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कहां और कैसे होगा न्याय?

संजय कुमार सिंह

इस हफ्ते गुरुवार के हिन्दी अखबार सुप्रीम कोर्ट की खबरों से भरे रहे. पर एक महत्वपूर्ण खबर पहले पन्ने पर नहीं दिखी और निर्भया के दोषियों को टांगने की जल्दी केंद्र सरकार को भी (ही) है, यह समझ में आ गया. दुनिया भर में जब फांसी की सजा खत्म करने की बात हो रही है तो फांसी की सजा पाए कुछ लोगों को टांगने की जल्दी का क्या मतलब? इसी क्रम में दैनिक भास्कर ने आठ जनवरी को शीर्षक लगाया था, बेटियों! निर्भय रहो, दरिंदों का अंत शुरू .... बलात्कारी की हत्या या उन्हें फांसी हो जाने से क्या बलात्कार नहीं होंगे? 

अगर ऐसा है तो क्या निर्भया के हत्यारे पहले बलात्कारी होंगे जो फांसी चढ़ रहे हैं. स्पष्ट रूप से दोनों सवालों का जवाब नहीं है? फिर ऐसी खबरों का मतलब यह हो सकता है कि सब इस मामले को मुद्दा बनाने वाली पार्टी का प्रचार है. अभी तक यह काम ढंके छिपे हो रहा था. 22 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने याचिका दायर कर इस शक को खत्म कर दिया. गुरुवार के अखबारों क मुताबिक मौत की सजा पाए दोषियों को डेथ वारंट जारी होने के सात दिन के अंदर फांसी होने का नियम बनवाने के लिए केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी है. 

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला होगा वह तो बाद की बात है पर अभी यह जानना दिलचस्प है कि निर्भया आंदोलन के बाद बलात्कार से संबंधित कानून में संशोधन 2014 में हुए थे. उसमें रह गई कमी या उनमें संशोधन की मांग करने में सरकार को छह साल लगे. वही सरकार चाहती है कि डेथ वारंट जारी होने के बाद सात दिन में फांसी हो जाए. अगर अदालत से सजा हो गई है तो उसे लागू होना चाहिए इसमें कोई शक नहीं है. वरना कंधार विमान अपहरण या रुबैया अपहरण जैसा कुछ भी हो सकता है जब केंद्र सरकार को आतंकवादियों के आगे झुकना पड़ा है. 

इसलिए, आरोप सही हों, सजा सही हो तो सात दिन भी क्यों खराब किए जाएं. डेथ वारंट के अगले दिन टांग दिया जाए. पर सब सही है यह सुनिश्चित करना सात दिन से ज्यादा का काम है. और वह कितने दिन में हो जाए इसे क्यों नहीं सुनिश्चित किया जाए. देर से न्याय मिलने का कोई मतलब नहीं है पर भारत में न्याय मिलने में कितना समय लगता है. और तो और सीएए जैसा कानून तीन दिन में बन गया उसके खिलाफ याचिका पर सुनवाई नहीं हो रही है. धरना-प्रदर्शन में कितने लोग मर गए तब भी. सरकार कह रही है कि कानून लागू होगा ही. मामला अदालत में है तब भी. 

किसी गरीब के लिए सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर करना या किसी अनपढ़ के लिए राष्ट्रपति के नाम माफीनामा लिखवाकर देश के दूरदराज की किसी जेल से दिल्ली भिजवाना कितना मुश्किल है यह सब जानने समझने वाला कोई जनप्रतिनिधि ऐसी मांग कैस रख सकता है? और क्या वह वाकई जनप्रतिनिधि है? अखबारों ने खबर तो छाप दी पर क्या जनता की राय भी छापेंगे? देश में इस समय फांसी की सजा प्राप्त 402 कैदी हैं. क्या अखबारों को इस खबर के साथ उन कैदियों, उनके परिवार के लोगों, वकीलों या मानवाधिकार वालों से बात नहीं करनी चाहिए थी?  

स्थिति यह है सरकार ने मानवाधिकार की बात करने को ही अपराधी बना दिया है. ऐसे लोग अर्बन नक्सल करार दिए गए हैं. ऐसे में हिन्दी अखबारों में भी मानवाधिकार की बात करने की हिम्मत नहीं रह गई लगती है. उनकी अपनी जिम्मेदारी तो भूल जाइए. हालांकि, अखबार अपना काम न करें यह एक बात है पर सरकार की सेवा में लग जाएं और उसी हिसाब से खबरों को प्राथमिकता दें तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा है. आज जब फांसी की सजा पाए व्यक्ति को डेथ वारंट जारी होने के बाद सात दिन में टांगने का कानून बनाने की खबर छपी है तो आज ही यह खबर भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला की नौकरी बहाल की. 

इस खबर के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व महिला कर्मचारी ने पूर्व सीजेआई जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. द वायर हिन्दी की खबर के अनुसार एक आतंरिक समिति ने महिला कर्मचारी की शिकायत की जांच की थी. महिला के आरोपों में कोई तथ्य नहीं पाए गए और पूर्व सीजेआई को इन आरोपों से क्लीन चिट दे दी गई थी. दूसरी ओर, महिला का आरोप था कि उन्हें नौकरी से निकालने के बाद दिल्ली पुलिस में तैनात उनके पति और देवर को भी निलंबित कर दिया गया था. हालांकि, जून 2019 में उनके पति और देवर को दिल्ली पुलिस ने बहाल कर दिया था. 

अब अगर उन्हें भी काम पर वापस ले लिया गया है (हालांकि वे फिर छुट्टी पर हैं) तो जाहिर है फैसले में गड़बड़ थी. मुख्य न्यायाधीश पर आरोप के मामले में सुप्रीम कोर्ट का ही फैसला गलत था उसे सुधारा गया और सरकार मांग कर रही है कि फांसी की सजा जल्दी होनी चाहिए. इस गलत फैसले की खबर को पी गए. कहां मिलेगा न्याय? कैसे होगा न्याय?  


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