जनादेश
राजद के अहंकार से महागठबंधन की खुलती गांठ

फज़ल इमाम मल्लिक 

पटना .बिहार में विधानसभा चुनाव इस साल होने हैं. चुनावी बिसात पर शह व मात की तैयारी चल रही है. एनडीए ने तय कर लिया है कि वह नीतीश कुमार के चेहरे पर ही चुनाव लड़ेगा. यह अलग बात है कि नीतीश कुमार के चेहरे की चमक फीकी पड़ी है और उन पर सृजन घोटाला से लेकर मोबाइल घोटाल के दाग तो हैं ही, मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड का दाग भी है. शेल्टर होम कांड में चौंतीस बच्चियों के साथ बलात्कार नीतीश सरकार के संरक्षण में हुआ, सुप्रीम कोर्ट कई बार ऐसा कह चुकी है. लेकिन भाजपा को यह दागदार चेहरा पसंद है. लेकिन चेहरे को लेकर उठापटक महागठबंधन में ज्यादा है. राजद ने एकतरफा फैसला लेकर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर डाला है.

लेकिन ऐसा करने से पहले उसने महागठबंधन के साथी दलों से राय लेने की भी जरूरत महसूस नहीं की. इसके बाद से ही महागठबंधन में पड़ी गांठ खुलती जा रही है. दरअसल राजद का रवैया दूसरे दलों को साथ लेकर चलने का नहीं, बल्कि अपने फैसले थोपने का रहा है. दूसरे दलों को उसका यह रवैया पसंद नहीं आरहा है. वह राजद के रवैये से असहज महसूस कर रहे हैं. कांग्रेस भी राजद से आहत है. राजद सबसे बड़ा दल है महागठबंधन में, लेकिन सच यह भी है कि लोकसभा चुनाव में महागठबंधन के सभी दलों की हालत एक जैसी रही. कांग्रेस ने सिर्फ एक सीट जीत कर महागठबंधन की इज्जत बचाई, वर्ना राजद हो, रालोसपा, हम या वीआईपी, सबकी झोली खाली रही.


लोकसभा नतीजों के लिहाज से तो कांग्रेस ही बड़ी पार्टी है लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में राजद को 80 सीटें मिलीं थीं और इसे लेकर वह अकड़ रही है. राजद फैसले एकतरफा लेता रहा है. सहयोगी दलों के साथ उसका रवैया सम्मानजनक नहीं है. राज्यसभा चुनाव में भी कांग्रेस को भी उसने तवज्जो नहीं दी और अपनी की. हालांकि लोकसभा चुनाव के वक्त कांग्रेस को एक सीट देने की बात कही थी लेकिन जब सीट देने की बारी आई तो उसने एक बड़े व्यापारी को सीट बेच डाली. कांग्रेस भी इससे आहत है. तलवारें म्यान से निकली हुई हैं. राजद के रवैये से आहत रालोसपा भी है और हम भी. कांग्रेस को हालांकि विधान परिषद के चुनाव में साधने की कोशिश राजद कर सकता है. लेकिन महागठबंधन को दूर तक चलाने के मूड में राजद दिखता नहीं है. उसे भ्रम हो गया है कि वह अकेले अपने बूते चुनाव जीत लेगा. 


सीएए और एनआरसी को लेकर राजद का रवैया बेहद मायूस करने वाला रहा. करीब तीन दशक से राजद के साथ खड़ा रहने वाला मुसलमान भी आहत तो है ही ठगा हुआ महसूस कर रहा है. न तो लालू यादव और ने ही उनके युवराज तेजस्वी यादव सीएए और एनआरसी के खिलाफ मुखर होकर बोले. हद तो यह है कि 25 जनवरी को सीएए और एनआरसी के खिलाफ बिहार भर में मानव कतार बनाई गई तो फुलवारी शरीफ के इमारत शरिया के पास भी लोग कतार में लोग खड़े थे. वहां से तेजस्वी यादव गुजरे, हाथ हिलाया और कतार में खड़े लोगों से मुलाकात तक करने की जहमत नहीं उठाई. राजद के कई दिग्गज नेताओं का कहना है कि सीएए और एनआरसी के खिलाफ किसी भी तरह के आंदोलन से खुद को अलग करने का फैसला किया था. जिले के पदाधिकारियों को भी कड़े शब्दों में इस तरह के आंदोलन में हिस्सा लेने से राजद ने मना कर दिया था. इसका संदेश मुसलमानों में खराब गया है.

रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने इस मुद्दे पर बिहार में समझो-समझाओ, देश बचाओ यात्रा निकाली तो भाकपा नेता कन्हैया कुमार ने संविधान बचाओ, देश बचाओ यात्रा निकाल कर राजद की परेशानी बढ़ाई. इसलिए राजद अब एम-वाई की बजाय ए टू जेड की पार्टी खुद को बता रहा है लेकिन सच यह है कि वह यादवों की पार्टी बन कर ही रह गई है और बाकी सब जातियां या मुसलमान हाशिए पर ही हैं. इसलिए अकेले चुनाव में जाना राजद के लिए भी आसान नहीं होगा. लफ्फाजी भले तेजस्वी करें या उनके सिपाहसालार, लेकिन सच यह है कि राजद के लिए राह आसान नहीं हगा, अगर उसने अकेले चुनाव लड़ा.

हालांकि महागठबंधन में एकजुटता का दावा किया जा रहा है. कांग्रेस से लेकर रालोसपा तक कह रहे हैं कि महागठबंधन एकजुट और मजबूत है लेकिन कई पेंच है जो महागठबंधन की गांठ को खोल रहा है. राजद का कहना है कि छोटे दल उस पर दबाव बना रहे हैं तो इसमें गलत क्या है. महागठबंधन के दल समन्वय समिति बनाने की बात लंबे समय से कह रहे हैं लेकिन राजद इस पर ध्यान ही नहीं दे रहा है. यह उसके अकड़ को साबित करता है.


पिछले कुछ दिनों में घटनाक्रम बहुत तेजी से बदले हैं. पहले रालोसपा ने कहा कि मुख्यमंत्री के चेहरे पर फैसला नहीं हुआ है फिर हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतनराम मांझी सामने आए और समन्वय समिति की अपनी बात को फिर दोहराई. जीतनराम मांझी ने तो एक तरह से धमकी देते हुए कहा कि राजद महागठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में है. इसमें किसी को कोई शक नहीं है. लेकिन,राजद बड़े भाई की भूमिका को ठीक से नहीं निभा पा रहा है. यही रवैया रहा तो सहयोगी दल मार्च के बाद बड़ा फैसला ले सकते हैं. हालांकि राजद ने मांझी को दो टूक कह दिया है कि उसके सामने किसी दल की प्रेशर पॉलिटिक्स नहीं चलेगी. राजद का आरोप है कि मांझी किसी और से गाइड हो रहे हैं. इस पर हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि राजद बताए कि तेजस्वी को कौन गाइड कर रहा है.

राजद नेता भाई वीरेंद्र ने कहा कि महागठबंधन राजद ने बनाया है. कौन क्या बयान देता है इससे हमें मतलब नहीं है. कुछ लोगों की छटपटाहट है कि हमें ज्यादा सीट मिल जाए. जमीनी हकीकत जितनी होगी, महागठबंधन तय करेगा कि कितनी सीटें मिलनी चाहिए. हमें लगता है कि मांझी कहीं से गाइड हो रहे हैं और इसलिए इस तरह का बयान दे रहे हैं. इससे पहले ‍हम प्रमुख व पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने कहा था कि राजद महागठबंधन में बड़े भाई की भूमिका निभा नहीं पा रहा है. ऐसी ही स्थिति रही तो महागठबंधन के घटक दल मार्च के बाद कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं.


जीतनराम मांझी ने राजद के प्रदेश अध्‍यक्ष जगदानंद सिंह के उस बयान पर भी एतरजा जताया, जिसमें उन्होंने कहा था कि महागठबंधन के नेता केवल लालू प्रसाद यादव हैं और जिसे यह नहीं स्‍वीकर नहीं, वे बाहर जा सकते हैं. मांझी का बयान नाम लिए बगैर राजद प्रमुख लालू यादव को धमकी माना जा रहा है. मांझी ने कहा कि राजद ने कांग्रेस को राज्यसभा की एक सीट देने का वादा किया था, लेकिन अंतिम समय में एक व्‍यवसायी को टिकट दे दिया गया. सभी अवगत हैं कि उन्‍हें किस कारण राज्यसभा भेजा जा रहा है. ऐसे ही हालात रहे तो आने वाले दिनों में राजद की महागठबंधन में बड़ा भाई वाली भूमिका बदल सकती है.

मांझी ने साफ किया कि वे महागठबंधन में राजद के मित्र हैं और इस हैसियत से उसकी गलती को बताते रहते हैं. महागठबंधन में कोऑर्डिनेशन कमेटी को ले कर मांझी ने कहा कि इसका गठन हो और चाहे महागठबंधन का नेतृत्व हो, मुख्‍यमंत्री उम्‍मीदवार हो या आंदोलन, कोई भी फैसला सबकी सहमति से हो. हालांकि राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह कहते हैं कि लालू यादव ही महागठबंधन के नेता हैं और तेजस्‍वी यादव मुख्‍यमंत्री उम्‍मीदवार. वे यह भी कहते हैं कि जिसे यह स्वीकार नहीं हो वह महागठबंधन से बाहर जा सकता है. मांझी ने कहा कि राजद नेतृत्‍व को इस रवैये में बदलाव करना होगा. अगर यही रवैया रहा तो मार्च के बाद घटक दल विकल्प तलाशने को मजबूर हो जाएंगे.

इससे पहले राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के अध्यक्ष व पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि महागठबंधन बिहार विधानसभा का चुनाव पूरी मजबूती से लड़ेगा. इसकी तैयारी हो रही है. महागठबंधन के भविष्य को लेकर किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है. महागठबंधन में सब कुछ ठीक है. उपेंद्र कुशवाहा ने मुख्यमंत्री के चेहरे पर दो टूक कहा कि यह फैसला महागठबंधन के सभी नेता मिल कर लेंगे. उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि चुनाव में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार कौन होगा, यह महागठबंधन की कोऑर्डिनेशन कमेटी तय करेगी. चुनाव में महागठबंधन की जीत तय है, क्योंकि पंद्रह सालों के नीतीश शासन से बिहार की जनता ऊब चुकी है. हाल ही में उपेंद्र कुशवाहा दिल्ली में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से भी मिले थे और बिहार के सियासी समीकरण पर चर्चा की थी.


राजद के रवैये से कांग्रेस भी नाराज है और एक बड़ा खेमा राजद से नाता तोड़ लेने के पक्ष में है. राज्यसभा चुनाव में राजद के धोखा देने के बाद कांग्रेस ने पूर्व सांसद निखिल कुमार के निवास पर बैठक तो की ही, कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में भी जम कर नारेबजी की. इससे समझा जा सकता है कि कांग्रेस में भी राजद को लेकर कई तरह के अगर-मगर हैं. कांग्रेस भी राजद के अहंकार से आहत है.माना यह भी जा रहा है कि राहुल भी नहीं चाहते हैं कि तेजसवी को आगे कर चुनाव लड़ा जाए. कांग्रेस का मानना है कि नीतीश कुमार के चेहरे के सामने तेजस्वी का तेज फीका पड़ जाएगा.

कांग्रेस चुनाव में बिना चेहरे के जाने के पक्ष में है. वैसे बिहार में महागठबंधन से इतर तीसरे मोर्चे की कवायद भी चल रही है. तीसरे मोर्चे की अगुवाई शरद यादव कर सकते हैं. उनके साथ रालोसपा, हम, वीआईपी और वाम दल जा सकते हैं. पप्पू यादव की पार्टी भी तीसरे मोर्चा का हिस्सा हो सकती है. कांग्रेस ने अगर राजद का साथ छोड़ा तो फिर तीसरा मोर्चा वजूद में आ जाएगा. लेकिन यह अभी तय नहीं है. लेकिन इस तरह की कवायद हो रही है. यह कवायद कितनी कामयाब होती है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.  


Share On Facebook

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :