लखनऊ में सम्मानित हुए नेपाल के हिंदी विज्ञानी मंगल प्रसाद

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लखनऊ में सम्मानित हुए नेपाल के हिंदी विज्ञानी मंगल प्रसाद

यशोदा श्रीवास्तव
काठमांडू. नेपाल मे हिंदी को मुकाम दिलाने के लिए संघर्षरत प्रमुख समाजसेवी व हिंदी भाषा विज्ञानी मंगल प्रसाद गुप्ता को उत्‍तर प्रदेश भाषा संस्थान तथा हिंदी व आधुनिक भाषा विभाग लखऊ विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम में मंगलवार को सम्मानित किया गया. नेपाल के हिंदी विशेषज्ञ गुप्ता को विश्व हिंदी विषय पर मनन और संघर्ष के लिए सम्मानित किया गया. मंगल प्रसाद गुप्ता नेपाल में प्रमुख राजनेता के साथ-साथ हिंदी मंच नेपाल के अध्यक्ष भी हैं. इन्होंने हाल ही विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर दस जनवरी को काठमांडू में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन आयोजित किया थाजिसमें भारत समेत करीब एक दर्जन देशों के हिंदी प्रेमियों ने शिरकत की थी.

विश्व हिंदी विषय पर दिए गए अपने व्याख्यान में मंगल गुप्ता ने भारत में नेपाली भाषा को आठवीं अनुसूची में दर्ज करने की सराहना के साथ अफसोस जाहिर किया. भारत में नेपाली भाषा को यह सम्मान तब हासिल है जब महज कुछ प्रतिशत लोग ही नेपाली भाषा का प्रयोग करते हैं जबकि नेपाल में 95 प्रतिशत लोगों में बोली जाने वाली हिंदी स्कूलों तक में नहीं पढ़ाई जाती.

 लखनऊ विश्वविद्यालय के कम्युनिटी हाल में आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने शिद्दत से कहा कि हिंदी विश्व की शक्तिशाली भाषाओं में से एक है, पूरी दुनिया में करीब 80 करोड़ लोगों द्वारा यह पढ़ी और बोली जा रही है,  लेकिन नेपाल में हिंदी का कोई मुकाम नहीं है, यह पूरी तरह उपेक्षित है. उन्होंने नेपाल में हिंदी के अतीत और वर्तमान पर तुलनात्मक प्रकाश डालते हुए कहा कि  हिंदी जिसका नेपाल में कभी गौरवशाली अतीत रहा है. वह आज इस दशा में है कि काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में इस विषय के मात्र 6 विद्यार्थी हैं. उन्‍होंने कहा कि  नेपाल का जनक माने जाने वाले पृथ्वी नारायण शाह स्वयं भी हिंदी के कवि थे. इनकी स्वयं की ढेर सारी रचनाएं हिंदी में होने का प्रमाण मिलता है. योगी गोरखनाथ पर लिखी इनकी कविता आज भी नेपाल में पढ़ी जाती है. उस समय के नेपाल में पहाड़ से लेकर मैदान तक हिंदी के बहुत सारे साहित्यकार हुए जिन्होंने हिंदी मे एक से एक लोकप्रिय रचनाएं की. नेपाल में हिंदी साहित्य में संत महात्माओं का योगदान अविसमरणीय है.  हिंदी के उत्थान में राजा महाराजाओं में पृथ्वी नारायण शाह के बाद श्री -5  राजेंद्र के सुपुत्र श्री- 5 उपेंद्र वीर विक्रम का नाम भी प्रमुख है. आजादी के बाद 1951 तक हिंदी नेपाली शिक्षा का माध्यम रही और नेपाली प्रशासन की भाषा. पृथ्वी नारायण शाह के शासन काल में प्रशासनिक कार्य हिंदी के साथ स्थानीय भाषा में होता रहा. आपको बता दें कि राजाओं के 104 वर्ष के शासन में भाषा को लेकर कोई समस्या नहीं थी. हिंदी और नेपाल दोनों का समान महत्व था. वर्ष 1951 के राजनीतिक परिवर्तन के बाद 1954 में राष्ट्रीय शिक्षा योजना आयोग की स्थापना हुई.  इस आयोग के 1956 की संस्तुति के आधार पर नेपाल में हिंदी शिक्षा की पढ़ाई बंद कर नेपाली शिक्षा की अनिवार्यता कर दी गई है. 

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