जनादेश
राजपाट

तबादला लिस्ट का इंतजार

राजेंद्र कुमार 

वन विभाग में तबादला सीजन शुरू होने वाला है. हर साल इस सीजन का इस महकमें के आला अफसर और कर्मचारी बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हैं. सूबे में यह महकमा ही एकमात्र ऐसा महकमा है, जहां तैनात अधिकारी अपना तबादला कराने की अपेक्षा अपने साथी का तबादला कराने में खासा उत्साह दिखाते हैं. इस महकमें के एक डीएफओ ने पन्द्रह साल पहले तत्कालीन वन मंत्री से महकमें में एनटीए (नान ट्रांसफर एलाउंस ) की शुरुआत करायी थी. आज हर महकमें में एनटीए पर अमल हो रहा है. ऐसे माहौल में वन महकमें में अरसे  से खाली पड़ी आला अफसरों की कुर्सियों के भरने का दावा किया जा रहा है. महकमें में कई पद ऐसे हैं जिनके लिए लंबे समय से काबिल अफसर ही नहीं मिल रहे हैं. ऐसे में कुछ अफसरों को अतिरिक्त चार्ज देकर काम चलाया जा रहा है. विभाग में यह हाल नीचे से लेकर ऊपर तक के सभी प्रमुख पदों का है. वन प्रभागों में डीएफओ नहीं हैं एक-एक अफसर को कई-कई प्रभाग सौंपे गए हैं. वन संरक्षक से लेकर प्रमुख वन संरक्षक तक सभी पदों की महत्वपूर्ण कुर्सियां खाली हैं. इन पदों का काम कुछ अफसरों को अतिरिक्त प्रभार देकर चलाया जा रहा है. तबादला सीजन में उन्हें भी पद के अनुरूप कुर्सियां मिलने की उम्मीद है जिनकी पदोन्नतियां महीनों पहले हो चुकी हैं. अब देखना यह है कि विभागीय मंत्री आईएफएस अफसरों से लेकर रेंज अफसर तक के तबादले किस नीति के आधार पर करेंगे. और सरकार की तबादला लिस्ट में राज्यपाल महोदया को दुधवा नेशनल पार्क शेर ना दिखा पाने वाले आईएफएस का नाम शामिल होगा या नही. दुधवा में तैनात ये अफसर का यह  मान रहें हैं कि उनका तबादला तो निश्चित है क्योंकि वह दुधवा में वह राज्यपाल महोदया  को जंगल में रह रहें शेर दिखाने में असफल रहे थे और इसके लिए उनका तबादला किया  जा सकता है. तब से यह आईएफएस अफसर महकमें की तबादला लिस्ट का इंतजार कर रहें हैं.  


अनोखा दफ्तर

यूपी पुलिस देश की सबसे बड़ी पुलिस फ़ोर्स है. राज्य में अपराध नियंत्रण से लेकर सूबे की क़ानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त रखने के लिए यूपी पुलिस करीब चालीस विंगों (शाखाओं) में बटी हुई है. कुछ माह पहले तक लखनऊ में यूपी पुलिस की हर विंग का अलग-अलग दफतर हुआ करता था. पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यूपी पुलिस की सभी शाखाओं को एक छत की नीचे लाने के लिए पुलिस मुख्यालय भवन बनवाने का फैसला लिया. और देखते ही देखतेकरीब आठ सौ करोड़ रुपये से अधिक धनराशि खर्च कर पुलिस मुख्यालय भवन बनकर तैयार हो गया. इस भवन का भव्य भवन को सिग्नेचर बिल्डिंग का नाम दिया गया. इस सिग्नेचर बिल्डिंग का निर्माण बहुराष्ट्रीय कंपनी लार्सन एंड टुब्रो ने किया है. मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस बिल्डिंग में अधिकारियों के बैठने ही शुरुआत करवायी. तब कहा गया था कि लखनऊ में बनी यह सबसे मंहगी सरकारी बिल्डिंग हैं. और पुलिस महकमें की अगले पचास साल में होने वाली जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही इसका निर्माण किया गया है. अब इस भव्य बिल्डिंग में पुलिस महकमें  की अधिकांश विंग कार्य करने लगी हैं. सिर्फ पीएसी, अभिसूचना, सुरक्षा, वायरलेस, भर्ती बोर्ड, सीबीसीआईडी और सतर्कता महकमें को यहां जगह नही दी गई है क्योकि भर्ती बोर्ड को छोड़कर बाकी सभी महकमों के पास अपनी बिल्डिंग है. इस भव्य बिल्डिंग में बैठने वाले पुलिस के अधिकारी और कर्मचारी खांसे खुश है. उन्होंने कभी सपने में भी नही सोचा था कि वह ऐसी भव्य, आधुनिक और होटल सरीखी बिल्डिंग में काम करेंगे. इस बिल्डिंग में बिजली के बिल और साफ सफाई तथा मेंटेनेंस पर एक करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि खर्च होगी, ऐसी चर्चा यह कार्यरत अधिकारी कर रहे हैं. अब ऐसी आधुनिक बिल्डिंग में सूबे का एक मात्र ऐसा दफ्तर है, जिसके अधिकारियों और कर्मचारियों के पास कोई काम ही नही है. सरकार या डीजीपी की तरफ से कोई फ़ाइल इस दफ्तर में बैठने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को नही भेजी जाती है. इस दफ्तर में अधिकारियों और कर्मचारियों के बैठने के लिए कुल 23 कमरे हैं. और अभी इस दफ्तर में एक एडीजी, एक डीआईजी और एक एसपी स्तर के अधिकारी तैनात हैं. इसके अलावा दो एसआई, एक सीए और पांच सिपाही तथा एक फलोवर तैंनात है. करीब दस लाख रुपये इन अधिकारी और कर्मचारियों के वेतन पर हर माह सरकार खर्च कर रही है. लेकिन इस अधिकारियों और कर्मचरियों के पास दफ्तर में टीवी देखने, चाय-काफी पीने और अपने साथ लायी हुई किताब पढ़ते हुए शाम छह बजे तक अपने कमरे में बैठने के सिवाए कोई काम नही है. हालांकि इस दफ्तर में बैठने वाले अधिकारियों से सरकार और डीजीपी पुलिस की आंतरिक कार्य प्रणाली को बेहतर करने संबंधी नियम कायदे बनाने का कार्य ले सकते हैं पर ऐसा कोई प्रयास नही किया जा रहा है. ऐसे में इस दफ्तर में बैठे अफसरों के पास कोई कार्य नही है और अब यह अनोखा दफ्तर इस भव्य और मंहगी सरकारी बिल्डिंग में चर्चा का विषय बना हुआ है.  


आफतों का दौर

झारखंड की राजधानी में जन्मे यूपी काडर के यह साहब प्रमुख सचिव हैं. कुछ समय पहले तक शहरों के विकास का जिम्मा देखने वाले इन साहब के या तो नक्षत्र ठीक नहीं हैं

या फिर मुसीबतें उनकी राहों में पलकें बिछाए बैठी रहती हैं. बीते कुछ समय से वह जहां पहुंचते हैं, वहां मुसीबतों का एक दौर शुरू हो जाता है. पहले साहब जिस विभाग में थे, वहां मुसीबतों का बड़ा भंडार था. केंद्र की योजनाओं की विभाग में भरमार थी. हर रोज मॉनिटरिंग और तरह-तरह का तीमा-झामा. और विभागीय मंत्री से भी अनबन रही. ऐसे में साहब किसी तरह विभाग में अपना समय बिताकर उस विभाग में पहुंचे, जहां से उनका एक वक्त पुराना नाता रहा है. लेकिन यहां भी मुसीबतें मुंह खोले खड़ी थीं. साहब के पहुंचते ही निचले-ऊंचे दोनों सदनों में उनके विभाग को कठघरे में खड़ा कर दिया गया. तो मंत्री जी के प्रयास से साहब का विभाग बदल गया. किसी तरह से वहां मामला कुछ संभला, लेकिन नए महकमें में भी साहब को चैन नही है. यहां गांवों से जुड़े लोगों की शुद्ध देशी समस्याओं का निदान करते -करते साहब खुद रोज निढ़ाल हो जाते हैं.  इसकी वजह है उनके मातहत अधिकारी. जिलों में तैनात मातहत साहब के लिए मुसीबतों के दूत बनकर खड़े हो गए हैं. ये लोग साहब के निर्देशों के मुताबिक ना तो पंचायतों को लेकर माँगी गई सूचनाएं समय से भेजते हैं और न ही बताये गए विकास कार्यों की गति तेज करने का प्रयास करते हैं. ऐसे में अपने हर निर्देश पर अमल कराने के लिए खुद साहब को ही लोड लेना पड़ रहा है क्योंकि विभागीय निदेशक महोदया से उनका छत्तीस का आंकड़ा है. साहब ने ही उन्हें भ्रष्टाचार को लेकर एक विकास प्राधिकरण से हटवाया था. निदेशक महोदया भी काफी तेजतर्रार अधिकारी हैं. वह नियम कायदे से काम करती हैं और  किसी का भी दवाब नही मानती. उन्हें लखनऊ के समीपवर्ती जिले से साहब की वजह से हटाये जाने का वाकया भी भूला नही है. जिसके चलते वह साहब को भाव नही देती और अब साहब आफतों के दौर से अकेले जूझ रहें है. उनकी समझ में नही आ रहा है कि पंचायत चुनाव से लेकर गाँवों की दशा -दिशा दुधारने को लेकर तय समय में सरकार की तमाम योजनाओं को वह कैसे पूरा करेंगे.


बॉस बदले तो बदली प्राथमिकता भी

किसी भी महकमे की चाल उसका सुपर बॉस ही तय करता है. खासकर पुलिस की प्राथमिकताएं तो प्रदेश में डीजीपी साहब और जिले में कप्तान साहब तय करते हैं. अब फिर यूपी पुलिस ने एक बार फिर अपनी प्राथमिकताएं बदली हैं. तकनीक के बड़े-बड़े दावे दोहराने वाली पुलिस बेसिक पुलिसिंग के फंडे पर कदम लौटाती नजर आ रही है. डीजीपी हितेश चंद्र अवस्थी अब रोज ही  अपराध नियंत्रण के मूलमंत्र का सीधा संदेश अधीनस्थों को दे रहें हैं. हर बुधवार दो जोन की समीक्षा करने संबंधी व्यवस्था उन्होंने शुरू की है. वीडियो कांफ्रेंसिंग के दौरान इस समीक्षा बैठक में बात केवल अपराध और उसके अनावरण पर होती है. लिहाजा कई जिलों में बरसों से धूल खा रहीं बंद केसों की फाइलें भी बाहर निकलना शुरू हो गई हैं. टॉप 10 अपराधी पुलिस के रडार पर आ गए हैं. यही नही जिलों के थानों में आईजी और डीआईजी की कृपा से कितने थानेदारों की तैनाती हुई है और कितने थानेदारों को पुलिस कप्तान ने थानेदार बनाया है? यह सब भी उजागर होने लगा है. अब तो पुलिस आयुक्तों की खामियों और उन पर उठाये गए सवालों पर भी समीक्षा बैठक में चर्चा होने लगी है. जिसके चलते थानेदारों की तैनाती में अब काम को प्राथमिकता मिलने लगी है. इस व्यवस्था के शुरू होने से देख एक पूर्व डीजीपी का यह सुझाव है कि अब अगर हितेश अवस्थी अपराध नियंत्रण पर जोर देने के साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ दें तो पटरी से उतरी गाडी फिर पटरी पर आ जायेगी. और थानों में ईमानदार थानेदारों की तैनाती होने लगेगी. आईजी -डीआईजी की कृपा से बने नकारा थानेदार साइड हो जायंगे. और थाने तथा जिला बिकने जैसे आरोप नही सुनायी देंगे. इन पूर्व डीजीपी साहब का कहना है कि सूबे के पचास फीसदी थाने पुलिस कप्तान से लेकर आईजी और डीआईजी ही बेचते हैं. भ्रष्टाचार को लेकर अगर कप्तान को हडकाया जाए तो उसका असर थानों पर दिखता है. और दरोगा पुलिस कस्टडी में आयी कार से बेगार करने नही जाता. और ना ही कोई सीओ अपनी पोस्टिंग के लिए नेताओं से पुलिस अफसरों पर दबाव डलवाने  की हिम्मत करता है. इसलिए डीजीपी को बेदर्दी दिखातें हुए खराब परफार्मेंस वाले 20 जिलों के पुलिस कप्तानों और पांच जोन के आईजी बदल देने चाहिए. उनके इस कदम से पुलिस महकमें में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा. अब देखना यह है कि पूर्व डीजीपी की इस सलाह को वर्तमान डीजीपी अपनी प्राथमिकता में कैसे शामिल करते हैं. उम्मीद यही है कि कानून-व्यवस्था के साथ भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और आपराधिक घटनाओं पर जवाबदेही  जिला पुलिस की रफ्तार और कार्यशैली को जरूर बदलेगी.


बुरे फंसे

बड़े लोगों के खेल में हमेशा छोटे कर्मी पर ही गाज गिराई जाती है. सरकार किसी भी विचारधारा की हो यह नियम बदलता नही है. एक सरकारी महकमें में अब इस अघोषित सिद्धांत की चर्चा जोर शोर से हो रही है. जिसके मुताबिक एक सरकारी विभाग में फर्नीचर खरीदने का फैसला हुआ. विभागीय मंत्री और प्रमुख सचिव की मौजूदगी में फर्नीचर खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी मिली. और फर्नीचर खरीद की फ़ाइल पर मोहर भी लग  गई. और आदेश जारी करते हुए एक खास ब्रांड के फर्नीचर खरीदने की प्राथमिकता भी बतायी गई. उस ब्रांड का फर्नीचर आपूर्ति करने वाली लोकल फर्म का भी हवाला आदेश में दिया गया, ताकि खरीद में कोई गफलत ना होने पाए. फर्नीचर खरीद को लेकर बरती गई यही सावधानी अब समस्या बन गई है. हुआ यह कि एक विशेष कंपनी के ही फर्नीचर खरीदने को लेकर दिए गए जोर की भनक सत्ताशीर्ष तक पहुंच गई. तो इसे लेकर पूछताछ हुई. बस फिर क्या था? विभागीय मंत्री से लेकर प्रमुख सचिव तक ने फर्नीचर खरीद से अपने हाथ खींच लिए. सबने अपने को पाक साफ बताते हुए एक नीचे के अधिकारी को जिम्मेदार ठहरा दिया. अब यह अदना अधिकारी बोर्ड बैठक एक कार्यवृत को लेकर घूम रहा है. इसमें लिखा है कि खास ब्रांड के फर्नीचर को मानक बनाकर फर्नीचर खरीदने की सहमति तो ऊपर से लेकर नीचे तक सबने प्रदान की थी. जिसपर उक्त अधिकारी ने सिर्फ फर्नीचर खरीदने का आदेश जारी किया था. इसमें उसकी गलती क्या है? अब यह अधिकारी बुरा फंस गया है, वह अगर कुछ बोलेगा तो बड़े साहब उसको नाप देंगे और अगर चुप रहा तो उसकी पानी गर्दन सरकार नापेगी. इस अधिकारी के लिए एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खायी है. उसकी समझ में नही आ रहा है कि वह अपने को कैसे बचाए?    


विपक्ष की बिखरी फील्डिंग  

योगी सरकार के तीन साल पूरे होने को हैं. इन तीन सालों में किये गए कार्यों का प्रचार -प्रसार करने को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ताबड़तोड़ बैटिंग की तैयारी में हैं. तो दूसरी ओर विपक्षी टीमों के सभी कप्तान अभी अलग-अलग फील्डिंग ही सजा रहे हैं. सपा, बसपा और कांग्रेस तो हैं ही, दो और नई टीमें नेट प्रैक्टिस करती दिख रही हैं. एक, आम आदमी पार्टी, जिसे दिल्ली की जीत के बाद सिर्फ हरा-हरा दिख रहा है. दूसरी, मायावती के लिए चुनौती बन रहे चंद्रशेखर की भीम आर्मी. शिवसेना भी हर चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश  में दंड-बैठक शुरू कर देती है. यह परंपरा निभाते हुए उद्धव ठाकरे सपरिवार रामलला का  दर्शन करने अयोध्या आए. शिवपाल यादव भी, हम किसी से कम नहीं, के तर्ज पर मोर्चा लेने को तैयार हैं. लेकिन शिवपाल बार-बार सपा से नजदीकी दिखाने का प्रयास कर हिडविकेट हो जाते हैं. अब जहां तक सपा, बसपा और कांग्रेस की बात है, उनकी सक्रियता केंद्र और यूपी सरकार के हर काम में कमी तलाशने तक सीमित है. चुनाव अभी दो साल दूर हैं. तब तक बहुत कुछ बदल सकता है, यद्यपि योगी सरकार की कमजोरी में अपने लिए मजबूती का इंतजार कर रहे विपक्ष को सरकार के विकास एजेंडे से निराशा हाथ लग सकती है. अभी भी समय है. विपक्ष को जनता के सामने अपना एजेंडा रखना चाहिए. योगी सरकार यदि सब कुछ गड़बड़ कर रही तो मौका मिलने पर वे क्या करना चाहेंगे? जाहिर है, विपक्ष को यह भी बताना पड़ेगा कि जब मौका मिला था, तब उन्होंने क्या किया था? खैर जो भी हो विपक्ष सरकार के खिलाफ कितनी  ताकत से मोर्चा खोलने की हैसियत में है? यह इसी वर्ष हो रहे विधान परिषद के चुनाव और पंचायत चुनावों से साबित हो जायेगा और यह भी पता चल जायेगा कि विपक्ष कितने पानी में है.  


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