जनादेश

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निर्भया के बहाने सेंगर को भी तो याद करें !

संजय कुमार सिंह  

इस हफ्ते के हिन्दी अखबारों में निर्भया के दोषियों को फांसी देने की जल्दबाजी दिखाई दे रही है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि दोषियों को उपयुक्त सजा होनी चाहिए. फांसी की सजा पर विवाद है और उसके कारण हैं. ऐसे में अदालत ने फांसी की सजा दी है तो दोषी को फटाफट टांग दिए जाने से पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाना जरूरी है कि फांसी की सजा ही जायज है. इसमें कुछ गलत नहीं है और इसमें थोड़ा समय लगे तो इंतजार करने में भी कोई बुराई नहीं है. 

ऐसी स्थिति में दैनिक भास्कर की वीरवार की लीड खबर का शीर्षक गौरतलब है. अखबार ने हाईकोर्ट के हवाले से लिखा है, निर्भया के दोषी नियमों का दुरुपयोग कर रहे हैं, सिस्टम कैंसरग्रस्त हो चुका है. एक तरफ तो (दिल्ली) हाईकोर्ट की यह राय है और दूसरी तरफ आज ही के अखबारों में खबर है कि विधायक कुलदीप सेंगर ने निचली अदालत के फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दी है. क्या यह फांसी से बचने की कोशिश नहीं है? क्या यह नियमों-प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं है? क्या इस खबर को प्रमुखता नहीं देना सेंगर के खिलाफ माहौल बनने से बचाने की कोशिश नहीं है? 

आप जानते हैं कि बलात्कार और हत्या के आरोपी कुलदीप सेंगर विधायक हैं, इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लिए जाने से पहले उनके खिलाफ एफआईआर नहीं हो रही थी और गिरफ्तारी के महीनों बाद उन्हें सत्तारूढ़ दल ने पार्टी से निष्काषित किया, और उनकी सदस्यता खत्म होने का (शायद) कोई नियम ही नहीं है. न्याय पाने की कोशिश में पीड़ित के पिता की हत्या हो गई और खबरें यहां तक हैं कि एक दुर्घटना के जरिए पीड़िता की हत्या की कोशिश भी हुई. क्या इस व्यक्ति को जिन्दा रहने का हक है? 

मेरे ख्याल से जल्दबाजी यहां होनी चाहिए पर इस मामले में कोई जल्दबाजी नहीं है. अखबारों में भी नहीं. इसीलिए कि वे विधायक हैं. प्रभावशाली हैं और निर्भया के हत्यारे आम आदमी हैं. कोई और कारण हो तो आप बताइए.  समाज की दशा दिशा बहुत कुछ अखबारों से तय होती है. अखबारों को निष्पक्ष होना चाहिए पर वे विज्ञापन के लिए या स्वार्थ के लिए सरकार के पक्ष में झुक जाएं यह समझ में आता है. अपनी राजनीतिक पसंद ना पसंद आम जनता पर थोपने की कोशिश करें यह भी समझ में आता है. 

पर बलात्कारी और हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई के मामले में अखबारों का स्टैंड अलग कैसे हो सकता है? निर्भया के अपराधी बचने की कोशिश करें तो पहले पन्ने पर और विधायक हाईकोर्ट में अपील कर बचने की कोशिश करे तो खबर गोल. यह कैसी पत्रकारिता है? जब कोई प्रावधान है तो उसका नियमानुसार उपयोग एक मामले में गलत औऱ दूसरे मामले में सही कैसे हो सकता है. एक को लेकर चिन्ता होती है और दूसरा मामला खबर भी नहीं बने यह कैसे सही है. 

कहने की जरूरत नहीं है कि निर्भया के दोषियों के खिलाफ खबर को प्राथमिकता देना और कुलदीप सेंगर की खबर को पहले पन्ने पर नहीं रखना अपराध के मामलों में भी पक्षपात करना है. इसके अलावा गुरुवार को जो खबरें पहले पन्ने पर हो सकती थीं और नहीं हैं वो इस प्रकार हैं – 1) उत्तर प्रदेश में नागरिकता चाहने वाले लोगों की पहचान इतनी जल्दी क्यों और कैसे हो गई? कथित अनौपचारिक कार्रवाई किसके कहने पर किसलिए शुरू की गई है इसका कोई ब्यौरा नहीं है. 

संसद पर हमले के आरोप में फांसी पर चढ़ाए गए अफजल गुरु ने कहा था कि उससे एक पुलिस अधिकारी ने अपराधियों के रहने की व्यवस्था करने के लिए कहा था. इस आरोप की जांच नहीं की गई और उसे फांसी हो गई. अब पता चला है कि उस पुलिस अफसर के संबंध आतंकवादियों से थे और उसकी भूमिका आतंकवादी हरकत कराने में भी हो सकती है. इस खबर को उपयुक्त प्राथमिकता नहीं मिली है. 

नवोदय टाइम्स में निर्भया के दोषियों की खबर पहले पन्ने पर नहीं है, सेंगर की खबर सिंगल कॉलम में फोटो के साथ है और देशद्रोही डीएसपी की खबर भी है. लेकिन दूसरे अखबारों में ऐसा नहीं है. अमर उजाला में निर्भया के दोषियों की खबर लीड है. कुलदीप सेंगर की खबर नहीं है. देशद्रोही डीएसपी की खबर भी नहीं है. दैनिक जागरण में निर्भया की खबर है, सेंगर और डीएसपी की खबर नहीं है. नभाटा में निर्भया की खबर, 'फांसी फंस गई' लीड है. पर सेंगर या डीएसपी की खबर नहीं है. हिन्दुस्तान में निर्भया के दोषियों की खबर लीड है, डीएसपी की खबर दो कॉलम में और कुलदीप सेंगर की खबर सिंगल कॉलम में है. अगर फोटो होती तो खबर ढूंढ़नी नहीं पड़ती. राजस्थान पत्रिका में निर्भया के दोषियों और डीएसपी की खबर है पर सेंगर की नहीं.   

इस बीच कुछ अखबारों ने (नवोदय टाइम्स, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान) 1984 के सिख दंगे के दोषी पुलिस वाले नही बख्शे जाएंगे को प्रमुखता दी है. एकतरफ तो 1984 के दोषी अभी बख्शे नहीं जाएंगे और निर्भया के दोषी फांसी पर लटकाए नहीं जा रहे. हैदराबाद की डॉक्टर के बलात्कारियों को सजा हो भी गई. इतनी बड़ी और विस्तृत हमारी मीडिया की दुनिया है. यहां सब सही, सब गलत है. मुद्दा यह होना चाहिए था कि सबको समय पर न्याय मिले. हम न्याय में जल्दी और देरी के बहाने हिसाब बराबर कर रहे हैं.  

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