संघ चाहता था वाजपेयी राष्ट्रपति बनें

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संघ चाहता था वाजपेयी राष्ट्रपति बनें

राज खन्ना

संघ चाहता था कि अटल बिहारी वाजपेयी राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी संभाले. प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) इस सिलसिले में अटलजी से मिले भी थे. संघ की इस पेशकश के पीछे अन्य कारणों के साथ अटल के घुटनों की समस्या भी थी. प्रधानमंत्री के पद पर रहते 2000 तथा 2001 में ब्रीच कैंडी अस्पताल में अटलजी के घुटनों का दो बार ऑपरेशन और प्रत्यारोपण हुआ था. अटलजी के अनन्य मित्र और सहयोगी लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा ' मेरा देश मेरा जीवन ' में इस प्रसंग का उल्लेख किया है. आडवाणी के अनुसार," एक दिन मुझे संघ के पूर्व सरसंघचालक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) का फोन आया कि वह मुझसे एक महत्वपूर्ण विषय पर बात करना चाहते हैं. अगली सुबह मेरे घर नाश्ते पर उन्होंने पिछली शाम अटलजी के साथ हुई बैठक का ब्यौरा बताया. रज्जू भैया के अनुसार वह राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर प्रधानमंत्री के पास विचार करने गए थे. उन्होंने अटलजी को सुझाव दिया कि आप ही क्यों राष्ट्रपति नही बनते ? ' मैंने इस सुझाव के पीछे निहित कारण बताए. मुख्यतः घुटनों की परेशानी की दृष्टि से. राष्ट्रपति की जिम्मेदारी उठाने पर उन्हें अधिक भागदौड़ नही करनी पड़ेगी. इसके अलावा व्यक्तित्व और अनुभव की दृष्टि से उन्हें आदर्श रूप में स्वीकारेंगे.' इस सुझाव पर अटलजी चुप रहे. उन्होंने चूंकि हां या न कुछ भी नही कहा था, इसलिए रज्जू भैया ने अर्थ निकाला था कि अटलजी ने प्रस्ताव अस्वीकार नही किया है. आडवाणीजी ने रज्जू भैया को बताया था कि तीन दिन पहले राजग नेताओं की बैठक में प्रधानमंत्री (अटलजी ) को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य प्रत्याशी के चयन के लिए अधिकृत किया गया है. बाद में डॉक्टर ए. पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम के अटलजी के प्रस्ताव को राजग की सर्वसम्मति स्वीकृति प्राप्त हुई थी.

       क्या संघ उस दौर में अटल की तुलना में प्रधानमंत्री पद के लिए आडवाणी को तरजीह दे रहा था ? आडवाणी ने पार्टी के मुम्बई अधिवेशन (11- 13 नवम्बर 1995 ) में अपने अध्यक्षीय भाषण का जिक्र करते हुए लिखा ,' मैंने घोषणा की , हम अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में अगला चुनाव लड़ेंगे तथा  वे प्रधानमंत्री पद के लिए हमारे प्रत्याशी होंगे. अनेक वर्षों से हमारे पार्टी कार्यकर्ता ही नही, बल्कि आमजन भी यह नारा लगाते रहे हैं - अबकी बारी-अटल बिहारी. मुझे भरोसा है कि भाजपा अटलजी के नेतृत्व में अगली सरकार बनाएगी. इस घोषणा पर पहले एक क्षण सन्नाटा छाया फिर तालियों की गड़गड़ाहट से स्थल गूंज उठा.' आडवाणी के  अपने स्थान पर पहुंचने के पूर्व ही अटलजी ने माइक्रोफोन थाम लिया था और भावुकता से रुंधे कंठ से और काफी देर तक रुकने के बाद बोले थे ,' भाजपा चुनाव जीतेगी. हम सरकार बनाएंगे तथा आडवाणी प्रधानमंत्री होंगे.' आडवाणी ने कहा घोषणा हो चुकी है. अटलजी ने फिर प्रतिवाद की कोशिश की. आडवाणी ने फिर उनका नाम दोहराया. अटलजी ने कहा ,' ये तो लखनवी अंदाज में पहले आप, नही पहले आप हो रहा है.' पत्रकार कंचन गुप्त की रिपोर्ट को उद्धृत करते हुए आडवाणी ने लिखा है, ' दो पुराने सहयोगी और घनिष्ठ मित्र , जिन्होंने भारतीय जनसंघ के गठन के समय से ही उसका सम्पोषण किया तथा बाद में भाजपा को बढ़ावा दिया, दोनो की ही आंखों में आंसू थे.'

         आडवाणी के अनुसार उनकी इस घोषणा पर निराधार अटकलें लगाई गईं. आज भी लगाई जाती हैं, जो कष्ट पहुंचाती हैं. पार्टी और संघ के कुछ लोगों ने उन्हें इस घोषणा के लिए झिड़का भी था और कहा था कि अगर पार्टी जनादेश प्राप्त करती है तो आप (आडवाणी ) सरकार चलाने के लिए उपयुक्त होंगे. आडवाणी का उत्तर था ,' जनता के बीच मैं जननायक की तुलना में विचारक अधिक हूँ. यह सही है कि भारतीय राजनीति में अयोध्या आंदोलन से मेरी छवि बदली है. लेकिन अटलजी हमारे नेता हैं. नायक हैं. जनता में उनका ऊंचा स्थान है तथा नेता के रूप में जनसाधारण उन्हें अधिक स्वीकार करता है. उनके व्यक्तित्व में इतना प्रभाव और आकर्षण है  कि उन्होंने भाजपा के पारंपरिक वैचारिक आधार वर्ग की सीमाओं को पार किया है. उन्हें न केवल भाजपा की सहयोगी पार्टियां स्वीकार करती हैं बल्कि इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारत की जनता उन्हें स्वीकार करती है.'

        आडवाणी के अनुसार उनके और अटलजी के पचास वर्षों से अधिक समय के साथ और संबंधों पर बार-बार सवाल हुए. मैं पूरी ईमानदारी से कहना चाहूंगा कि दशकों से मेरे और अटलजी के बीच संबंधों में कभी स्पर्धा की भावना नही रही. इसका निहितार्थ यह नही है कि हमारा कभी मतभेद नही रहा. लेकिन हमने कभी ऐसे मतभेदों को बढ़ावा नही दिया, जिससे परस्पर विश्वास और आदर कम हो जाये. लेकिन अत्याधिक महत्वपूर्ण कारण यह है कि मैंने स्पष्ट रूप से और निरपवाद रूप में अटलजी को अपना वरिष्ठ और अपना नेता स्वीकार किया था. कभी-कभी पार्टी में मेरे सहयोगी या संघ के नेता अपनी नाराजगी व्यक्त करते थे कि मुझमें अटलजी के निर्णयों से असहमति व्यक्त करने की क्षमता नही थी. लेकिन इससे मेरे इस विचार पर कोई प्रभाव नही पड़ता था कि पार्टी में और बाद में सरकार से संबंधित सभी मामलों में अटलजी के वाक्य अंतिम होने चाहिए. दोहरा या सामूहिक नेतृत्व  एक नेता की कमान से श्रेष्ठ नही हो सकता. मैं अपने साथियों को बताता था कि  मुखिया के बिना कोई परिवार टिक नही सकता. सभी सदस्यों को उसके आदेश को मानना चाहिए. दीनदयालजी के बाद अटलजी हमारे परिवार के मुखिया हैं. अगर आडवाणीजी ने अटल को परिवार का मुखिया माना तो  अटलजी ने भी आडवाणीजी की राय का सम्मान किया. आडवाणीजी याद करते हैं,' अटलजी का मेरे प्रति उदार दृष्टिकोण रहा. यदि वे जान जाते कि किसी  विशिष्ट विषय पर मेरा क्या विचार है और इस संबंध में कोई गम्भीर असहमति न होती तो वे झट कहते जो आडवाणीजी कहते हैं, वह ठीक है.'  राजग सरकार के दौरान ' अटल-आडवाणी विवाद ' को लेकर खूब अटकलें लगती रहती थीं. कई मौकों पर अटलजी ने इसका खंडन किया था. एक पत्रिका ने अटलजी से साक्षात्कार के दौरान आडवाणीजी से उनके संबंधों और भाजपा के अलग-अलग दिशाओं पर चलने को लेकर सवाल किया था. अटलजी ने जबाब दिया था कि मैं रोज उनसे बात करता हूँ. हम प्रतिदिन परस्पर परामर्श करते हैं. फिर भी आप लोग ऐसी अटकलें लगाते हैं. एक बात और कहना चाहता हूं कि हमारे बीच ऐसी कोई समस्या नही है. जब होगी मैं आपको बता दूंगा. आडवाणी ने दो सवालों पर अटलजी से काफी मतभेद होने का जिक्र किया है. अटलजी को अयोध्या आंदोलन से पार्टी के सीधे जुड़ाव पर आपत्ति थी. लेकिन धारणा और स्वभाव से लोकतांत्रिक होने के नाते तथा हमेशा साथियों के बीच सर्वसम्मति लाने के इच्छुक होने के कारण अटलजी ने पार्टी का सामूहिक निर्णय स्वीकार किया. 2002 के गुजरात दंगों के बाद अटलजी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का इस्तीफा चाहते थे. आडवाणीजी इससे सहमत नही थे. अप्रैल 2002 में गोवा में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी. अटलजी की इच्छा के मुताबिक विशेष विमान में आडवाणी उनके साथ गए. जसवंत सिंह और अरुण शौरी भी साथ थे. दो घण्टे की विमान यात्रा में चर्चा गुजरात पर ही केंद्रित थी. अटलजी ध्यानमग्न थे. जसवंत सिंह ने अटलजी से जानना चाहा कि क्या सोच रहे हैं ? अटलजी ने जबाब दिया,' (नरेंद्र मोदी) कम से कम  इस्तीफा ऑफर तो करते.' गोवा पहुंचने पर आडवाणीजी ने नरेंद्र मोदी से बात की कि उन्हें त्यागपत्र देने का प्रस्ताव रखना चाहिए. मोदी तत्परता से इसके लिए तैयार हो गए. इस मुद्दे पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अनेक सदस्यों ने अपने विचार रखे. सभी के विचार सुनने के बाद नरेंद्र मोदी ने विस्तार से पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी. अपने भाषण का अंत उन्होंने यह कहते हुए किया ,' फिर भी सरकार का मुखिया होने के नाते मैं राज्य में घटित होने वाले इस कांड की जिम्मेदारी लेता हूँ. मैं त्यागपत्र देने को तैयार हूँ.' मोदी के यह प्रस्ताव करते ही पूरा सभागार ,' नही. नही. त्यागपत्र नही. त्यागपत्र का सवाल ही नही से गूंज उठा.'


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फिर सुबह होगी

     

अटलजी और अपने लम्बे साथ को याद करते हुए आडवाणी पाते हैं, ' मत भिन्नता की जगह सहमति अधिक रही. हम दोनों ने मिलकर जो कुछ किया ,उसमे मुझे असफलता की तुलना में संतुष्टि अधिक मिली. यहां तक जब हमें सफलता नही मिली तब भी निराशा को हावी नही होने दिया. निराशा पर आशा और अंधेरे पर प्रकाश की विजय होती है. कष्ट भरी रात के बाद नई सुबह आती ही है. अटलजी आशा की किरण रहे. उन्होंने पार्टी की लंबी यात्रा में ऐसे हर मोड़ पर दिशा प्रदान की. जनसंघ के दौर में कड़े परिश्रम के बाद भी दिल्ली नगर निगम के चुनावों पर पार्टी की असफलता से निराश आडवाणीजी को तसल्ली देते हुए अटलजी ने कहा था,' चलो कोई सिनेमा देखने चलते हैं.' फिर दोनो ने साथ पहाड़गंज के इम्पीरियल थियेटर में राज कपूर की फ़िल्म ' फिर सुबह होगी ' देखी थी. फ़िल्म का संदेश था - उम्मीद का दामन न छोड़ें.फोटो साभार 

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