जनादेश
इतनी जल्दी नहीं जाएगा कोरोना

स्कंद शुक्ल 

यह-सब कब-तक चलने वाला है ?एक व्यापारी अपने परिवार के सदस्य के लिए मेडिकल-परामर्श लेते समय पूछते हैं.यह-सब अर्थात् ?"यही कोरोना-फोरोना ?"नका यह सवाल ढेरों लोगों के मन में है. निर्बन्ध जीवन जीते आ रहे इक्कीसवीं सदी के लोगों ने शायद ही कभी इस तरह का कोई बन्धन महसूस किया हो. अजीब सी जकड़. पहले से ही बाज़ार मन्दी की मार झेलता घिसड़ रहा था. अब इस कोरोना ने बिलकुल ही चित्त कर दिया .

यह समय मुक्त बाज़ार के मोह से निकलने का समय है. हम एक ऐसे सन्धिकाल को जी रहे हैं , जिसके कारण समूची दुनिया में आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक ढाँचों में अनेक बड़े परिवर्तन होंगे. इनमें से अनेक बुनियादी भी हो सकते हैं. ऐसे में हम-सबको सूझबूझपूर्वक आने वाले समय के अनुसार स्वयं को ढालने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.

न्यूयॉर्कटाइम्स के साथ हाल ही में अमेरिकी फ़ेडरल सरकार ने जो रिपोर्ट साझी की है , उसके अनुसार कोरोना-पैंडेमिक डेढ़ साल तक चल सकती है. हालांकि कुछ भी निश्चित तौर पर कहना मुश्किल है , किन्तु कोविड-19 प्रसार की दुनिया-भर में अनेक तरंगें उठ सकती हैं. भविष्यवाणियाँ अस्पष्ट हैं , पर फिर भी सतर्कता और समझदारी की माँग करती हैं. केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि अन्य लोगों के लिए हमें इस संक्रमण से स्वयं को यथसम्भव बचा कर सुरक्षित रखना है.


यह सत्य है कि अधिकांश लोगों में कोविड-19 के लक्षण साधारण फ़्लू की तरह ही होंगे. केवल लक्षणों के आधार पर इस रोग को फ़्लू से अलग नहीं किया जा सकता. विशिष्ट जाँच की आवश्यकता पड़ेगी. किन्तु 4-5 % गम्भीर रूप से संक्रमित मौत से जूझते रोगियों की आबादी भी बहुत बड़ी हो सकती है. भारत-जैसे देश में जहाँ स्वास्थ्य-सुविधाओं पहले से ही सर्व-उपलब्ध नहीं हैं , वहाँ इस रोग की मार दोहरी पड़ेगी. सीमित संसाधनों वाले ऐसे देश में रोकथाम का महत्त्व उपचार से बहुत-बहुत बड़ा हो जाता है , विशेषकर तब जब इस रोग के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल दवा अब-तक उपलब्ध हो न पायी हो.


टीका बनने और उपलब्ध होने में कितना समय लगेगा ? विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें भी एक साल तक का समय लग सकता है. टीके के निर्माण के दौरान उसकी गुणवत्ता की जाँच होगी. यह भी देखना पड़ेगा कि किसी रूप में वह हानिकारक तो नहीं. यह-सब जल्दी-जल्दी आनन-फानन में होने वाले काम नहीं. टीका भी एक दवा है. दवाएँ बाज़ार में यों ही तुरन्त नहीं लॉन्च की जा सकतीं. उनको भी ढेरों नियमों और अनुशासनों के गुज़र कर अपनी उपयोगिता सिद्ध करनी पड़ती है.


वर्तमान कोरोना-पैंडेमिक को रोकने की विशेषज्ञ दो ज़रूरी युक्तियाँ सुझा रहे हैं : पहली है 'सप्रेशन' यानी उचित क़दम उठाकर कोरोना विषाणु को फैलने से रोकना और दूसरी है 'मिटिगेशन' यानी यानी पूरी तरह न रोक पाने की स्थिति में कम-से-कम कोरोना विषाणु के फैलाव को धीमा और कम कर पाना. इन दोनों ही युक्तियों में सर्वाधिक महत्त्व सोशल डिस्टेंसिंग ( सामाजिक दूरीकरण ) का बताया गया है.

भीड़ कोरोना-विषाणु और कोविड-19 के फैलाव का सबसे मददगार सिद्ध होती रही है. भीड़ हमारे वर्तमान मुक्त बाज़ारवादी समाज की सबसे बड़ी सच्चाई रही है. भीड़ के कारण ही ढेरों लोग वर्तमान समय में अपना जीवन जीते और परिवार पालते रहे हैं. किन्तु भीड़ बनने से हम-सभी को इस कठिन समय में बचना है.यह समय बुनियादी बन चुकी बड़ी आदतों में बदलाव का है , क्योंकि यह बदलाव ही बचाव बनेगा.


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