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काले पत्थरों से टकराती लहरे

अंबरीश कुमार 

सड़क के एक तरफ काले बड़े-बड़े पत्थरों से टकराती लहरे नजर आती हैं तो सामने भव्य फ्रांसिसी होटल द प्रमोनेड  का चमचमाता डायनिंग हाल. करीब चार घंटे में पांडिचेरी यानी पुडुचेरी पहुंचने के बाद हम इस बार अरविंदो आश्रम के काटेज गेस्ट हाउस में रुके.साफ-सुथरा गेस्ट हाउस जहां शांति पसरी हुई थी. कमरे में पानी की सुराही रखने आई तमिल युवती ने चाय पर आने का न्योता दिया. काटेज गेस्टहाउस में नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात के भोजन का समय तय है. रात साढ़े आठ तक भोजन का समय समाप्त हो जता है. जो करीब सवा सात बजे शुरू होता है. तय समय के बाद पहुंचने पर निराश होना पड़ सकता है या फिर बाहर के होटल में जना पड़ेगा. यह कड़ा अनुशासन आश्रम व्यवस्था का अंग है. हालांकि बीच पर बने अरविंदो गेस्टहाउस में कुछ ज्यादा आजदी मिल जती है. वहां एक अलग रेस्त्रां भी है जो समुद्र तट से लगा हुआ है.

काटेज गेस्ट हाउस से बाहर निकलते ही दाएं करीब दस कदम चलते ही चौराहा आ जाता है जिसमे सामने वह दक्षिण भारतीय रेस्तरां है जिसमें खाना नाश्ता होता है .यहां से समुद्र तट सौ मीटर ही दूर होगा .चौराहा पार करते ही अरविंदो आश्रम का भोजनालय आ जाता है जो राजभवन के ठीक बगल में है सामने पार्क है .पर वाक करने के लिए बेहतर होगा कि कुछ आगे बढ़ें और समुद्र तट से लगी सड़क पर आ जाएं .यहां एक कोने से दूसरे कोने तक करीब दो किलोमीटर पैदल चलने में काफी अच्छा लगता है .खासकर सुबह या शाम के समय .सुबह के समय तो साईकिल से भी एक चक्कर काट लें और फिर कोने में ठेले पर बिकने वाली काफी पीकर लौट जाएं .अपना भी यही रूटीन बन गया है .दोपहर के समय दो तीन घंटे सोने के बाद फिर निकला जाता है और पहले अर्विंदों की समाधी स्थल पर कुछ समय जरुर गुजारा जाता है .इनकी लाइब्रेरी जैसी पुस्तकों की दूकान से कुछ पुस्तकें भी ली .कुछ देर वहीँ बैठकर पढना भी हुआ .फिर रोमा रोला स्ट्रीट की तरफ बढे तो मौसम बदलने लगा .तटीय अंचल में कब बादल आ जाएं कोई भरोसा नहीं इसलिए छाता जरुर रखें . 

 अंधेरा घिर चुका था .हम बाजार से निकल कर बीच रोड पर आ चुके थे .बीच रोड  के मध्य में एक अत्याधुनिक फ्रांसीसी रेस्तरां समुद्र से लगा हुआ है. इधर ही जम गए . पीछे की तरफ .आगे अभी सन्नाटा था पीछे वाले रेस्त्रां के बाहर रखे कुर्सियों पर बैठने पर कई बार लहरों की कुछ बूंदे उछल कर ऊपर आ जाती हैं. सूरज डूबने के बाद सड़क बिजली की रोशनी में नहा जाती है और सामने पड़े बड़े-बड़े पत्थरों पर कई युवा जोड़े नजर आते हैं. एक तरफ समुद्र की लहरों का शोर और दूसरी तरफ तेज हवाओं से कपड़े संभालती युवतियां नजर आती हैं.पर कपड़ों से पहचानना आसान नहीं है .ये तमिल हैं या बाहर की . सड़क की दूसरी तरफ समुद्री मछलियों के व्यंजन का स्वाद लेते कई सैलानी नजर आते हैं. तटीय इलाकों में मछली, छींगा, लोबस्टर और केकड़े का काफी प्रचलन है और सड़क के किनारे ठेला लगाकर इन्हें बेचा जाता  है.दरअसल करीब तीन सौ साल के फ्रांसीसी शासन ने इस शहर को फ्रांसीसी शहर में बदल डाला है. फ्रांसीसी उपनिवेश का असर आज भी नजर आता है. समुद्र तट के पास पुरानी इमारतें हों या फिर होटल या मयखाने. हर जगह फ्रांस का असर नजर आता है. जिस तरह गोवा में पुर्तगाल दिखता है उसी तरह पांडिचेरी में फ्रांस. फ्रांस के व्यंजन से लेकर मशहूर ब्रांड की मदिरा भी यहां मिल जएगी. और तो और यहां के बहुत से नागरिकों की नागरिकता भी फ्रांस की है.पांडिचेरी में अरविंदो आश्रम है, फ्रांसीसी वास्तुशिल्प का नायाब नमूना, गवर्नर का निवास जो अब राजभवन कहलता है. और एक नहीं कई भव्य चर्च हैं तो कई एतिहासिक मंदिर हैं. पर मंदिर जाते समय ध्यान रखना चाहिए कि दोपहर बारह बजे के बाद ये मंदिर बंद हो जते हैं और चार बजे खुलते हैं.यह परंपरा दक्षिण के ज्यादातर मंदिरों में नजर आती है. महर्षि अरविंद का आश्रम तो यहां का मुख्य पर्यटन स्थल भी है.इस आश्रम में अनोखे फूल नजर आएंगे और कोई आवाज नहीं सुनाई पड़ती. लोग खामोशी से लाइन लगाकर महर्षि अरविंद के समाधि स्थल तक पहुंचते हैं और कुछ देर रुक कर उनके आवास देखते हुए बाहर आते हैं.

सुबह सैलानी कम दिखेंगे पार्क गेस्ट हाउस की दूसरी मंजिल पर काफी का कप लेकर बालकनी में आ गए तो दो कौवे पहले से मौजूद थे .वे उड़े और सीधे समुद्र के किनारे लगे नारियल के पेड़ पर जा बैठे .सूरज चढ़ आया था .लहरे छलकती हुई दिखी .सोचा एक चक्कर लगा ही लिया जाए .नीचे बेसमेंट से साईकिल उठाई .इसमें आगे डोलची लगी थी तो पीछे कैरियर भी था .साईकिल से सेंट लुई स्ट्रीट की तरफ चले गए और कई जगह भटकते हुए राजभवन की तरफ से गांधी प्रतिमा तक पहुंच गए .कुछ वाक् कर रहे थे तो कुछ योग कर रहे थे .साईकिल खड़ी कर सामने चाय दे रहे एक ठेले की तरफ चले गए .पांडिचेरी में रहे तो साईकिल जरुर रखें .दो सौ रूपये एक दिन का भाड़ा है .पर पूरा शहर नाप सकते है .पैदल भी चल सकते हैं .हरियाली खूब है .पर अगर देर हो जाए तो समुद्र किनारे सीधी धूप लगती है .समय हो रहा था आश्रम के भोजनालय में नाश्ते का .मुझे दलिया ,ब्रेड दूध में कोई दिलचस्पी नहीं थी पर बाकी लोगों को तो वही जगह पसंद थी .मुझे सुबह नाश्ते में उपमा ज्यादा अच्छा लगता है और दक्षिण भारतीय रेस्तरां हो या फिर फ़्रांसिसी व्यंजनों वाला रेस्तरां ,इनका कोई समय नहीं होता .आराम से दस ग्यारह बजे तक नाश्ता मिल जाता है .

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