चुनाव में आचार संहिता का बाजा बज गया !

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चुनाव में आचार संहिता का बाजा बज गया !

संजय कुमार सिंह

दिल्ली चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने आचार संहिता की धज्जियां उड़ा दी. केंद्रीय मंत्री ने गोली मारो का नारा दिया और इसका असर भी हुआ. कम से कम दो युवक कट्टा चलाने को प्रेरित हुए तो इसका दोष नेताओं पर नहीं लगाकर उनकी उम्र और पार्टी बताने में व्यस्त मीडिया ने यह भी नहीं देखा कि चुनाव आयोग अचानक सक्रिय हो गया है. दिल्ली चुनाव में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को अगर अपनी पूरी ताकत झोंकनी पड़ रही है और अरविन्द केजरीवाल टेलीविजन पर हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो चुनावी माहौल भी बदला है. खबर इसपर भी होनी चाहिए. बीच चुनाव में बजट आया, निर्भया के बलात्कारियों को फांसी चढ़ाने की पूरी कोशिश हुई, संयोग और प्रयोग हुए और मंदिर के लिए ट्रस्ट भी बन गया. 

इन सबके बीच भाजपा ने आयुष्मान भारत के लिए भी वोट मांगे जबकि दिल्ली में अस्पताल भाजपा शासित उत्तर प्रदेश और बिहार से बेहतर है तथा आयुष्मान भारत के बावजूद देश के कई राज्यों से लोग उपचार के लिए दिल्ली आते हैं. यही नहीं दिल्ली सरकार से उसके वायदों के बार में पूछा जा रहा है. वो पूछ रहा है जो अपने वायदों को जुमला कह कर भूल चुका है. जिसके पास बताने के लिए अपना काम नहीं है वह दिल्ली के स्कूलों में और शिक्षा क्षेत्र में हुए काम पर उंगली उठा रहा है और अखबार चुप-चाप वही सब छाप रहे है जो उससे अपेक्षा की जा रही है. वे नगर निगम के स्कूलों की चर्चा नहीं कर रहे जो भाजपा के नियंत्रण में हैं. यह तो बताया जाता है कि शाहीन बाग में गोली चलाने वाया युवक आम आदमी पार्टी का सदस्य है. पर यह बात दब जाती है कि शाहीन बाग में एक युवती पकड़ी गई है जिसे प्रधानमंत्री ट्वीटर पर फॉलो करते हैं. यह युवती नाम बदलकर बुर्का पहन कर ‘प्रयोग’ कर रही थी. 

यह खबर तो छप जाती है कि शाहीनबाग में धरना देने के 500 रुपए दिए जा रहे हैं पर यह नहीं छपता कि यह फर्जी स्टिंग था. एक युवक गोली चलाता है तो जोर यह बताने पर रहता है कि वह नाबालिग है. यह नहीं बताया जाता कि वह गोली चलाने के लिए प्रेरित क्यों और कैसे हुआ. दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाया कि गोली चलाने वाला बच्चा मतदाता सूची में दर्ज  है तो खबर नहीं छपी या अंदर के पन्ने पर कहीं छप गई. इसी तरह, दिल्ली के मुख्यमंत्री को केजरीवाल कहा जाता है उनपर आरोप लगाया जाता है कि वे टुकड़े टुकड़े गैंग के सदस्य हैं. पर टुकड़े-टुकड़े गैंग के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है यह कोई नहीं पूछता. 

उल्टे, आरोप लगाया जाता है कि अरविन्द केजरीवाल ने मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी. पर कोई नहीं पूछता कि चार्जशीट दायर करने में तीन साल क्यों लगे और मुख्यमंत्री अनुमति दें इसके लिए सरकार की तरफ से क्या कोशिश हुई है. अखबार भी अपनी तरफ से मुख्यमंत्री से नहीं पूछते कि वे अनुमति क्यों नहीं दे रहे हैं. हालांकि, आज (गुरुवार) के हिन्दुस्तान टाइम्स में अरविन्द केजरीवाल से लंबी बातचीत है और इसमें उनसे यह सवाल पूछा भी गया हो तो जवाब वही जानेंगा जो पूरा इंटरव्यू पढ़ेगा. लेकिन टुकड़े-टुकड़े गैंग सिर्फ हवा-हवाई है यह नहीं जान पाएगा. कुल मिलाकर, अखबारों ने इस बार सरकार और सत्तारूढ़ दल का पूरा साथ दिया. यहां तक कि अर्नब गोस्वामी से उन्हीं की शैली में विमानयात्रा के दौरान सवाल पूछने के लिए कॉमेडियन कुणाल कामरा को बैन कर दिया गया. 

केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री की ‘सलाह’ पर दूसरी विमानसेवाओं ने भी उन्हें प्रतिबंधित कर दिया और अखबारों में सूचना से ज्यादा खबर शायद ही कहीं छपी. तब भी नहीं जब संबंधित विमान के पायलट ने कहा कि कामरा का व्यवहार प्रतिबंध के काबिल नहीं था और इससे ज्यादा गंभीर मामलों पर कार्रवाई नहीं हुई है. फिर भी बैन खत्म होने या ऐसी मांग करने वाली खबर तो छोड़िए सरकारी विमानसेवा एयर इंडिया द्वारा दूसरे कुणाल कामरा का टिकट कैंसल कर दिए जाने की खबर भी अखबारों ने नहीं छापी या उसे प्रमुखता नहीं दी. भले ही यह पूरी तरह कर्मचारियों की नालायकी है और सरकार या मंत्री की सलाह से इसका कोई संबंध नहीं है. 

दिल्ली पुलिस ने जब यह बताया कि शाहीन बाग का शूटर आम आदमी पार्टी का सदस्य है तो खबर खूब छपी. बाद में जब उसके पिता, चाचा ने कहा कि यह खबर गलत है तो उन्हें गलत साबित करने के लिए यह बताया गया कि उसने कब पार्टी ज्वायन की थी और उसके फोटो जारी की गई. पर लोग पार्टी ज्वायन करके छोड़ भी देते हैं और एक पार्टी में रहते हुए दूसरी पार्टी का टिकट पा जाते हैं और कपिल मिश्रा जैसे आम आदमी पार्टी के नेता जो पहले सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाते थे वो अब भाजपा में हैं यह सब तथ्य अखबार नहीं बताते हैं. चुनाव आयोग ने कपिल को आप का सदस्य बताने के लिए दिल्ली पुलिस के अफसर के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है और इससे पहले भी चुनाव आयोग ने दक्षिण-पूर्वी ज़िले के डीसीपी चिन्मय बिस्वाल को तत्काल प्रभाव से हटा दिया था. पर इन खबरों को प्रमुखता नहीं मिली.कार्टून साभार सत्याग्रह 

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