जनादेश
बहुत ध्यान रखते है ताकि छवि खराब न हो !

संजय कुमार सिंह

हिन्दी अखबार सरकार के खिलाफ और जनहित की खबरों के मामले में तो कमजोर हैं ही, उन खबरों को भी दबा देते हैं जिससे सरकार या भाजपा की छवि खराब होती हो. बहुत दिन नहीं हुए जब भ्रष्टाचारियों अपराधियों को अखबारों का डर होता था और खबर छपने पर कार्रवाई होती थी. अब ना खबरें छपती हैं और ना कार्रवाई होती है. अपराधी रिपोर्टर का धर्म जांचते हैं और धमकाते हैं कि फलाने धर्म के हो तो फलाने मोहल्ले का वीडियो क्यों बना रहे थे. पुलिस ऐसी नहीं है कि प्रेस कांफ्रेंस करके बताए कि इस मामले में हमने अमुक लोगों को हिरासत में लिया है या मामला दर्ज किया है. अब यह सब नहीं होता है और यह कोई नई बात नहीं है.
नई और इससे भी शर्मनाक बात यह है कि ज्यादातर अखबार उन खबरों को महत्व नहीं देते हैं जिससे सरकार या भाजपा की छवि खराब होनी हो. इसमें अदालती फैसले शामिल हैं. वैसे तो यह यह रोज की बात है और ज्यादातर मामलों में सही है पर पहली बार मैंने इसे तब रेखांकित किया जब शपथ लेने के बाद लोक सभा में सांसदों ने जयश्री राम के नारे लगाए. यह बिल्कुल नया और अनूठा था लेकिन ज्यादातर अखबारों में खबर पहले पन्ने पर नहीं थी. तब मैंने लिखा था, इस संपादकीय ‘संयम’ को क्या नाम दूं? अखबार सरकार के खिलाफ खबर नहीं छापते हैं तो बात समझ में आती है. लेकिन शपथ लेने के बाद सांसदों ने अगर  ‘जयश्रीराम’, ‘अल्ला हू अकबर’, ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ का नारा लगाया तो यह कम महत्वपूर्ण नहीं है और इसे महत्व देने से कोई यह कहेगा भी नहीं कि इसे पहले पन्ने पर नहीं छापते.
निश्चित रूप से यह संपादकों का अपना निर्णय रहा होगा और क्यों रहा होगा इसे समझना मुश्किल नहीं है. पहली बार मैंने इसका जो निष्कर्ष निकाला था वह गलत नहीं है और आज इस पर मेरा ध्यान इस तथ्य से गया कि बलात्कार के आरोपी पूर्व केंद्रीय मंत्री (भाजपा के गृहराज्य मंत्री) का जन्म दिन मनाए जाने की खबर है. जमानत मिलने पर एनसीसी के बच्चों से सम्मान कराने की खबर हम पहले पढ़ चुके हैं अब वे जन्म दिन भी मना ही सकते हैं. और मना रहे हैं तो इसे प्रमुखता देने में क्या दिक्कत होनी चाहिए? लेकिन खबर पहले पन्ने पर तो नहीं दिखी. इसी तरह, इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी. निश्चित रूप से यह बड़ी खबर है पर नवोदय टाइम्स, हिन्दुस्तान और अमर उजाला में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की छोटी सी खबर मिली. आपको पता चला क्या?
इस खबर को ढूंढ़ते हुए मुझे उन्नाव के विधायक, पूर्व भाजपा नेता कुलदीप सिंह सेंगर को शिकायतकर्ता के पिता की हत्या का भी दोषी पाए जाने की खबर याद आई. यह अपने किस्म की पहली और बहुत महत्वपूर्ण खबर है. जब अखबार अपनी तरफ से जनहित की खबरें नहीं छाप रहें हैं तो ऐसी खबरों को महत्व देना ही चाहिए. इसका अच्छी तरह फॉलो अप भी किया जाना चाहिए पर हिन्दी के अखबार ऐसे साधारण काम भी नहीं कर रहे हैं. सेंगर की खबर अमर उजाला, दैनिक जागरण और नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर डबल कॉलम में है जबकि दैनिक हिन्दुस्तान में सिंगल कॉलम और नवभारत टाइम्स तथा दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर है ही नहीं.
इसके मुकाबले मध्य प्रदेश की सरकार गिराने और भाजपा विधायकों को खरीदने की कोशिश ऐसे छपी है जैसे मामूली बात हो. नवभारत टाइम्स में दो कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, कमलनाथ के खिलाफ गुड़गांव के होटल में खिल रहा था कमल? राजस्थान पत्रिका ने इस खबर को लीड बनाया है और शीर्षक है, मध्य प्रदेश में ऑपरेशन कमल (नाथ). दोनों शीर्षक से आप समझ सकते हैं कि दोनों खबरों की प्रस्तुति कैसी होगी. दैनिक भास्कर ने इसकी खबर ऐसे छापी है जैसे विधायक मॉर्निंग वॉक पर गए हों और चार अभी भी गायब हैं वह महत्वपूर्ण नहीं है.
इसके साथ यह भी बताया गया है कि चार विधायकों की लोकेशन नहीं मिल रही है. अगर चार विधायक वाकई गायब हैं और उनकी लोकेशन नहीं मिल रही है, हत्या-अपहरण का शक है तो यह खबर लीड होगी. टहलने गए हैं तो कोई बात ही नहीं है. पर सबको पता है कि वे खुद गायब होंगे इसलिए यह शीर्षक है.
दिल्ली दंगे के दौरान भी ऐसा ही हुआ. दंगाइयों ने भाजपा के एक मुस्लिम नेता का घर फूंक दिया. निश्चित रूप से यह बड़ी खबर है. हिन्दी अखबारों ने अपने स्तर पर तो यह खबर नहीं ही की बाद में एजेंसी की इस खबर को पहले पन्ने पर नहीं लगाया. देश की राजधानी में दंगा हो और सत्तारूढ़ दल के नेता का घर फूंक दिया जाए उन्हें पुलिस (और सहयोगियों) से मदद ना मिले यह आम दंगापीड़ित होना नहीं है. पर अखबारों ने इसे भी महत्व नहीं दिया. ऐसे कितने ही मामले रोज होते हैं पर अखबार अपनी साख लगातार खराब कर रहे हैं.

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