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अलबर्ट कामू की पुस्तक दि प्लेग

शैलेंद्र प्रताप सिंह 

आज लाक डाउन के बीच बात अस्तित्ववादी दार्शनिक अल्जीरियाई अलबर्ट कामू की पुस्तक ‘ दि प्लेग ( la Peste 1947 ) की बारे में जो आजकल यूरोप में बहुत तेजी से बिक रही है .La Peste उपन्यास की शुरुआत होती है जब Dr Bernard Rieux, अपने घर के दरवाजे एक मरा चूहा पाते है फिर चारो ओर उन्हें चूहे ही चूहे दिखायी देते है . प्लेग फैला है , लोग मर रहे है . सभी को घरों में अलग अलग रहने का आदेश दिया जा रहा है . इस दौरान कुछ लोग सिर्फ अपने लिये सोचते और कुछ सबके लिये , समाज के भले के लिये सोचते देखे जाते है .

प्रख्यात फ्रांसीसी लेखक कामू के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि त्रासद स्थिति के बीच रहकर भी जीवन के आनन्द की तलाश. उसका आशावाद सहसा हमारे उपनिषद के उस प्रसंग से जुड़ जाता है जिसमें चारों तरफ मृत्यु से घिरा एक मनुष्य दूब की नोक पर टपकी मधु के बूँद को चाट लेने का उपक्रम करता है.

कामू की पुत्री Catherine camaus ( 74 ) आज जिंदा है . वह उसी घर में रहती है जो 1957 में कामू ने नोबेल पुरस्कार के पैसो से खरीदा था . वह कहती है कि ‘ प्लेग ‘ पढने से पाठक में आ़शा और विश्वास का निश्चित ही संचार होगा .

कैथरीन के अनुसार जिंदगी क्या है , इसे सोचे और जाने बिना , आज जब आदमी पैसो के पीछे भाग रहा है , उम्मीद है कि उपन्यास पढकर हम यह समझ पायें की सत्यता क्या है , जिंदगी क्या है , महत्वपूर्ण क्या है और हम कुछ मानवीय हो सके .‘दि प्लेग ‘ यह संदेश देती है कि हम प्लेग / बीमारी के लिये ज़िम्मेदार नहीं है पर उस पर दी जाने वाली अपनी प्रतिक्रिया के लिये ज़िम्मेदार हैं . बीमारी अवसर देती है अपने स्वहित से ऊपर उठने का.लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं .

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