सोशल मीडिया के मूर्ख ......

शंकर गुहा नियोगी को भी याद करें नौकरी छीन रही है सरकार मौसम बदल रहा है ,खाने का जरुर ध्यान रखें किसान विरोधी कानून रद्द करने की मांग की क्या बिहार में सत्ता के लिए लोगों की जान से खेल रही है सरकार कांकेर ने जो घंटी बजाई है ,क्या भूपेश बघेल ने सुना उसे ? क्या मुग़ल काल भारत की गुलामी का दौर था? अधर में लटक गए छात्र पत्रकारों के बीमा का दायरा बढ़ाए सरकार बिहार चुनाव से दूर जाता सुशांत का मुद्दा सड़क पर उतरे ऐक्टू व ट्रेड यूनियन नेता किसानों के प्रतिरोध की आवाज दूर और देर तक सुनाई देगी क्या मोदी के वोटर तक आपकी बात पहुंच रही है .... खेती को तबाह कर देगा कृषि विधेयक- मजदूर किसान मंच दशहरे से दिवाली के बीच लोकतंत्र का पर्व बेनूर हो गई वो रुहानी कश्मीरी रुमानियत सिविल सर्जन तो भाग खड़े हो गए चंचल .. चलो भांग पिया जाए क्यों भड़काने वाले बयान देते हैं फारूक अब्दुल्ला एक समाजवादी धरोहर जेपी अंतरराष्ट्रीय सेंटर को बेचने की तैयारी

सोशल मीडिया के मूर्ख ......

हरि शंकर व्यास

इसलिए कि मुझे नया इंडिया को हल्का, बेरंग बनाना पड़ा है. आपकी शिकायत सही है कि मेरा न तीन में और न पांच में वाला अखबार है बावजूद आप पक्के पाठक हैं. अखबार ढूंढ़ कर पढ़ते हैं तो इतना तो हो कि अखबार वाली फीलिंग जैसा आकार-प्रकार बनाए रहें. पेज घटाएं, बरदाश्त है मगर पूरा काला सफेद तो न बनाएं.आपकी शिकायत सचमुच सिर आंखों पर. मगर करूं क्या? न मेरे बस में कुछ है और न अपने पास कोई भामशाह है. वैसे किसी के भी बस में कुछ नहीं है. यहां तक की नरेंद्र मोदी, अमित शाह के बस में भी कुछ नहीं है. ये दोनों अपनी आदत, अहंकार और उन मूर्खताओं के मारे हैं जो इन्हें दिखलाई दे रहा है रंग-बिरंगा इंद्रधनुष लेकिन हकीकत में है सब काला अंधेरा, बेरंग. ये अपने अंधेरे में, अपने बनवाए अंधेरे में ‘न्यू इंडिया’ का वह दिवास्वप्न देख रहे है, जिसमें न ‘नया इंडिया’ की जरूरत है और न बुद्धि की, न लेखन की, न पत्रकारिता की, न स्वतंत्र सत्यशोधन की जरूरत है.ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की, हाकिम के कहे अनुसार उठक बैठक कराते रहते हैं.कई मायनों में आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है. ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है. तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं. अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है. आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ. आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे. वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद अपने मुंह से ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं.सोचें, क्या हाल है. हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था. और यह मेरा निचोड़ है मतलब जो कलमघसीट 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है. मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं और मैं इसमें ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए. यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ साल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें. आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें.आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं. एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं. मालिकों को बुला कर हड़काते हैं. धमकियां देते हैं. जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता हैं उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो. सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई. इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो. इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी. जय हो अमित शाह. जय हो अरूण जेटली. और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें. लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है. ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है.सो, ‘न्यू इंडिया’ बन रहा है तो ‘नया इंडिया’ की क्या तुक. यह मेरी पुरानी थीसिस है कि हम हिंदू भक्ति और गुलामी में जीते हुए अपने को दोयम बनाए रखने के लिए शापित हैं. इसी फ्रेमवर्क में गांधी-नेहरू के व्यवहार से ले कर नरेंद्र मोदी तक के व्यवहार को तौलते हुए अपने को जो समझ आया उस पर मैंने हिंदू तासीर में विचार किया. हिंदू के गुलाम डीएनए से अपने को मुक्त बनाए रखने की जद्दोजहद में तभी यह कभी नहीं सोचा कि यदि ऐसा लिखा तो क्या होगा. हिंदू बहुल इस देश में स्वतंत्र हिंदू बन कर रहा जा सकता है या नहीं, यह कसौटी कई कारणों से अपने लिए अहम रही है. (इस पर फिर कभी लिखूंगा.)कोर बात यह है कि दक्षिणपंथ और हिंदू हित ने 1978 से ले कर अब तक मैंने अपने को जैसे जो ढाला उसका कोर स्वतंत्रता रही है. विचार आजादी है. उसके साथ यह प्रमाणित करने की कोशिश भी है कि हिंदू कायर नहीं होते. मूर्ख नहीं होते और हिंदू के लिए जरूरी है वह बौद्धिक उर्वरता, जिससे उसके लिए भी कभी पुनर्जागरण का अवसर बने.भला इन बातों का नरेंद्र मोदी, अरूण जेटली, अमित शाह के वामन अवतार में क्या मोल है? मोदी-शाह ने संघ परिवार के अनुशासन, उसके बौद्धिक विन्यास से समझ रखा है कि ये सब गुलाम डीएनए का सत्व-तत्व लिए हुए हैं. ये जब ऐसे हैं तो सवा सौ करोड़ भी वैसे ही हैं. इनके लिए हम अवतारी राजा है और ढाई लोग बना देंगे एक ‘न्यू इंडिया‘. यों भी हमारे पुराण सत्तावान को भगवान विष्णु का सृष्टिकर्ता अवतार बता गए हैं. सो, नरेंद्र मोदी गंगा के घाट रूद्राक्ष- भगवा धारण कर अपने को शिव अवतार क्यों न समझें. क्यों न बोलें कि वे भगवान शिव की तरह गले में दुनिया भर का विष ग्रहण किए हुए हैं. उन्हें सब पता है. सर्वज्ञ हैं. वे समर्थ हैं श्रीकृष्ण की तरह श्रीमुख में सवा सौ करोड़ लोगों को ब्रह्माण्ड दर्शन करवाने में. वे तो राजा हरिश्चंद्र. वे शूरवीरों के शूरवीर. सोने की चिड़िया के ‘न्यू इंडिया’ वाले सृष्टिकर्ता.जब ऐसा है तो हर दिन जमीन का अहसास कराने, पतन के चेहरे, बौनों के राज, नोटबंदी को मूर्खता की पराकाष्ठा कहने वाला, जीएसटी को विकृत बताने वाला, नवाज शरीफ के साथ पकौड़े खाने या जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ एलायंस के नुकसान बताने वाला ‘नया इंडिया’ भगवानजी के लिए किरकिरी तो बनेगा ही. तभी नरेंद्र मोदी का 2014 में जब राज आया तब नया इंडिया 16 पेज का दौड़ता हुआ अखबार था. आठ पेज रंगीन. आज स्वरूप आठ पेज और बेरंग होने का यदि है तो इसलिए भी कि मैं खुद रंगीन नहीं हूं. काला पेन, काली स्याही से समझ आने वाले सफेद, काले, सच-झूठ में घूमता रहता हूं.अब यह अपना मन है तो है. मेरे लिए तो यह हिंदू के गुलाम डीएनए की कसौटी वाली परीक्षा में पास-फेल होना है. विज्ञापन नहीं आए तो बंद कर देंगे अखबार. लिखना तो बंद नहीं होगा. सो, पाठक माई बाप, महत्व इस बात का है कि मैं लिखता रहूं. हम लिखते रहें. मैं, डॉक्टर वैदिक, शंकर शरण, पंकज शर्मा, बलबीर पुंज, अजीत, श्रुति सब लिखते रहें. मोदी से जब उम्मीद थी तब भी खम ठोंक लिखा था. वे तुगलकी हुए तो उसमें भी अधिक खम ठोंक गलत होने की व्याख्या में हिचक नहीं. नोटबंदी पर जब मैंने लिखा था तो असंख्य पाठकों ने उलजुलूल बातें कीं. सोशल मीडिया के मूर्ख हिंदू लंगूरों ने दस तरह की बातें फैलाई. तब अपना तर्क था- इंतजार करो, वक्त पर छोड़ो बात को. मैं सही या गलत इसका फैसला वक्त को करने दें. यदि वक्त ने मुझे गलत प्रमाणित किया तो बतौर हिंदू राष्ट्रवादी माफी मांगने की मर्दानगी भी मैं रखता हूं. सही या गलत पर विचारते हुए अपना काम तो कलम घसीटते जाना है. उस धर्म-कर्म को गालियों की चिंता न है और न होगी.सो, पाठक माई-बाप पेज कम हो या स्याही रंगीन न हो फर्क नहीं पड़ता. जरूरी कलम और काली स्याही है. सोचें, सरस्वती और लक्ष्मी का साथ नहीं होता है मगर कलम और स्याही दोनों की पूजा में इनकी अनिवार्यता है.हम सब आज के परिवेश के मारे हैं. मैं चोर हूं, आप चोर हैं, ढाई लोगों को छोड़ कर सभी सवा सौ करोड़ लोग चोर हैं तो हमें दंड तो भुगतना होगा. याद है न आपको इस देश की सत्ता, सिस्टम से निकली उफ वह बात. संसद में कही वह बात कि यह कैसी सवा सौ करोड़ की आबादी है जो टैक्स नहीं देती. इसलिए उन्होंने ठाना हुआ है कि वे हम चोरों को ठीक कर ‘न्यू इंडिया’ बनाएंगे. जो है उसे बेरंग करेंगें, उसे अंधेरे में डुबोएंगे. उसका ध्वंस करेंगे. और फिर इस ध्वंस फिर मोदीजी अपनाी ‘न्यू इंडिया’ की वह सृष्टि रचेगें जिसे देख दुनिया कहा करेगी कि जो तुगलक नहीं कर पाया उसे इक्कीसवीं सदी के तुगलक ने कर दिखाया.फिर माफी के साथ आग्रह कि जब हम सब अंधेरे में हैं, काली दिवाली मना रहे हैं, लक्ष्मीजी रूठ गई हैं तब भी न छोड़ें सरस्वती आराधना. रखें भरोसा कलम, स्याही पर. नया इंडिया पर. जरूर यह नोट करके रखें कि न नया इंडिया गलत होगा और न आप. हां, अहंकार का ध्वंस रावण की तरह ही होगा. साभार -नया इंडिया


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