विवादों में घिरा भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार

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विवादों में घिरा भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार

कृष्ण कल्पित 

नटरंग फाउंडेशन और कृष्णा सोबती निधि का संचालन पहले से ही रज़ा फाउंडेशन के पास है . अशोक वाजपेयी का कॉरपोरेट प्रेम कोई छुपा हुआ नहीं है . वे पिछले बीस बरसों से देश के कॉरपोरेट-सेक्टर से कला-संस्कृति में पैसा लगाने की गुहार करते दिखाई पड़ रहे हैं . इस बार भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार अवा ने 38 वर्षीय कवयित्री अनामिका अनु को देने की घोषणा की है, जबकि इस पुरस्कार के लिए 35 वर्ष की आयु निर्धारित थी . जब यही करना था तो कुछ बरस पहले 38 वर्षीय कवि को घोषित पुरस्कार वापस लेकर प्रकाश जैसे संवेदनशील कवि-आलोचक को आत्महत्या के लिए क्यों मज़बूर किया गया ?

इस बार से भाभू पुरस्कार के नियम बदल दिए गए हैं . अब यह पुरस्कार कवि की प्रथम कृति को दिया जाएगा और उम्र भी 40 वर्ष कर दी गई है . आगामी 5 वर्ष के निर्णायक भी अशोक वाजपेयी ने बदल दिए गए हैं . 

एक बार एक मुलाक़ात में अशोक वाजपेयी ने बताया कि उनका प्रथम कविता-संग्रह 'शहर अब भी संभावना है' 25 वर्ष की उम्र में छप गया था और उन्होंने अपनी सुहागरात में पत्नी को अपना पहला संग्रह भेंट किया था . यह वह ज़माना था जब अच्छे अच्छे कवियों के संकलन मुश्किल से छपते थे . मुक्तिबोध का तो जीते-जी कविता-संग्रह प्रकाशित ही नहीं हुआ और शमशेर का पहला कविता-संग्रह 50 की उम्र के आसपास छपा .


अब तो लगता है कवि-लोग अपना पहला संग्रह जन्म से ही साथ लाते हैं . 40 तक तो चार पाँच संग्रह प्रकाशित हो जाते हैं . ध्यान रहे कि मायकोव्स्की ने अपना कवि कर्म करने के बाद 37 वर्ष में आत्महत्या कर ली थी .


भाभू पुरस्कार की साख पिछले वर्षों में निरंतर गिरती रही है . इस बार तो जैसे लोगों ने इसका नोटिस ही नहीं लिया . ऐसे में पुरस्कार की उम्र 35 से बढ़ाकर 40 करने का कोई औचित्य समझ नहीं आता . पिछले वर्ष मैंने लिखा था कि इसकी उम्र घटाकर 30 कर देनी चाहिए क्योंकि 30 वर्ष तक कवि का निर्माण हो जाता है .

अनामिका अनु की जिस कविता को पुरस्कार के लिए चुना गया है वह संवेदना में डूबी पर इकहरी और साधारण कविता है . अभी हिन्दी भाषा में इतने उत्कृष्ट युवा-कवि सक्रिय हैं कि मेरा मन नहीं मानता कि यह कविता 2019 की सर्वश्रेष्ठ कविता होगी . 

पुरस्कृत कविता एक स्त्री के अकेलेपन की कविता है जिसे वह काज-बटनों से खेलते हुए काटती है . इस कविता में स्त्री का जो अकेलापन है उसे निर्णायक ने वैधव्य में बदल दिया है जिसका कविता में कोई स्पष्ट संकेत नहीं है . वैधव्य के अतिरिक्त भी अकेलेपन के बहुत सारे कारण होते हैं . कविता को इस तरह विश्लेषित करना मूर्खता और मुग्धता की पराकाष्ठा है ।

इस बार नहीं लिखना चाहता था लेकिन लिखना पड़ा क्योंकि लोग इस बारे में मेरी राय पूछ रहे थे . राजशेखर ने 'काव्यमीमांसा' में लिखा है कि किसी भी कविता और कवि के बारे में बिना पूछे राय नहीं देनी चाहिए . मुझसे पूछा गया इसिलये यह लिखा . क्षमा .कृष्ण कल्पित की वाल से साभार 

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