क्या दिल्ली की हार से भाजपा कुछ सीखेगी?

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क्या दिल्ली की हार से भाजपा कुछ सीखेगी?

अखंड प्रताप सिंह

दिल्ली का चुनावी दंगल तो समाप्त हुआ, अब सवाल ये है कि जिस तरह से दिल्ली के मतदाताओं ने भाजपा को बुरी तरह से नकारा है क्या उसका कोई असर उनके आगे की रणनीति पर पड़ेगा?

वैसे तो अभी लोकसभा के आम चुनाव में काफी वक्त है पर पश्चिम बंगाल और उसके बाद बिहार का चुनाव सर पर है. भाजपा अभी पिछले दिनों में कई राज्यों में हुए चुनावों में हार के झटके से उबर भी नहीं पाई थी की दिल्ली ने सबसे बड़ा झटका दे दिया.
राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हार से तिलमिलाई भाजपा ताबड़तोड़ धारा 370 और राम मंदिर का कार्ड खेलकर निश्चिन्त हो गई और अपने को अजेय मानने लगी और फिर आया झारखंड का चुनाव. इस चुनाव में हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण के लिए पार्टी न सिर्फ बेलगाम भाषणबाजी पर उतर आयी बल्कि सारी राजनीतिक मर्यादाओं की धज्जियां उड़ा डाली पर फिर भी वहां के मतदाताओं ने भाजपा को नकार दिया.

इन राज्यों में मिली हार से भी भाजपा नेतृत्व ने कुछ नहीं सीखा बल्कि नफरत और धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए सभी तरह की मर्यादाओं को ताक पर रख दिया. दिल्ली चुनाव नजदीक आते देख एक बार फिर अपनी  उसी पुरानी रणनीति को धार देना शुरू किया और इसी के तहत सीएए और एनआरसी कार्ड खेल दिया. इसकी संभावित प्रतिक्रिया से बेखबर भाजपा नेतृत्व ने इसे अपना ट्रम्प कार्ड समझ लिया. लेकिन पूरे देश ने विशेष कर युवा वर्ग ने जिस मजबूती से इसका देशव्यापी विरोध और आंदोलन शुरू किया उसको भी समय रहते भाजपा समझ नहीं पाई और इसको और धार देती गई. और दिल्ली के चुनाव में तो सारी सीमाएं ध्वस्त हो गईं और पार्टी ने इसे एक रेफरेंडम घोषित कर दिया और चुनाव को देशभक्त बनाम देशद्रोही बना दिया. दिल्ली जैसे छोटे राज्य के चुनाव को भाजपा ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया. एक तरफ केजरीवाल की पार्टी ने जनता के सरोकारों से जुड़े मूलभूत मुद्दों पर अड़ी रही वही भाजपा ने इस चुनाव को देश की सुरक्षा और राष्ट्रवाद से जोड़ दिया और एनआरसी पर रेफरेंडम बना दिया और जनता के मूड को समझने में नाकामयाब रहे. और सरकार की पूरी ताकत झोंक दी नफरत की राजनीति को फैलाने में. दिल्ली के मतदाता इससे ऊब चुके हैं ये भी समझने में भाजपा चूक गयी.

अब जबकि 70 में से 62 सीटें जीतकर आप ने ये साबित कर दिया कि जो जनता के हितों के लिए ईमानदारी से काम करेगा वही सिकंदर कहलायेगा.

सवाल ये है कि क्या भाजपा अब भी जनता के सरोकारों से जुड़े मूलभूत मुद्दों पर काम करना शुरू करेगी. भाजपा को यहां यह नहीं भूलना चाहिये कि 2014 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी ने जनता की मूलभूत समस्याओं पर ही फोकस करके और 'अच्छे दिन आएंगे' का सपना दिखाकर जीता था. अब लगातार हार झेल रही भाजपा इस साधारण सी बात को फिर से समझ पाएगी या अपनी वर्तमान रणनीति पर ही चलेगी?

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