जनादेश
संजीव पालीवाल की 'नैना'

आशुतोष

लगता है आप मित्रों ने संजीव पालीवाल की 'नैना' नहीं पढ़ी है.  नहीं पढ़ी है तो ज़रूर पढ़ें.  मैंने पूरी पढ़ी. मज़ा आ गया.  थ्रिलर है, रहस्य है,  रोमांच है और सबसे बड़ी बात टीवी न्यूज़ की दुनिया की सैर है. एक टीवी एंकर का क़त्ल होता है, जिसे प्रधानमंत्री भी फालो करते हैं. नैना क़त्ल के बावजूद हर पेज पर मौजूद है. वो मर्दवादी पुरुषों को चुनौती देती चलती है. उनकी कमज़ोरियों को रेशे-रेशे उधेड़ती चलती है.  ख़बरों की दुनिया के बड़े-बड़े शेर कैसे दुविधाओं में जीते हैं. कैसे उनकी निजी कमज़ोरियां स्त्री की स्वतंत्रता को नहीं समझ पाती हैं और कैसे वो एक काल्पनिक दुनिया में गोते लगाते खुद का क़त्ल कर बैठते हैं. 

ये उपन्यास स्त्री विमर्श नहीं है,  न ही ये पुरुषों को गाली देता है. संजीव ने ऐसा कथानक बुना है कि जहां हर पेज के साथ अगर क़ातिल की पहचान और रहस्यमय होती जाती है और हर पेज पर पुरुष खुद को ही आश्चर्यजनक रूप से असहाय पाता है.  मजबूर और निकम्मा. कहीं वो प्रेमी होने का ढोंग करता है, कहीं पति. कहीं वो संपादक है तो कहीं पुलिस अफ़सर या फिर नेता.  मेमने सभी हैं.  दूसरों का दोहन करते-करते कब खुद एक्सप्लायट हो जाते हैं, पता नहीं चलता. 

क्या ये सच्ची कहानी है ? अगर है तो फिर नायिका कौन है ? और नहीं तो किससे प्रेरित है ? वो संपादक कौन है ? ध्यान से खोजेंगे तो आसपास मिल जायेगा.  गुर्राता हुआ और अकेले में रोता हुआ. संजीव से खूब पूछा पर जमे हुए कथाकार की तरह चुप्पी साधे रहे . 

पढ़िए और फ़ौरन पढ़ें . मज़ा आएगा और एक बार पढ़ना शुरू किया तो क़ातिल खोजे बग़ैर किताब छोड़ नहीं पाएंगे. 

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