क्या कभी ऐसी कढावणी देखा है

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क्या कभी ऐसी कढावणी देखा है

तकरीबन दो दशक पहले तक गांव में कढावणी मिल जाया करती थी.ज्यादा पीछे जाना चाहते हैं तो उस समय हर घर में पशु हुआ करते थे.दुधारू पशुओं में गाय और भैंस लगभग हर घर में लाज़मी हुआ करती थी.दूध, दही, लस्सी, घी अलूणा घी (माखन) हर घर में बहुतायत में मिलते थे.इनके प्रबन्धन का जिम्मा माँ ,दादी के हिस्से में हुआ करता था.

आप मिट्टी से बने जिस मटके नुमा बर्तन को देख रहे हैं उसे कढावणी कहते हैं.मेरी उम्र के गाँव वाले मित्र इसे अवश्य पहचानते होंगे.इसका मुँह और पेट दोनों ही चौड़े हुआ करते थे.कुम्हार इस पर अपनी कढ़ाई से इसका रूप सुंदर बना देते थे.सुबह सबके दूध के वितरण के बाद बचे हुए दूध को कढावणी में डाल दिया जाता था.घर के आंगन के एक कोने में थोड़ी जमीन खोदकर मिट्टी के लेप से लिपे हारे में उपलों के टुकड़े गोलाकार रूप देकर और उनमें थोड़ी आग सिलगाकर उनपर कढावणी को रख दिया जाता था.दिन भर उपले सिलगते रहते और दूध गर्म होता रहता.बीच बीच में इसे देख लिया जाता था कि कहीं दूध बाहर न निकल रहा हो।अब बात करते हैं इसके ढक्कन की.मिट्टी से बने इस ढक्कन को झावला कहा जाता था.आप इसमें छेद देख रहे हैं इनका अपना महत्व है.जब हारे में उपले अंगारे बन जाते थे तो दूध में उबाल आता और दूध के उफन जाने की नोबत आ जाती थी.ऐसी स्थिति में ये झावले के छिद्र भाप को लगातार बाहर करते रहते और दूध के उफान को रोक लेते जिससे दूध कढावणी से बाहर नहीं निकलता था.माँ या दादी अग्नि के ज्यादा प्रचंड हो जाने पर झावले को उतार देती थी और कुछ समय दूध की रखवाली करने के लिए वहीं बैठ जाती थी।

शाम तक यह कढावणी का दूध गेरूआ रूप ले लेता था.मैंने कढावणी में तिरमिरे वाली मलाई खूब खाई है जो बेहद स्वादिष्ट और ताकत देने वाली होती थी.हालांकि मलाई खाने के चक्कर में दादी की डांट और झाड़ू भी खाई हैं जिनका अपना अलग तरह का स्वाद हुआ करता था.इस सारे दूध को बिलोवणे में पलोह दिया जाता था और कढावणी के पेट पर, ऊपर नीचे लगी मलाई को (छिप्पी) खुरचण से उतार कर बिलोवणे में ही डाल दिया जाता था.फिर दूध में जामण देकर पीढ़े पर रखकर बांध दिया जाता था.रस्सी से बाँधना इसलिए आवश्यक था कि कहीं रात में बिल्ली या कुत्ता अपनी सेहत न बना जाए.ऐसा होने पर दादी या माँ की भड़क (जिसे आप आज का ब्लड प्रेशर कह सकते हैं) दिनभर शांत नहीं होती थी.सम्भावना किसी न किसी बच्चे की कुटाई की बनी रहती थी.एक बात और दूध को मौसम के हिसाब से जैसे सर्दियों गर्म कपड़े से ढक दिया जाता था ताकि वो सही जम जाए.

बदलते समय, पशुओं के पालकों की कमी, संयुक्त परिवार का बिखरकर एकल परिवार में बदलने के कारण कढावणी भी अपना अस्तित्व खोती गई.अब कढावणी की जगह उसी के रूप जैसे सिल्वर से बने देगचे ने ले ली.आप समझ सकते हैं कि हम आधुनिकीकरण के दौर में असल स्वाद से वंचित हो गए.आज के समय में शायद ही किसी घर में कढावणी हो या आज के बच्चे इससे परिचित हो.हाँ आज हर घर में बच्चों से लेकर बड़ों तक कढावणी की बजाए कड़वाहट से जरूर परिचित हैं.

मैं जानता हूँ इस चित्र को देखकर आपको गाँव, माँ, हारा, उपले, कढावणी, वो गेरुआ दूध, मलाई, मक्खन, ललवासी लस्सी, दही आदि खूब याद आ रहे होंगे.देखिए अपुन लेखक नहीं हैं जो अलंकृत भाषा शैली में ज्यादा बेहतर लिख पाएं.देशी सा मानुष हूँ और खूब मॉडर्न मेट्रो सिटी में रहने के बाद भी गाँव की बात करता हूँ और उतनी ही करता हूँ जितना गाँव को उसमें रहकर जिया है।

अगर आपको इस फोटो से जुड़ा अपना समय याद आता हो तो जरूर लिखें.आप जितनी देर लिखेंगे उतनी देर तक उस वक्त को दिल से जियेंगे.बाकी लाइक कमेंट जैसी मोहमाया अब मन विचलित नहीं करती.साभार आर्गेनिक खेती 

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