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लॉक डाउन के बाद आगे क्या?

 शिवम विज

मोदी जी के इस लॉक डाउन की योजना इतनी लचर है कि यह हमें कोरोना से बचा भी नहीं पाएगी और देश की अर्थव्यवस्था को भी ख़त्म कर देगी. आशंका है कि उनकी हर योजना की तरह यह भी एक अधकचरी और फूहड़ योजना सिद्ध होगी जिसके कारण बहुत बड़ी जनसंख्या भुखमरी का शिकार हो सकती है. उस पर तुर्रा यह कि कोरोना से भी कोई महफ़ूज़ नहीं.

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि अभी तक जिन देशों ने कोरोना को क़ाबू में रखने का काम बेहतर तरीके से किया है, उनमें से किसी ने अपने पूरे देश भर में कर्फ़्यू जैसा लॉक डाउन नहीं किया. इनमें सिंगापुर, ताइवान, जर्मनी और टर्की आते हैं. यहाँ तक कि चीन ने भी, जहाँ से यह महामारी शुरू हुई, पूरे देश में नहीं, बल्कि सिर्फ़ अपने हुबेई क्षेत्र में पूरा लॉक डाउन किया था.लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी 130 करोड़ जनता को ही 21 दिनों के लिए कर्फ़्यू जैसे लॉक डाउन में डाल दिया है.


इसमें कोई शक नहीं कि यह 21 दिनों का लॉक डाउन कोरोना वायरस के फैलने से रोकने में बहुत असरकारी साबित होगा. लेकिन 21 दिन बाद क्या होगा? उसके बाद वायरस अपने आप तो ग़ायब होने से रहा. वायरस ख़ात्मा तो सिर्फ़ इसके वैक्सीन से ही मुमकिन है. वैक्सीन अभी बनी नहीं. ये बन जाए और भारत को भरपूर तादाद में मिल भी जाए, तो भी पूरे लोगों को वैक्सीन लगाने में कई महीने लगेंगे. किसी हालत में इससे कम समय की कल्पना नहीं की जा सकती. यानी, साफ़ बात यह है कि यह संकट लम्बे समय तक चलेगा.भारत भी यदि वही तरीक़ा अपनाता जो दूसरे देशों ने अपनाया, तो वह लॉक डाउन को टाल सकता था. और वो तरीक़ा है टेस्टिंग का. टेस्ट करो. सबका टेस्ट करो. आख़िरी आदमी तक टेस्ट हो.

सिर्फ़ वायरस-ग्रस्त और संदिग्ध को टेस्ट करने से कुछ नहीं होगा. यदि यह 21 दिन का लॉक डाउन इसलिए है कि इस दौरान टेस्टिंग का व्यापक इन्तज़ाम किया जा सके, हर आदमी का टेस्ट किया जा सके और हज़ारों पॉज़िटिव लोगों को क्वारेन्टाइन किया जा सके - तब तो ठीक है. जब तक हर आदमी के लिए कोरोना की कोई दवा या वैक्सीन नहीं मिलती तब तक टेस्टिंग और क्वारेन्टाइन के अलावा कोई उपाय नहीं है.


लेकिन अफ़सोस है कि नरेंद्र मोदी ने अपने दोनों भाषणों में पूरे देश की टेस्टिंग की किसी योजना के बारे में लगभग कुछ भी नहीं कहा. अभी सबसे ज़्यादा ज़रूरत तेज़ी से टेस्टिंग की है, जो सस्ती हो और आसानी से हो सके. और मरीज़ के लिए इन्तज़ाम की ज़रूरत है. जैसे ही किसी का टेस्ट पॉज़िटिव निकले, उसे तुरन्त क्वारेन्टाइन करना होगा ताकि वो अपने परिवार से लेकर चिकित्सक तक किसी को इन्फ़ेक्ट न कर सके.


भारत में कोरोना के मरीज़ों की जो संख्या बताई जा रही है, वो हवा-हवाई है और भगवान भरोसे है. इस बीच साँस के किसी रोग या न्यूमोनिया से मरे वो सभी मरीज़, जिनका टेस्ट नहीं हुआ, सन्देहास्पद हैं.


टेस्टिंग की सुविधा और चिकित्सकों के लिए सुरक्षा उपकरणों की सुविधा में भारी कमी की चर्चा गली-गली में हो रही है. इन दोनों समस्याओं को हल करने के लिए मोदी जी के पास ये अन्तिम 21 दिन हैं. राज्य सरकारों के लिए भी यह कड़े इम्तिहान का समय है.अफ़सोस की बात यह है कि अभी तक सरकार इस बारे में कोई योजना या अमल के रास्ते पर नहीं दिख रही. यह एक और नोटबन्दी की तरह लग रहा है जिसमें ग़लती से नौटंकी को ही क़ामयाबी समझ लिया गया था.

यह कोई उपलब्धि नहीं है कि कितने लोगों ने थाली और घंटा बजाया. यह भी नहीं कि कितने लोग फरमाबरदारी के साथ 21 दिन घर में घुसे रहेंगे. वास्तविक उपलब्धि यह है कि कितने लोगों का कोरोना टेस्ट हुआ? कितने डॉक्टर-नर्सों को सुरक्षात्मक उपकरण मिले? कितने वेन्टीलेटर बनाये या आयात किये गए? वास्तविक उपलब्धि है सन्देहास्पद मरीज़ों को अलग रखने की सुविधा, जगह जगह अस्थायी अस्पताल और क्वारेन्टाइन सुविधा.


इन बुनियादी सवालों को हल करने में मोदी जी को न तो कोई रुचि है, न वांछित धैर्य. वे शायद अगले शानदार "राष्ट्र के नाम सन्देश" की तैयारी में लगे होंगे कि कैसे उनकी वक्तृता की धूम मच जाए. मुश्किल मुद्दों को वे राज्य सरकारों के ज़िम्मे डाल देंगे और इस पर ध्यान देंगे कि ऐसे मुश्किल हालात में अपनी राजनीतिक धाक को लोगों के दिलो-दिमाग़ में कैसे जमाये रखा जाए.


वायरस से बच भी गए तो-


अगर हम इस महामारी से बच भी गए तो भी अर्थव्यवस्था के बरबादी की शामत से नहीं बच पायेंगे. मोदी जी कभी अर्थव्यवस्था की चिन्ता करते भी नहीं. जब अर्थव्यवस्था इतनी ग़र्त में चली गई थी कि बेरोज़गारी पिछले पैंतालीस साल का रिकॉर्ड तोड़ रही थी, उस समय भी मोदी जी आराम से लोकसभा चुनाव जीत गए. तो अब वे अर्थव्यवस्था की फ़िकर क्यों करें?नोटबन्दी और जीएसटी ने बाजार में माँग की कमर तोड़ दी, और यह फूहड़ लॉक डाउन आपूर्ति को भी मार डालेगा. हमारे पास वही बचेगा जिसकी खोज आर्यभट्ट ने की थी - शून्य. ज़ीरो. सिफ़र.

मोदी ने लॉक डाउन के लिए बहुत कम समय दिया. रात आठ बजे राष्ट्र के नाम सन्देश, चार घन्टे बाद अर्धरात्रि से लॉक डाउन चालू. बिल्कुल नोटबन्दी की तरह. थोड़ा और समय देने में क्या हर्ज़ था? सुबह आठ बजे राष्ट्र के नाम सन्देश देते तो क्या दिक़्क़त थी? क्योंकि जनाब, टीवी के प्राइम टाइम का मज़ा जो लेना था!


गृह मंत्रालय ने कई छूटों की एक लिस्ट भी जारी की है, लेकिन सड़क पर ड्यूटी कर रहे दरोगा साहब को वो लिस्ट समझा कर देखिए. भारतीय पुलिस का सबसे पसन्ददीदा काम है भारतीयों को लाठी से पीटना, और वो इसमें व्यस्त है. इस दौरान राज्यों की सीमाओं पर लाखों ट्रक थम गए जिससे किराना, दवा, दूध, सब्ज़ी जैसी ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति बुरी तरह बाधित हो गई. किसान चकराए हुए हैं कि वो अपनी खेती कैसे सम्भालें, लेकिन इस सरकार को तो जैसे रबी की फ़सल, गेहूँ की कटाई वगैरह से कोई मतलब ही नहीं. महामारी के दौरान देश के दवा-दारू की आपूर्ति को भी बरबाद कर देने की यह सूझ भी अद्भुत है मोदी जी में!


मोदी जी विश्व के ऐसे अनोखे नेता हैं हो देश के नाम दो-दो सन्देशों के दौरान कोई बड़ा आर्थिक पैकेज घोषित नहीं कर सके. पहले भाषण में उन्होंने कहा की वित्त मंत्री एक कमेटी बनायेंगी, लेकिन वित्त मंत्रालय को इस कमेटी की ख़बर इसी भाषण से हुई. कोरोना से निपटने के लिए पन्द्रह हज़ार करोड़ उन्होंने ज़रूर घोषित किया. लेकिन इससे पाँच अधिक यानी बीस हज़ार करोड़ तो उन्होंने दिल्ली में राष्ट्रपति भवन, संसद, सांसदों के निवास और कार्यालय वगैरह के तामझाम मेकअप के लिए सेन्ट्रल विस्टा प्लान के लिए दिया है.

इस रवैये के चलते कोरोना से ज़्यादा भारतीय भुखमरी से मर सकते हैं. मोदी जी की कमज़ोर प्रशासकीय व्यवस्था, ज़रूरी मुद्दों के प्रति उदासीनता और सरकार संभालने की बजाय भाषणबाज़ी में ज़्यादा रूचि - सब इसी संकट के संकेत हैं. हो सकता है कि आगामी कुछ सप्ताहों में ही कोरोना से मृतकों की सही संख्या को झुठलाती हुई ख़बरों से हम हक्के-बक्के रहें और हमारी अर्थव्यवस्था भी 1980 के दौर की अर्थव्यवस्था जैसी हालत में पहुँच जाये.(द प्रिन्ट में  प्रकाशित शिवम विज के अंग्रेज़ी लेख का प्रभुनारायण वर्मा द्वारा किया गया हिन्दी अनुवादकार्टून साभार राजेंद्र धोड़पकर 


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