के कई अंचलों में दालों को भून कर बनाया जाता है .ऐसा करने से इसकी प्रोटीन सरलता से पच जाती है. भूनी हुई छिलके रहित दाल हल्की होती है. बिहार में अरहर की दाल भून कर बनाई जाती है .दक्षिण मारत मै भी सूखी या गीली चटनियों में उरद की दाल भून कर ही पीसी जाती है. उतराखंड में बनाया जाने वाला चौंसा भी साबूत उरद को भून पीस कर ही बनाया जाता है. साबूत दालों को खाने का एक अच्छा तरिका यह भी है कि उनको अंकुरित कर लिया जाए. अंकुरण की प्रक्रिया में दाल पाचक होने के साथ ही विटामिन बी काम्पलैक्स का स्रोत भी बन जाती है.

उरद अपने गुणों के कारण दालों में राजा है.गर्म तासिर की होने से जाडों में खाना फायदेमंद है. देसी घी में लहसन या हींग जीरे का छौंक लगा कर बनायी उरद की दाल में अदरक के लच्छे डाल देने से स्वाद के साथ ही लाभ भी बढ़ जाता है.इसे अकेले ही खाना चाहिए.दही,मछली,बैंगन के साथ खाने पर कफ पित बढ़ा देती है. इसका सबसे बड़ा खतरनाक नुस्खा दही भल्लों का है.इसे वार-त्यौहा२,शादी-ब्याह या अन्य दावतों में भी अकसर परोसा जाता है.स्वाद में भले ही लाजवाब लगे लेकिन सेहत के लिए नुकसानदायक है. इसकी जगह मूंग दाल की पकौड़ियों की चाट उत्तम है. उरद की दाल की पीठ्ठी पीस कर उसमें हींग,सौंफ,लाल मिर्च मिला कर गेहूँ के आटे में भर कर पूरी की तरह तला जाता है. इसे बेड़मी कहते है. इसको आलु की रसेदार सब्जी और मैथी की चटनी से खाने का मजा है. यह पुरानी दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रिय नाश्ता है. यह स्वादिष्ट होने के साथ ही बहुत बलदायक है. उरद की दाल बवासीर में आराम देती है.

सभी दालें वातकारी होती है लेकिन मूंग की दाल इस मायने में अच्छी है.यह हल्की और सुपाच्य दाल है. इसका पानी रोगी को भी दिया जाता है. पेट खराब हो या कब्जी हो इसकी पतली खिचड़ी फायदा करती है. यह कफ पित व ज्वर का नाश करती है. कभी-कभी दालों को हरी सब्जी के साथ मिलाकर बना देते हैं, ऐसा करना भी सेहत के लिए ठीक नहीं है. हरी मैथी इसमें अपवाद है.

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