जनादेश
बच्चों के हाथों से कलम नहीं छीननी चाहिए-सुनील जोगी


अखंड प्रताप सिंह

लखनऊ. पद्मश्री डा सुनील जोगी कविता साहित्य के क्षेत्र में एक जाना माना नाम है. सौ से अधिक पुस्तकों के रचयिता और लगभग दस हज़ार कवि सम्मेलनों में अपनी सक्रिय भागीदारी कर चुके जोगी को उत्तर प्रदेश सरकार ने भी यश भारती सम्मान से नवाजा है. हिंदी साहित्य के साथ कई हिंदी फिल्मों में अभिनय का लोहा मनवाने वाले सुनील जोगी ने फ़िल्म मुक्काबाज़ और ठाकरे के  लोकप्रिय शीर्षक गीत भी लिखे  है.जोगी ने जल्द ही आने वाली फिल्म वनरक्षक का शीर्षक गीत भी लिखा है जिसे मशहूर गायिका शुभा मुदगल ने गाया है. पिछले दिनों सुनील जोगी से  हुई बातचीत के कुछ अंश- 

*देश में जो हालात चल रहे हैं उसके बारे में एक कवि हृदय क्या सोचता है?
-हमारा देश लगता है छोटे छोटे मुद्दों में उलझ कर रह गया है. हमें देश की प्रगति में योगदान देने वाले बड़े बड़े मुद्दों पर काम करना चाहिए. जनसंख्या पर काम करना बहुत बड़ी आवश्यकता है. इसके लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून आना चाहिए और इसे धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिए.

*आप तो देश के कोने कोने में घूमते रहते हैं आपको क्या लगता है केंद्र सरकार से जनता की और क्या अपेक्षाएं हैं?
-जनता चाहती है सरकार जन सरोकार से जुड़े बड़े मुद्दों पर प्रभावी कार्य करे. आरक्षण एक बड़ी समस्या है इस पर काम करना चाहिए. इसे योग्यता और वरियता से जोड़ा जाना चाहिए. गरीबों के बच्चों की फीस माफ होनी चाहिए. आर्थिक आधार पर उन्हें सुविधाओं में मदद देनी चाहिए.

*बढ़ते प्रदूषण और मिलावट पर आपका क्या कहना है?
-मेरा मानना है प्रदूषण और मिलावट के खिलाफ जंग होनी चाहिए. स्वच्छ वायु, जल और शुद्ध भोजन पर सरकार को ध्यान देना चाहिए. 

*सरकारों द्वारा मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
-मुफ्तखोरी बिल्कुल बन्द होनी चाहिए. किसी को भी मुफ्त में कुछ नहीं दिया जाना चाहिए बल्कि उन्हें सक्षम और सबल बनाया जाना चाहिए वो भी बिना किसी भेदभाव के.

*हाल के जेएनयू और जामिया के घटनाक्रम पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
-बहुत दुखद है. मैंने तो जामिया मिलिया इस्लामिया से पीजी और पीएचडी की है और वहां से उर्दू भी सीखी है. शिक्षा के स्थान पर सिर्फ शिक्षा होनी चाहिये. शिक्षण संस्थाओं को राजनीति का अड्डा नहीं बनना चाहिए.

*आपको नहीं लगता देश में आज एक दहशत का वातावरण है? कोई भी कुछ बोलने से डर रहा है.
सारे कवि भी चुप बैठे हैं?
-ऐसा नहीं है बोलने वाले बोल रहे हैं.लेकिन मेरा मानना है सरकार को ऐसी व्यवस्था देनी चाहिए कि छोटा से छोटा आदमी भी बड़े से बड़े लोगों की शिकायत कर सके.

*साहित्य को बढ़ावा देने के क्षेत्र में ये सरकार क्या कर रही है?
-साहित्य को बढ़ावा देने का कोई काम नहीं हो रहा है. पहले लाइब्रेरियों जो किताबें जाती थीं उसे या तो बन्द कर दिया गया है या बहुत कम कर दिया गया है. 

*पर सरकार तो इसके डिजिटलीकरण पर काफी काम कर रही है.
-डिजिटल इंडिया ठीक है पर किताबें खत्म नहीं होनी चाहिए. पुस्तकों से नई पीढ़ी दूर हो रही है यह ठीक नहीं. बच्चों के हाथों से कलम नहीं छीनी जानी चाहिए. मेरा मानना है जैसे हम शरीर को हफ्ते मे  एक दिन उपवास पर रखते हैं वैसे ही हमें हफ्ते में एक दिन डिजिटल उपवास भी करना चाहिए. फेसबुक, व्हाट्सअप, ट्विटर और इंस्टाग्राम की वजह से हम अपने परिवार से दूर होते जा रहे हैं. मोबाइल ने इंसान को बौना बना दिया है.

*देश की जनता को कोई और संदेश देना चाहते हैं?
-देश एक संक्रमण काल से गुज़र रहा है. सबको अपने विवेक से काम लेना चाहिए. किसी का भी भक्त होना अच्छा है पर अंधभक्त होना ठीक नहीं. रिश्तों की मिठास नहीं खत्म होनी चाहिए.

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