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भोपाल में भी शाहीन बाग!

धर्मेंद्र कमरिया 

भोपाल.देश में नागरिकता संशोधन अधिनियम को. भारतीय संसद से पारित हुए लगभग डेढ़ महीना बीत गया है. लेकिन इसके विरोध में देश भर में हो रहे प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय. से इस कानून के विरोध में उठी चिंगारी.अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी तथा जेएनयू होते हुए समूचे देश में फैल गई है. शहर दर शहर लोग बड़ी संख्या में इस कानून का विरोध करने सड़कों पर उतर रहे हैं . दिल्ली का शाहीन बाग इस आंदोलन का केंद्र बिंदु बन गया है. और लोग गांधीवादी तरीके से इस कानून के खिलाफ सत्याग्रह कर रहे हैं भोपाल के इक़बाल मैदान में सीएए के खिलाफ चल रहे अनिश्चितकालीन. धरने का आज चौबीसवां दिन था. और प्रदर्शनकारी लगातार दिन प्रतिदिन अपने आंदोलन को विस्तार दे रहे हैं. तथा लोगों से बड़ी संख्या में आंदोलन में शामिल होने की अपील कर रहे हैं. मंगलवार दिनांक इक्कीस जनवरी को इस प्रदर्शन में. भोपाल शहर की मुस्लिम महिलाएं भी बड़ी तादाद में शामिल हुईं. इस प्रदर्शन में न केवल मुस्लिम समुदाय के लोग. बल्कि सभी धर्मों के लोग अपना विरोध शांतिपूर्ण ढंग से दर्ज करा रहे हैं. जिनमें  राजनीतिक तथा सामाजिक संगठनों की भी प्रमुख भूमिका है. सामाजिक संगठन सत्याग्रहियों को खाने- पीने तथा जरूरी सामान भी उपलब्ध करा रहे हैं. 


पुराना भोपाल स्थित स्टेशन रोड़. भारत टॉकीज चौराहे पर भी सीएए के विरोध में अनिश्चितकालीन सत्याग्रह का आयोजन किया गया. जिसमें प्रदर्शनकारियों ने प्रदर्शन स्थल को भोपाल का शाहीन बाग नाम दिया. तथा इकबाल मैदान के बाद यहां भी बड़ी संख्या में पुरुष प्रदर्शनकारियों के साथ मुस्लिम महिलाएं भी. प्रदर्शन में बढ़- चढ़कर शामिल हुईं. 


स्वतंत्र पत्रकार. एवं भोपाल के इकबाल मैदान पर चल रहे सत्याग्रह पर गहरी नजर रखने वाले पत्रकार सचिन श्रीवास्तव. इस कानून को प्रथम दृष्ट्या असंवैधानिक बताते हैं. जिसमें संविधान की धारा 14,15 एवं 19 का उल्लंघन है. जिसके अंतर्गत आप किसी भी नागरिक से जाति, धर्म, के आधार पर नागरिकता में भेदभाव नहीं कर सकते. श्रीवास्तव एनपीआर और एनआरसी को लेकर सरकार की जो मंशा है. उसे भी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण कारक मानते है. जिससे बड़ी संख्या में न केवल मुसलमान बल्कि हिंदू भी इस कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं. सीएए के अंतर्गत सरकार केवल अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश तथा पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को नागरिकता दे रही है. जबकि जो श्रीलंका चीन तथा तिब्बत से आने वाले अल्पसंख्यक हैं. सरकार उन्हें नागरिकता प्रदान नहीं कर रही है. जिस कारण लोग इस कानून को  देशहित में नहीं. बल्कि तीस- चालीस साल के बीजेपी आरएसएस के राजनीतिक एजेंडे के रूप में देख रहे हैं.



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