जनादेश
हरेक शुरुआत ऐसे ही होती है ?

श्रवण गर्ग  

नई दिल्ली .प्रधानमंत्री ने 130 करोड़ देशवासियों से तीन सप्ताह के लिए अपने आपको ‘लॉक डाउन’ में क़ैद करने की हाथ जोड़ कर प्रार्थना की ,हमने भाव-विभोर होते हुए स्वीकार कर लिया.हमें ऐसा करना भी चाहिए था.वक़्त बहुत ही कठिन और चुनौतीपूर्ण है.ऐसे में कोई भी सवाल करना, देश के प्रति ग़द्दारी करार दी जा सकती है.अभी यह नहीं बताया गया है कि तीन सप्ताह की अवधि किस तारीख़ को कितने बजे ख़त्म होगी.दिन और समय केवल प्रतिबंधों के लागू होने का ही बताया जाता है जैसा कि आपातकाल और नोटबंदी में हुआ था.

सरकारें जानती हैं कि लोगों की याददाश्त कमज़ोर रहती है.तीन सप्ताह वे हंसते-रोते झेल गए तो फिर और कितना भी समय भारी नहीं पड़ेगा.यह एक प्रयोग भी माना जा सकता है.सबकुछ आदत में आ जाएगा.किसी एक देश के राष्ट्रपति ने अपनी जनता से पूछा है कि एक महीने के लिए घर में ही बंद रहना है कि एक साल के लिए जेल में.हमारे यहाँ भी एक मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी है कि घरबंदी का उल्लंघन करने वालों वे देखते ही गोली मारने के आदेश दे देंगे.

सही में पूछा जाए तो सारी शुरुआतें इसी तरह होती है.शाहीनबाग़ के सौ दिनी जज़्बे को इसी वक्त तोड़ा जा सकता था.लोगों के आपस में मिलने-जुलने ,बात करने या सरकारों के ग़लत फ़ैसलों को चुनौती देने या संगठित होकर आवाज़ उठाने से रोकने में इस तरह की घरबंदी भी मदद करती है.

आस्ट्रेलिया में संघीय संसद को पाँच महीनों के लिए निलम्बित कर दिया गया है और कोरोना से उत्पन्न ख़तरे को आर्थिक रूप से निपटने के लिए उद्योगजगत के प्रमुखों का एक समूह गठित कर दिया गया है.

तिहत्तर वर्षों के बाद देश एक और विभाजन की त्रासदी को झेलने के लिए तैयार है.यह देश के अंदर ही देश का विभाजन है.लाखों लोग शहरों से अपने-अपने गाँवों की ओर पलायन कर रहे हैं. सामान सरों पर उठाए,बच्चों को बग़ल में दबाए ,मीलों-मील पैदल चलते हुए .इनमें बच्चे, बूढ़े ,जवान, मज़दूर, निराश्रित,बेरोज़गार सभी शामिल हैं.इन्हें अब अपने टूटे-फूटे झोपड़ों,घरों और बंजर ज़मीनों के बीच रहना है.अब जबकि इन सबका शहरों,सरकारों और समूची व्यवस्था से भरोसा उठ गया है, वापस लौटना है.पर कहाँ ?पर कौन सा वह ठिकाना है जहाँ ये लोग अपने को अकेले में बंद करके एक दिन के लिए भी रख सकते है ? उन्हें कोरोना से मरने देना चाहिए या भूख से ? या फिर दोनों से ? क्या उन्हें हम बचा नहीं सकते ? आगे चलकर सरकारों से आगे लड़ना है तो लोगों को बचाना ज़रूरी है.उनकी मदद कीजिए.साभार 


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