जनादेश

राम नाम के जयकारों के साथ शुरू हुई विश्व प्रसिद्ध 84 कोसी परिक्रमा मनमोहन सिंह की नाराज़गी राजस्थान में बढ़ते अपराध इस सप्‍ताह आपका भविष्‍य ट्रंप दौरा और केजरीवाल सोनभद्र मे मिला सोने का पहाड़ लखनऊ की साक्षी शिवानंद की फैशन इंडस्‍ट्री में धूम हाउसिंग में मंदी का असर सब पर है-विजय आचार्य युवाओं के लिए प्रेरणा हैं अविनाश त्रिपाठी बच्चों के हाथों से कलम नहीं छीननी चाहिए-सुनील जोगी महिला उद्यमियों के लिये एक प्रेरणा हैं अनामिका राय वर्षा वर्मा की एक 'दिव्‍य कोशिश' ये हैं लखनऊ की 'रोटी वीमेन' 'गर्भ संस्‍कार' पढ़ने लखनऊ आइए जाफराबाद में शाहीनबाग जैसे हालात भारत में हर साल मर रहे दस लाख लोग आजादी के बाद बस तीन लोग इंटर पास यूपी में आईएएस अफसरों का तबादला गोवा और महादयी जल विवाद क्‍या केजरीवाल पीके से बेहतर रणनीतिकार हैं?

यह लखनऊ का शाहीन बाग़ है !

सुधांशु सक्सेना 

लखनऊ. यह घंटाघर है .पहले इसे सैलानी देखने आते थे .अब इसे तहजीब का शहर देखने आता है .घंटाघर लखनऊ का शाहीन बाग है. शाहीन बाग प्रतीक है औरतों के प्रतिरोध का. उनकी साझा आवाज का .उनके साझा डर और दुःख का .वे यहां से आवाज दे रहीं है .उनकी इस आवाज में गांधी है ,सुभाष हैं तो अंबेडकर भी है .छात्र हैं ,नौजवान हैं तो शिक्षक और एक्टिविस्ट भी है .हर उम्र की औरतें हैं यहाँ .हाड़ कंपा देने वाली सर्दी....रोजा और उपवास रखे महिलाएं, ‘कागज नहीं दिखाएंगे-संविधान बचाएंगे’ की जिद. नन्‍हें नन्‍हें हाथों में ‘नो टू एनआरसी, कैब’ लिखा हुआ है. कोई तिरंगा पकड़े है तो कोई तिरंगे में ही लिपटा नजर आ रहा है. कुछ ऐसा ही नजारा बीते एक सप्‍ताह से लखनऊ के घंटाघर का है. जहां अपने नौनिहालों के साथ हिंदू व मुस्लिम महिलाएं हजारों की संख्‍या में एकजुट होकर केंद्र सरकार के नागरिकता संशोधन कानून और नागरिकता रजिस्‍टर का विरोध करती नजर आ रही हैं. 


पर उनके साथ शहर भी खड़ा हो रहा है .मानवाधिकार कार्यकर्ता संदीप पांडे इसी के बीच बैठे हैं, सूत काटते. उनका चरखा चल रहा है. घंटाघर के ठीक नीचे मुख्य मंच है. दूर तक नजर आती है औरते.नारे गूंज रहे हैं ,पोस्टर बनाए जा रहे हैं .फोटो ली जा रही है और   तिरंगा लहरा रहा है. इस संवाददाता ने जब मौके पर विरोध प्रदर्शन में अपने चार साल के मासूम के साथ शामिल शाइस्‍ता से उनकी राय जानी तो उनका बस एक ही कहना था कि देश के इतने सारे नागरिक बीते कई दिनों से सड़क पर हैं, हम सब देश के संविधान की मूल भावना पर इस चोट को बर्दाश्‍त नहीं करेंगे. तहजीब और पर्दे में रहने वाली हम मुस्लिम महिलाओं को सड़क पर लोकतंत्र के मूलभूत ढांचे के लिए बेपर्दा होना पड़ रहा है, इससे ज्‍यादा लोकतंत्र के लिए काला दिन क्‍या होगा. अल्‍लाह ने हमें ताकत अता की है कि हम ऐसे फासीवादी कानून का विरोध कर सकें, हम यह विरोध आखिरी दम तक जारी रखेंगे. एक जान है- अल्‍लाह ले ले या बंदा ले ले. शाइस्‍ता जैसी तमाम औरतें अपना घर-बार छोड़ कर प्रदर्शनस्‍थल पर ही रोजे रखकर जमी हुई हैं. इनका एक ही कहना है कि ये कानून शत प्रतिशत गलत है. हमारी सेवा का संकल्‍प लेकर सत्‍ता हासिल करने वाले हुक्‍मरानों को सोंचना चाहिए कि जिस कानून को जनता बड़ी संख्‍या में नकार रही है, उसका संज्ञान लेकर उसे वापस ले लें. लेकिन वह तो प्रदर्शनकारियों पर पैसे लेकर प्रदर्शन में शामिल होने का आरोप लगाने से लेकर दमनकारी पुलिसिया डंडों का सहारा ले रहे है, हम यह बर्दाश्‍त नहीं करेंगे. हम उनकी जुमलेबाजी से तंग आ गए हैं और अब अत्‍याचार नहीं सहेंगे.


लखनऊ स्थित घंटाघर पर जहां एक ओर मुस्लिम महिलाओं ने रोजा रखकर प्रदर्शन किया और प्रदर्शनस्‍थल पर ही सहरी की.  वहीं दूसरी ओर हिंदू महिलाओं ने भी उपवास रखकर हवन-पूजन किया.  इस हवन में एडवा की मधु गर्ग, समाजसेविका सुभाषिनी अली, समाजवादी छात्र सभा की उपाध्‍यक्ष पूजा शुक्‍ला समेत अन्‍य महिलाओं ने इसमें प्रतिभाग करके हुक्‍मरानों की बुद्धि-शुद्धि की कामना की. पूजा शुक्‍ला ने कहा कि चाहते हैं कि सीएए कानून वापस लिया जाए. यह कानून अलोकतांत्रिक है. इससे आम जनमानस की भावनाएं आहत हुई हैं. इस जनविरोधी कानून का तत्‍काल वापस लिया जाना चाहिए. जब तक यह कानून वापस नहीं लिया जाएगा, हमारा प्रदर्शन लगातार जारी रहेगा.वहीं मधु गर्ग ने कहा कि  हम जनगणना को मानते हैं लेकिन संविधान की मूल भावना के साथ खेलने का हक किसी को नहीं है. बहुत से ऐसे लोग हैं जो बेहतर जीवन की आस में दूसरे देशों से या तो भारत की शरण में आ चुके हैं या आना चाहते हैं तो आप सिर्फ धर्म के आधार पर क्‍यों बाधा डाल रहे हैं, सबको समान हक होना चाहिए. वरना इसे मात्र तुष्टिकरण की राजनीति समझा जाएगा.घंटाघर में मौजूद सभी प्रदर्शनकारियों ने एक स्‍वर में यही कहा कि हम इस कड़ाके की ठंड में जनविरोधी कानून के खिलाफ प्रदर्शन अपनी आखिरी सांस तक करेंगे.

एक अन्य महिला प्रदर्शनकारी शबाना ने बताया कि जब से हमने प्रदर्शन शुरू किया है, तभी से सियासी लोगों की आंखों में किरकिरी बने हुए हैं. बीते दिनों समाजसेवी संगठन द्वारा प्रदर्शनकारियों को उपलब्ध कराए गए कंबल और खाने के सामान को जब्त करने की कार्रवाई की गई. इस पर भी जब हम नहीं झुके तो घंटाघर के सार्वजनिक सुलभ शौचालय के कर्मचारी को पुलिस ने डरा धमका कर हमसे ज्यादा शुल्क वसूलने का दबाव बना दिया. ऐसे में हमें पांच रुपये का शुल्क देकर एक बार शौचालय का इस्तेमाल करने को मिलता है. चाहे जो भी परेशानी हो, हमारा संकल्प है कि हम इस विरोध प्रदर्शन से पीछे नहीं हटेंगे. 

----------------------------

Share On Facebook

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :