जनादेश

क्यों उछला बाजार ,जानना चाहेंगे ? असम में भी बढ़ने लगा कोरोना कोंकण में साबूदाने का स्वाद नेहरू अकेले रह गए कमल हासन ने क्या कहा पीएम से ट्रंप की जवाबी कार्रवाई का अर्थ क्या है डॉक्टर्स एसोसिएशन ने कहा- हमें टारगेट ना करें काम खो चुके हैं 92.5 फीसदी मजदूर ट्रम्प ने जो गोलियां मांगी हैं उन्हें भारत ने अलग कर रखा है ! यूके कोई भारत जैसा देश थोड़े ही है फिर सौ साल बाद ? यह एक नई दुनिया का प्रवेश द्वार है महिलाओं ने भी दिखाई राह ! आखिर कही तो प्रतिकार होना था ! पश्चिम की दाल यह ऊटी की तरफ जाती सड़क है आज बाबूजी का जन्मदिन है जालंधर से हिमाचल घास पर बिखरे महुआ के फूल तो केरल में थम गई महामारी!

राजपाट

 राजपाट 

राजेंद्र कुमार 

बाबू का कार प्रेम ..

सचिव स्तर के यह आईएएस अफसर लोकभवन में बैठते हैं.इसी से जाहिर है कि सूबे की सरकार में वह एक महत्वपूर्ण अफसर हैं.हमेशा चुस्त दुरुस्त और चेहरे पर मुस्कान के साथ वह अपने हर सीनियर अधिकारी तथा विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसद और विधायकों से मिलते हैं.उनके इसी स्वभाव के चलते नेता से लेकर सीनियर अधिकारी तक उन्हें रुतवेदार पद पर तैनाती दिलाते रहें हैं.राज्य के कई अतिसंवेदनशील जिलों में इनकी तैनाती रही है.केंद्र सरकार में भी वह प्रतिनियुक्ति पर कार्य कर चुकें है.ये साहब जहां कहीं भी रहें उन्होंने  किसी भी राजनीतिक दल के सांसद और विधायक के प्रार्थना पत्र को कूड़े में नहीं फेका.नेताओं से मिले हर प्रार्थना पत्र पर आवश्यक कार्यवाही लिखकर उन्होंने उसकी फोटोकापी  उसे देने वाले सांसद या विधायक को थमा दी.ताकि उस फोटोकापी के जरिये वह नेता जनता के बीच अपना रौब ग़ालिब कर सके.इसी प्रकार उन्होंने अपने सीनियर अफसरों के कहने पर उनके नजदीकी को शहर से सबसे शानदार होटल में रुकवाने में भी कभी संकोच  नही किया.कुल मिलाकर सरकारी रुतवे के साथ जीवन का आनंद लो, यह उनका फंडा है.इसके चलते वह उसी पद पर कार्य करना पसंद करते हैं, जहां उनके तथा उनके परिवार के लिए सरकारी गाड़ी (कार) मिले.उनकी इस आदत को रिटायर हो चुके आईएएस अफसर  कुवंर फतेह बहादुर सिंह ने पकड़ा था.दस साल पहले के इस वाकये को फतेह बहादुर सिंह  बड़े चुटीले अंदाज में सुनाते हैं.उनके मुताबिक उक्त अफसर की एनेक्सी भवन में विशेष सचिव के पद पर तैनाती हुई थी.जिस विभाग में वह तैनात किये गए थे, उसमें विशेष  सचिव स्तर के अफसर सरकारी पूल कार से दफ्तर आते थे.जब इन साहब को इसका पता चला तो उन्होंने अपना तबादला कराने का प्रार्थना पत्र मुझे दिया.मैंने कारण पूछा तो उन्होंने बिना लाग लपेट के कहा, सर मैं इसलिए आईएएस नही बना कि पूल वाली कार  से दफ्तर आऊं.मुझे दफ्तर आने के लिए एक एसी कार और अपने परिवार के लिए भी एक एसी कार चाहिए.ताकि वह घर के काम उस कार से जाकर परिवार के लोग कर सकें.उनकी इस इच्छा को सुनकर फतेह बहादुर समझ गए कि ये बंदा उक्त पद पर कार्य नही करेगा तो उन्होंने उनका तबादला एक मलाईदार महकमें में कर दिया.तब से लेकर आज तक ये साहब जहां कही भी तैनात रहे हैं, उनके पास दो सरकारी गाड़ियाँ हमेशा रही हैं.अब भी लिखा पढ़ी में उनके पास दो बेहरतीन कार सेवा में रहती हैं.और राज्य के मुख्य सचिव से लेकर मुख्य मंत्री के प्रमुख सचिव तक को उनके इस कार प्रेम के बारे में जानकारी है।


अंतिम चेतावनी ...

जी हाँ! सूबे के कई आला अफसरों की अंतिम चेतावनी दी गई है.वह भी सीधे मुख्यमंत्री के स्तर से.ये सीनियर अफसर अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के हैं.चेतावनी पाने वाले यह सारे ही अधिकारी समय से अपने दफ्तर नही आते.और सरकार के तय किये गए समय तक दफ्तर में नही बैठते.इनमे से कुछ अफसर तो महीने में अधिकतर समय दिल्ली में रहते हैं क्योंकि उनका मकान ही दिल्ली में है.और करीब पन्द्रह अफसर ऐसे हैं जो अधिकतर समय छुटटी पर रहते हैं.इसका परिणाम यह है कि उक्त अफसरों के मातहत भी दफ्तर में देर से आते हैं.ऐसे में अपनी समस्याओं के निदान को लेकर इस अफसरों के दफ्तरों में पहुंचने वाले लोग भटकते रहे हैं.उनकी कोई सुनवाई ही नहीं हो पाती.आला अफसरों की ऐसी मनमानी से प्रभावित किसी नेता ने मुख्यमंत्री को अफसरों के दफ्तर से गायब रहने के बारे में बताया.कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने गुप्त रूप से यह पता लगवाया कि कौन-कौन अफसर अपने दफ्तर समय से नहीं आते? और कौन अधिकारी ऐसे हैं जो अधिकतर समय दिल्ली में रहते है? और कौन अधिकारी अधिकतर छुटटी पर  रहते हैं? सूत्रों के अनुसार बीते माह मुख्यमंत्री को ऐसे अफसरों के बारे में जानकारी मिल गई तो एक आला अफसरों की एक बैठक में मुख्यमंत्री ने किसी भी अधिकारी का नाम लिए बिना ही यह ऐलान किया कि उनके संज्ञान में अफसरों के समय से दफ्तर ना आने और तय समय तक दफ्तर में ना बैठने की प्रकरण सामने आये हैं.इसलिए अबसे सभी अफसर अपने कार्यालय समय से आये, ताकि उनेक अधीनस्थ भी समय से दफ्तर आना शुरू करें.और सरकार को किसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई ना करनी पड़े.मुख्यमंत्री के इस कथन को अब अंतिम चेतावनी बताया जा रहा है.यह भी कहा जा रहा है कि सीएम साहब अपने स्तर पर यह पता लगवा रहें हैं कि जिन अफसरों के दफ्तर से गायब रहने की शिकायत मिली थी वह अब समय दफ्तर आ रहे हैं या नही।


किसी दिया सीएम को सुझाव ...

दिल्ली में एनबीसीसी प्लेस में यूपी सरकार का दफ्तर है.सीनियर आईएएस अफसर इस दफ्तर में बैठते हैं.कुछ समय पहले तक ये अधिकारी इस दफ्तर में अपनी तैनाती कराकर अपने घरेलू का निपटाया करते थे.बड़े मजे से इस दफ्तर में बैठने वालों के दिन  कट रहे थे.किसी को कोई टेंशन नही थी, यह बात लखनऊ में बैठ कुछ अफसरों को खली.और इन लोगों ने दिल्ली के उक्त दफ्तर में बैठने वाले अफसरों के कामकाज का व्यौरा तैयार कराया  गया.तो पता चला कि इस दफ्तर में बैठने वाले अधिकारी वर्तमान में सिर्फ मुख्यमंत्री और मंत्रियों के दिल्ली पहुचने पर उनसे मिलने के अलावा कुछ नही करते.बस फिर क्या था.मुख्यमंत्री की एक बैठक में इस मसले बेहद चतुराई से उठाया गया.कहा गया कि कई विभागों के  वित्तीय तथा अन्य मामले भारत सरकार में लंबित हैं, ठीक से पैरवी ना कर पाने की वजह से इनका निस्तारण नही हो पा रहा है.यदि दिल्ली में बैठने वाले सीनियर अधिकारी विभिन्न विभागों के लंबित प्रकरणों को लेकर भारत सरकार के अफसरों के साथ बैठक करेंगे तो उनका निस्तारण तेजी से हो सकेगा.कहा जाता है कि मुख्यमंत्री को बैठक में रखा गया यह सुझाव पसंद आया.तुरंत ही मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि दिल्ली के उक्त दफ्तर में बैठने वाले आला अधिकारी को बताया जाये कि वह विभिन्न विभागों के लंबित उन सभी मामलों का अनुश्रवण करेंगे और भारत सरकार के विभागीय अफसरों के साथ बैठक कर लंबित मामलों का निस्तारण करायेंगे.मुख्य मंत्री के इस आदेश की जानकारी जब से दिल्ली में बैठने वाले आला अफसरों के दी गई हैं, तब से वह यह पता लगाने में जुटे हैं कि उनकी खुशी को छिनने से संबंधित सुझाव किस अधिकारी ने बैठक में मुख्यमंत्री को दिया था।


देर से मिला पास ...

लखनऊ में आयोजित डिफेंस एक्सपो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सफल मेगा इवेंट साबित हुआ है.समूचे संसार से इसमें शिरकत करने के लिए बड़े-बड़े लोग आये.प्रधानमंत्री इस एक्सपो को संबोधित किया.एक्सपो में लगायी गई प्रदर्शनी को उन्होंने देखा और कुछ हथियारों को उठाकर फोटो भी खिचवाई.और दिल्ली लौटने से पहले प्रधानमंत्री ने शानदार तरीके से इस एक्सपो का आयोजन कराने के लिए मुख्यमंत्री की तारीफ़ की.लेकिन इस अवसर को सीएम के दो सलाहकार देख ही नहीं पाए.वजह थी, एक्सपो में आने का पास समय से ना मिलना.जिसके चलते मुख्यमंत्री के सीनियर सलाहकार ने तो मुख्यसचिव और तमाम आला अफसरों के साथ प्रधानमंत्री को मुख्यमंत्री की तारीफ़ करते देखा, लेकिन अन्य दो सलाहकार इसे देख नही सके.उनकी ही तरह विभिन्न विभागों के अपर मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव भी प्रधानमंत्री को प्रदर्शनी देखते हुए नही देख सके और क्योंकि उनके पास भी देर से मिले.इसके बाद से ही अब नौकरशाही में यह चर्चा हो रही है कि देर से पास मिलने से क्या नुकसान होता है? कितने हसीन पल लोग देख नही पते? इस चर्चा में कितने अफसरों के देर से पास मिला और कितनों को पास मिला ही नही.अब यह भी शामिल हो गया है.और इसके चलते अब तमाम अफसर अलग-अलग दावे कर रहें हैं।


अब जनजागरण अभियान...  

कांग्रेस से दूरी बना चुके यूपी के किसान फिर कांग्रेस से जुड़े.इस मंशा की पूर्ति के लिए प्रियंका गाधी के निर्देश पर यूपी में किसान जन जागरण अभियान शुरू किया गया है.6 जनवरी से समूचे प्रदेश के हर जिले में इस अभियान की शुरुआत की गई.चालीस दिन के इस अभियान के तहत   करीब ढ़ाई करोड़ किसानों से संपर्क करने का लक्ष्य रखा गया है.कहा जा रहा है कि पार्टी के रणनीतिकारों ने यूपी में प्लाप रही राहुल गांधी की किसान खाट सभा से सबक लेकर अब जनजागरण अभियान को तैयार किया है.राहुल गांधी की किसान खाट सभा बीते विधानसभा चुनावों के पहले किसानों को पार्टी से जोड़ने के लिए शुरू की गई थी.राहुल गांधी ने देवरिया से भव्यता के साथ इसे शुरू किया था.अपनी इस पहली किसान खाट सभा में राहुल ने " 27 साल यूपी बेहाल" का नारा दिया था लेकिन उनके इस नारे से ज्यादा इस किसान खाट सभा में आये किसानों का खाट लेकर चले जाना चर्चित हुआ था.और राहुल की किसान खाट  सभा का आयोजन पूरी तरह प्लाप साबित हुआ.जिससे सबक लेते हुए अब प्रियंका गांधी  के निर्देश  पर बनाये गए किसान जनजागरण अभियान में कोई नारा नही रखा गया है.पार्टी कार्यकर्ताओं को कहा गया है कि वह गांव-गांव जाकर किसानों के बीच जाकर कर्ज माफी, बिजली का बिल हाफ, गांव-गांव गौशाला निर्माण, गायों की रखवाली भत्ता और गन्ना मूल्य में इजाफा करने संबंधी मुददों को उठाये.प्रियंका गांधी को लगता है, किसानों के बीच चलाए जाने वाले ऐसे अभियान से किसानों की कांग्रेस के प्रति नाराजगी कम होगी.अब देखना यह है कि भाई के बाद अब बहन का किसानों की हमदर्दी पाने का यह अभियान कितना सफल होगा.चालीस दिन बाद तो सभी इसका पता चल जायगा, लेकिन लखनऊ में अपने को  प्रियंका गाधी का सलाहकार बताने वाले साहब तो अभियान शुरू होते ही बीमार पड़ गए है.उनकी बीमारी को सूबे के कांग्रेसी गांव ना जाने का बहाना मान रहे हैं.


चुप्पी बन रही मुसीबत

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ सूबे के जिले-जिले में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहें हैं.कांग्रेस के नेता भी इस क़ानून के खिलाफ अपना मत खुलेतौर पर जनता के बीच रख चुके हैं.सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी इस क़ानून का विरोध कर रहे लोगों के खिलाफ पुलिस की सख्त कार्रवाई का विरोध किया है.लेकिन उनके इतना भर विरोध करने से पार्टी नेता ही संतुष्ट नही हैं.पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं की मंशा है कि नेताजी की तर्ज पर अखिलेश भी जिले -जिले में पार्टीजनों को प्रोटेस्टेंट करने की छूट दें.और इस क़ानून के खिलाफ रैली निकाली जाये.नुक्कड़ सभाएं हों.लेकिन ऐसी कोई पहल करने की अनुमति अखिलेश नही दे रहें है.यह भी नहीं बता रहें हैं कि इस क़ानून को लेकर जनता के बीच क्या रुख अख्तियार किया जाये.अखिलेश के छोटे भाई की पत्नी ने जब नागरिकता क़ानून के समर्थन में बयान दिया तब भी सपा मुखिया ने चुप्पी साधे रखी.यही नहीं सपा मुखिया ने अपने संसदीय क्षेत्र में इस  क़ानून का विरोध कर रही महिलाओं पर हुए लाठीचार्ज की खिलाफत भी नहीं की.और ना ही वह पुलिस लाठीचार्ज में घायल हुई महिलाओं से मिलने गए.ऐसे में आजमगढ़ में लोगों  ने उनसे खफा होकर "अखिलेश लापता" शीर्षक वाले पोस्टर शहर भर में लगवा दिए.तब भी अखिलेश यादव खामोश रहे है.अखिलेश यादव की चुप्पी अब पार्टीजनों को बेचैन करने लगी है.उनके लिए मुसीबत बनने लगी है.पता नही यह बात अखिलेश समझ रहे हैं या नही कि राजनीति में लंबे समय तक चुप रहना मतलब जनता से दूर होना ही होता है.अब प्रियंका गांधी के यूपी में सक्रिय होने के बाद अखिलेश यादव की लंबी चुप्पी पार्टी के लिए मुसीबत बन सकती है, ऐसी चर्चाएं अब जोर पकड़ने लगी हैं.

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