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यही समय है दही खाने का !

पूर्णिमा अरुण 

दही को लेकर आमधारणा यही है कि इसे गर्मियों में खाना अच्छा है क्योंकि यह ठंडी होती है. यह बड़ा भारी भ्रम है. आयुर्वेद के अनुसार दही गर्म तासिर का होता है. इसलिए इसके खाने का सही समय हेमंत और शिशिर के मौसम में है. हेमंत ऋतु में दो महीने मार्गशीर्ष और पौष आते हैं जो अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार 16 नवम्बर से ।5 जनवरी तक का समय है. शिशिर ऋतु में माघ और फागुन दो महीने आते हैं. यह अंग्रेजी कैलेण्डर के हिसाब से 16 जनवरी से 15 मार्च तक का समय है. समझने की बात यह है कि नवम्बर मध्य से ले कर मार्च मध्य तक का समय दही खाने का उत्तम समय है. बिहार के इलाके में मकर सक्रांति को दही-चूड़ा खाने की पुरानी प्रथा है.

दही वातनाशक है और भुख बढ़ाने वाला है. पेट के रोगों में आराम देता है. दही का फायदा नुकसान इस पर निर्भर करता है कि दही में क्या मिला कर खाया जा रहा है. बूरा मिला दही अच्छा है. यह पित्त, रक्त विकार और दाह नाशक है. गुड़ पड़ा दही भारी और पुष्टिकारक है. दही के साथ एक अपवाद भी जुडा है, यह गर्म होने के बावजूद कफकारी है. यदि किसी को बलगम बन रहा हो तो उसे दही नहीं खाना चाहिए. खाने का मन ही हो तो त्रिकटु मिला कर खाए. सौंठ, काली मिर्च व पीपल को तोल की बराबर मात्रा में लेकर कूट लेने से जो चूर्ण बनता है उसे त्रिकटु कहते हैं. यह कफनाशक है. मकर सक्रांति को लगभग सारे भारत में उरद की दाल की खिचड़ी खायी जाती है. इसके साथ दही नहीं खानी चाहिए क्योंकि उरद भी कफकारी है. इसकी खिचड़ी बिना हिंग अदरक के नहीं खानी चाहिए. मूंग की दाल की खिचड़ी दही के साथ खायी जा सकती है.

दही के गुण इस पर निर्भर करते हैं कि वह किस पशु के दूध से जमाया गया है. जैसे-गाय, भैंस एवं बकरी. इनमें भैंस के दूध का दही सबसे भारी होता है. बकरी के दूध का दही त्रिदोषनाशक है. श्वांस, बवासीर एवं खाँसी में लाभकारी है. गाय के दूध का दही अधिक गुणकारी माना गया है.

वैसे सादा दही खाने से अच्छा रायता खाना है. मूंग की पकौड़ी का रायता सबसे उत्तम माना गया है. जाड़ों में बथुआ, गाजर, मूली का रायता सेहत के अनुरूप है. बशर्ते इनमें सरसों के तेल से राई-हींग का बघार दिया हो और पानी मिला कर पतला कर दिया हो. पहाड़ों में मूली के रायते में हल्दी भी मिला दी जाती है ताकि कफ होने की गुंजाइश न रहे

दही को जमाने का तरीका भी उचित होना चाहिए नहीं तो फायदे की जगह नुकसान ही करता है. दही जमाने का उपयुक्त बर्तन मिट्टी का माना जाता है. चीनीमिट्टी या काँच के बर्तन भी ठीक है. इसके अलावा अन्य धातु के बर्तन ठीक नहीं. दही का अच्छा जमना इस पर भी निर्भर करता है कि बाहरी तापमान और दूध का तापमान कितना है. दूध गुनगुना ही रखना चाहिए. अधिक गर्म दूध से जमाया दही पानी छोड़ देता है. पहली दही का खट्टा (जामन) भी थोड़ी मात्रा में लगाना चाहिए. गुनगुने दूध में जामन मिलाकर खूब फैंटना चाहिए. वैसे तो सारे साल भर दही जमाते हैं लेकिन जाड़ों में दही का जमाना टेढ़ी खीर है. दही के बर्तन को गर्म कपड़ा ओढाना पड़ता है या गर्म जगह रखना पड़ता है जैसे अवन के अन्दर या सैलो बर्तन में. आजकल दही जमाने की मशीन भी आने लगी है जिसमें एक निश्चित तापमान पर ही दही जमाया जाता है ताकि उसमें पेट को फायदा पहुंचाने वाले जीवाणु ही पनप सकें. बहुत खट्टे दही के जीवाणु फायदा नहीं करते इसलिए पुराना खट्टा दही नहीं खाना चाहिए. लेकिन ताजा जमा दही भी तुरन्त नहीं खाना चाहिए. रात्रि में दही खाना निषेध है.

दही में चार गुना पानी मिला कर मथ देने से मट्ठा तैयार हो जाता है. आयुर्वेद के अनुसार सेहत के लिए मट्ठा अतिउत्तम है. यह वात, पित एवं कफ तीनों के लिए अच्छा है. इसका सेवन करने वाला रोगी नहीं होता. इसके सेवन से ठीक हुआ रोग फिर दुबारा नहीं होता. इसलिए दही का उपयुक्त उपयोग मट्ठे के रूप में ही करना स्वास्थकारी है.

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