इस संकट में कॉरपोरेट कहां हैं ?

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इस संकट में कॉरपोरेट कहां हैं ?

विजय शंकर सिंह 

नई दिल्ली .कॉरपोरेट के सोशल दायित्वों के निर्वहन के लिए सीएसआर कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के नाम पर एक फंड होता है. इस फंड का उद्देश्य है कि कॉरपोरेट अपनी आय या पूंजी का एक हिस्सा जनकल्याण के कार्यो में लगाये. सभी पूंजीपतियों को सस्ती दर पर ज़मीन, कर राहत, तथा अन्य सुविधाएं सरकार पहले से ही देती रही हैं और अब भी दे रही हैं. इसके पीछे सरकार की यह मंशा होती है कि उद्योग बढ़ेंगे तो इससे लोगों को रोजगार मिलेगा और विकास होगा. ऐसा होता भी है.

सीएसआर के धन के उपयोग के लिये बड़े बड़े कॉरपोरेट ने अपने अपने निजी एनजीओ बना रखे हैं और उन्ही के द्वारा वे जनहित के कार्य करते हैं. अब वे एनजीओ क्या करते हैं कैसे करते हैं इसकी ऑडिट भी होती है. सभी कॉरपोरेट के पास अपने अपने हॉस्पिटल, और यूनिवर्सिटी भी हैं. लेकिन इनका भी उद्देश्य कोई चिकित्सा लाभ या शिक्षा जनता को देना नहीं है बल्कि इससे भी मुनाफा कमाना ही है. कॉरपोरेट की हर योजना में मुनाफा सबसे पहला और अनिवार्य अवयव होता है. सरकार का कोई नियंत्रण सिवाय आंकड़े एकत्र कर कॉरपोरेट के किसी आयोजन में उपस्थित हो धन्यवाद और प्रशस्ति गान करने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता है. सोशल दायित्व का यह लाभ समाज के किस तबके तक पहुंच रहा है इसका भी कोई आकलन सरकार करती भी है या नहीं यह स्पष्ट नहीं है.

सरकार को चाहिए कि सीएसआर के अंतर्गत जो धन हो उसे कोरोना महामारी के निपटने के लिये उनसे ले ले और न दें तो ज़ब्त कर लें. उससे चिकित्सा तथा अन्य टेस्ट लैब की जो सुविधाएं वह दे सकती हैं जनता को दे. सीएसआर का दुरुपयोग भी होता है और यह पैसा पुनः घूमफिर कर इन्हीं पूंजीपतियों के पास चला भी जाता है.


हमने विकास के रूप में चार लेन या आठ लेन के एक्सप्रेस वे, बडी बडी टाउनशिप, गगनचुंबी इमारतों और महंगे निजी अस्पतालों और चमक दमक भरी निजी यूनिवर्सिटी को ही समझ लिया है. यह विकास के मापदंड तो है पर क्या सवा अरब की आबादी वाले देश मे जो विश्व हंगर इंडेक्स में 102 स्थान पर हो, बेरोजगारी और विपन्नता में लगातार 'प्रगति' कर रहा हो की अधिकांश जनता को विकास का यह मॉडल लाभ पहुंचा रहा है ?


विकास का पैमाना है देश की आबादी के कितने हिस्से को रोजी रोटी शिक्षा स्वास्थ्य की सुलभ और सुगम सुविधाएं मिल चुकी हैं और कितनो को अभी इन सुविधाओं का मिलना शेष है. हर बजट के समय इन सब पैरामीटर पर सरकार को समीक्षा करनी चाहिए और अधिकतम जनता को यह लाभ पहुंचाना चाहिए.

अभी कुछ दिनों पहले यह खबर आई थी कि सरकार सरकारी अस्पतालों को निजी क्षेत्रों में देने जा रही है. यह बहुत आसान है और कॉरपोरेट तथा हेल्थकेयर की बड़ी बड़ी कंपनियां खुशी खुशी अस्पताल ले भी लेंगी. पर क्या वे इससे मुनाफा नहीं कमाएंगी ? जब मुनाफे को केंद्र में रख कर वे अस्पताल का विकास करेंगी तो फिर उस जनता को चिकित्सा का लाभ कैसे वे दे पाएंगी जो मुश्किल से अपना गुजर बसर कर रही है ?सरकार ने सीएसआर के खर्चे के लिये किसी नियंत्रण मैकेनिज़्म की व्यवस्था भी नही कर रखी है. इनकी ऑडिट ज़रूर होती है और कुछ न कुछ कागजों का पेट भी भरा जाता होगा पर यह धनराशि जो कॉरपोरेट के कुल टर्नओवर का 2 फीसद होती है का क्या लाभ वास्तविक रूप से जनता को पहुंच रहा है, इसकी भी पड़ताल ज़रुरी है. 


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