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अभी खत्म नहीं हुआ खिचड़ी का महीना !

पूर्णिमा अरुण 

मकर संक्रांति बीत गई लेकिन खिचड़ी का महीना अभी खत्म नहीं हुआ. जैसे माघ का महीना प्रारम्भ होते ही गंगा स्नान शुरू हो जाता है और पूरे महीने डुबकियाँ लगती रहती हैं वैसे ही खिचड़ी भी खायी जाती रहती है. शायद यह घी खाने का एक तरीका है. खिचड़ी घी के संग स्वादिष्ट लगती है और बलवर्धक होती है. खिचड़ी एक सुपाच्य भोजन है. इसमें चावल-दाल घुट कर पकते हैं, इसलिए सरलता से पच जाते हैं. हींग व अदरक का छौंक लगाने से पाचकता और बढ़ जाती है. यह पौष्टिक होती है. पेट भी साफ रखती है. इसे त्रिदोषनाशक बनाने के लिए एक सरल सा नियम स्वीकारना पड़ता है. जैसे जिनके गैस बनती हो मतलब वात-प्रकृति के हों उन्हें घी के बिना खिचड़ी खानी ही नहीं चाहिए. बलगम हो रहा हो तो बिना घी के ही खिचड़ी खानी चाहिए. पित प्रकृति वालों का मक्खन के साथ खिचड़ी खाना उत्तम है.

खिचड़ी कई तरह की दालों के साथ बनाई जाती है जैसे- अरहर, मूंग, उरद एवं चना आदि. इनमें मूंग की दाल की खिचड़ी सर्वाधिक सुपाच्य होती है. पाचन तंत्र के कमजोर पड़ने पर धुली मूंग की दाल की पतली खिचड़ी उत्तम रहती है. यह रोगी को खिलाई जाती है. आजकल धुली मूंग की दाल अत्‍यधिक पॉलिश वाली आ रही है, इसलिए रोगी के लिए खिचड़ी बनाते समय दली हुई छिलके वाली दाल ही लें. इसको पकाने से घंटा भर पहले भिगो दें. भीगने पर हाथ से मलकर छिलके अलग कर लें. चावल भी बासमती या कच्चे न लें. इसकी जगह सेला चावल इस्तेमाल करें. सेला चावल का भी बारीक टुकड़ा लेंगे तो अच्छा रहेगा. यह चावल ज्यादा पाचक होता है. खिचड़ी की पाचकता इस पर भी निर्भर करती है कि उसमें चावल-दाल का क्या अनुपात रखा गया है. मरीज़ के लिए बनने वाली खिचड़ी में चावल, दाल से तीन गुना होने चाहिए. बाकी स्वाद के हिसाब से कभी चावल- दाल बराबर मात्रा में लिये जाते हैं कभी चावल दाल से दुगने लिये जाते हैं. दक्षिण भारत में खिचड़ी को पोंगल कहते है और इसी नाम से वहाँ मकर संक्रांति को पोंगल पुकारा जाता है. पोंगल में मूंग दाल एक चौथाई ली जाती है.

खिचड़ी के साथ एक तुकबंदी भी सुनने को मिलती है - खिचड़ी के चार यार,घी, दही, पापड़, अचार. यह सब स्वाद बढ़ाने के लिए ही हैं. अपनी प्रकृति को समझ कर ही इनको साथ खाना चाहिए. ठंड में अचार खाना हितकर नहीं है. फिर भी खाना ही हो तो आँवले का अचार ले सकते हैं. दही, उरद की खिचड़ी के साथ निषेध है. आजकल स्वाद बढ़ाने के लिए मौसमी सब्जियाँ जैसे गोभी, मटर, गाजर व हरे शाक भी मिला कर खिचड़ी बनाई जा रही है. बूढ़े-बच्चों के लिए यह पूर्ण आहार हो जाता है. अन्नप्राशन के बाद तो खिचड़ी बच्चे का पौष्टिक भोजन होती है. स्वादिष्ट बनाने के चक्कर में आजकल कुछ मसालों के साथ प्याज टमाटर से भी खिचड़ी छौंकी जा रही है. ऐसी खिचड़ी की सुपाच्यता कम होती है.

राजस्थान में बाजरे की खिचड़ी बहुत प्रचलित है. इसमें मुख्य घटक बाजरा ही होता है, दाल व चावल कम मात्रा में मिलाए जाते हैं. सामान्यतः मूंग की दाल डाली जाती है. कभी कभार चने की दाल उपयोग की जाती है. उरद तो कभी नहीं मिलाई जाती. इसके लिए बाजरे को पानी का छींटा दे कर कूटा जाता है ताकि उसका छिलका अलग हो जाए. बाजरे की खिचड़ी के साथ घी कुछ ज्यादा ही खाया जाता है. खाते समय हर ग्रास के साथ घी मथा जाता है फिर उसे मुँह में रखा जाता है. ठेठ रेगिस्तान में शरीर को इतने घी की जरूरत भी होती है. शहरी क्षेत्रों में बाजरे के साथ फूल गोभी, मटर एवं गाजर डाल कर भी खिचड़ी बनाने लगे हैं. बाजरा गर्म होता है इसकी खिचड़ी पकते समय बहुत पानी पीती है.

ऐसा बिलकुल नहीं है कि खिचड़ी केवल बीमारों का भोजन है.  बिहार में तो प्रत्‍येक शनिवार को खिचड़ी खाने की प्रथा है.  हरियाणा में बाजरे की खिचड़ी घी व दही के अलावा दूध के साथ भी खायी जाती है. यह बात समझ से परे है कि नमक और दूध आपस में विरोधी होने के बावजूद खिचड़ी के साथ दूध खाने का चलन कब और क्यों शुरू हुआ होगा. यह सेहत के लिए तो ठीक नही. लेकिन खिचड़ी की सुपाच्‍यता और उसके गुणों के कारण यह सर्वाधिक प्रचलित आहार है. 

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