जनादेश

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दूध ,घी और रसगुल्ला

भोजन के बाद तृप्त होने का अहसास कब होता है और किससे होता है .कभी गौर किया .चाहे सामिष हो या निरामिष भोजन मन तृप्त होने का अहसास उसके बाद के दुग्ध प्रदार्थ से बने व्यंजन जैसे मीठी दही ,मठ्ठा ,रबड़ी ,दूध ,रसगुल्ला ,कलाकंद जैसी मिठाई से होता है या फिर एक विकल्प फल का होता है जिसमे पहला स्थान आम का है उसके बाद तरबूज खरबूज जैसे कई फल होते है .हालांकि कुछ लोग बिना दूध की मिठाई से भी काम चला लेते हैं पर भारत ,बंगला देश पकिस्तान अफगानिस्तान जैसे देश में दूध से बने उत्पादों को प्राथमिकता मिलती रही .चीन कुछ हद तक अपवाद रहा जहां दूध या उसके उत्पादों को प्राथमिकता पर नहीं रहा .पर मंगोलिया में भी दूध का प्रचलन पहले से है .आज भी दूध को देश की सबसे ज्यादा जरुरी माना जाता है .बच्चे ही नहीं बुजुर्ग भी ऐसे मिलेंगे जो सिर्फ दूध पर आश्रित है .गांव में भी पुराने कारोबार में दूध प्रमुख रहा है .पहले तो हर परिवार एकाध गाय जरुर रखता था पर बदलाव आया और लोगों ने छोड़ दिया .उत्तर भारत में अहीर समेत कुछ पिछड़ी जातियों ने दूध का काम जारी रखा .अपने परिवार के साथ जीविका के रूप में भी .दूध के साथ घी का कारोबार भी बहुत पुराना है .पर एक समय था कि मंडी देसी घी की होती थी .चंदौसी ,खुर्जा ,अलीगढ़ ,हाथरस ,भिंड ,मुरैना ,ज्ञ्वालियर से लेकर इटावा तक . राजस्थान ,पंजाब हरियाणा आदि में भी कई मंडिया घी की थी .घी का कारोबार धीरे धीरे कम होता गया .पहले डालडा फिर रिफाइन ने इसे और कमजोर किया .पर आज भी गांव में किसान जो गाय भैंस पालता है दो चार किलो घी महीने में खपा लेता है पर शहरों में यह खपत बहुत कम हो चुकी है .थोडा घी इस्तेमाल करना चाहिए .

हमें लगता है आज भी गांव में गो पालन को बढ़ावा देना चाहिए . शहरी इलाकों में यह संभव भी नहीं पर ग्रामीण क्षेत्र में अभी भी दूध पर  एक बड़ी आबादी आश्रित है . कोरोना के इस दौर में लाक डाउन चल रहा है पर दूध का इंतजाम सरकार भी कर ही रही हैं .अगर आप भी किसी की मदद करना चाहे तो दूध से भी कर सकते हैं . अंबरीश कुमार की पोस्ट से 

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