जनादेश

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भोजन दिव्य हो भव्य नहीं

अंबरीश कुमार 

सत्तर के दशक के अंतिम दौर की बात है .हम लोग कन्याकुमारी के विवेकानंद पुरम रात करीब दस बजे पहुंचे .तिरुनेलवेली जंक्शन पर उतरे और जो बस मिली वह रास्ते में खराब हो गई .कन्याकुमारी में रुकने की व्यवस्था विवेकानंद पुरम में थी .तब ज्यादातर लोग रुकते भी वहीं थे .काफी बड़ा परिसर समुद्र तट पर .अलग अलग तरह के कमरे .बड़ा भोजन कक्ष जिसमें एक बार में एक बारात तक खाना खा ले .सुबह करीब पांच बजे काफी देने के साथ ही सूर्योदय दिखाने के लिए बस तैयार खड़ी रहती .इसे एक बड़ी धर्मशाला ही मानना चाहिए .खैर हम लोग जब पहुंचे तो भोजन का समय ही खत्म हो चुका था .भोजन कक्ष के प्रबंधन ने देखा छह लोगों का परिवार था .उसने कहा ,थोड़ी देर रुक जाइये राजस्थान से मारवाड़ी लोगों का एक समूह आ रहा है उनका खाना बन रहा है तभी खिला देंगे .कुछ देर बाद जो भोजन केले के पत्ते पर परोसा गया वह दिव्य था .चावल ,सांभर ,दो तरह की सूखी सब्जी ,अचार ,पापड़ और मठ्ठा .मन तृप्त हो गया .सादा  भोजन से ही .दक्रसल राजस्थान की वजह से स्वाद अपने उत्तर भारत का मिला और वह भी थाली जैसा .अब थाली परम्परा खत्म हो रह है .पर आज भी मन तो इसी से भरता है .मैसूर में बस अड्डे के पीछे जो मारवाड़ी भोजनालय है उसमे एक बार ऐसा ही भोजन किया .वे रोटी सेक कर देते थे पहले की रखी नहीं .मंदिरों में भी भोजन /प्रसाद की परम्परा कुछ ऐसी ही रही .चाहे बांके बिहारी मंदिर हो या फिर इस्कान का मंदिर या राजस्थान के वैष्णव मंदिर .वे बहुत ही सादा पर दिव्य भोजन देते है .थालियों में राजस्थान ही नहीं गुजरात बंगाल ,हिमाचल ,तमिलनाडु से लेकर केरल तक की थाली की रंगत और स्वाद अलग मिलेगा .कुछ जगहों की थाली और स्वाद के बारे में आप भी बताएं .फोटो साभार 

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