जनादेश
काली मिर्च के लिए आए पुर्तगाली लाल मिर्च साथ लाए

सविता वर्मा 

पुर्तगाली अगर काली मिर्च के लिए भारत आए तो कुछ तोहफे भी लाए .पुर्तगाली जो मिर्च साथ लाए थे वह भी उनकी अपनी नहीं बल्कि ब्राजील की मूल रूप से है .इसमें एक है मिर्च जो अब देश भर में अलग अलग प्रजातियों में मिलती है .पूर्वोत्तर की भूत झोलकिया हो या कश्मीर की लाल रंग बिखेरने वाली कश्मीरी मिर्च .मिर्च को लेकर तरह तरह की भ्रांतियां भी है .मिर्च के बारे भी कुछ जानना चाहिए .

लाल मिर्च भी औषधि जैसा मसाला है .आया विदेश से और लाए पुर्तगाली .अब देशभर में अलग अलग रंगरूप में मिल जायेगा .गोरखपुर की मिर्चाई यानी छोटी हरी मिर्च बहुत तीखी होती है तो असम की भूत झोलाकिया सबसे ज्यादा तीखी .कश्मीरी लाल मिर्च रंग के लिए मशहूर है .आंध्र प्रदेश में लाल मिर्च न सिर्फ उगाई जाती है बल्कि खाई भी जमकर जाती है .कभी आंध्र के किसी परम्परागत रेस्तरां में नान वेज खाकर देखिए .सब कुछ केले के पत्ते पर परोसेंगे पर इतना तीखा कि हर किसी के बस का नहीं है उनका खाना ,सिर्फ मिर्च की वजह से .पर यह मिर्च फायदा भी कम नहीं करती .रक्त में थक्का बनाने से रोकती है तो यह इम्यून सिस्टम भी बढ़ाती है और कई तरह से फायदा पहुंचाती है .आज जिस मिर्च की चर्चा की जा रही है वह मथानिया मिर्च है .

मथानिया एक कस्बा है जो राजस्थान के जोधपुर ज़िले में है.यहां से जोधपुर हवाई अड्डा मात्र तीन किलोमीटर दूर है. मथानिया की लाल मिर्च अपने रंग और स्वाद के लिए इतनी मशहूर हुई की मेक्सिको के कृषि वैज्ञानिकों का एक दल मथानिया अनुसन्धान के लिए आया और मेक्सिको मैं इसकी बड़े पैमाने पर खेती करने की सम्भावना पर शोध की.राजस्थान का जो लाल मांस मशहूर है उसका ज्यादा श्रेय इस मथानिया मिर्च को ही जाता है .कभी जोधपुर जाएं तो चालीस किलोमीटर दूर मथानिया भी जाएं .यहां के मशहूर मंदिर में दर्शन करें और लौटे तो यह मथानिया मिर्च भी लायें .यह रंग और स्वाद दोनों में बहुत अलग है .

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