जनादेश

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पश्चिम की दाल

अंबरीश कुमार 

सत्तर के दशक में कुछ समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहने को मिला .मुरादाबाद ,धामपुर ,बिजनौर जैसी जगहों पर .पश्चिमी उत्तर प्रदेश का खानपान अपने पूरब से कुछ अलग है .अपनी तरफ अरहर की दाल ,चावल और सब्जी पर ज्यादा जोर रहता है .पर पश्चिम में रोटी और दाल पर .दाल भी अरहर नहीं उड़द की .इधर से अगर आगे बढ़ें तो पंजाब और जम्मू तक यह उड़द की दाल का प्रचलन ज्यादा नजर आएगा .बनाने का तरीका जरुर अलग अलग हो .इस संवाद में यह ध्यान रखें कि हम कोई रेसिपी नहीं बताते और यह मानकर चलते हैं कि जो लोग भोजन बनाना जानते हैं वे मात्र का ध्यान भी रखते हैं मसलन चार आदमी की दाल में कितना नमक और कितनी हल्दी पड़ेगी यह लिखना जरुरी नहीं है .सिर्फ तरीका बताने से भी आसानी से बनाया जा सकता है .मुझे याद है धामपुर में हम लोग एक बड़े किसान परिवार की शहर में बनी कोठी में किरायेदार थे .मामाजी तब वहां एसडीओ फोन्स थे और धामपुर से कालागढ़ जाने वाली सड़क पर एक कालेज में अपना पढना हुआ था .छोटा शहर था .लोग जल्दी सोते और जल्दी उठते थे .त्यागी परिवार था जिनकी तीन लड़कियां और एक पुत्र था ,अभी भी होंगे ही .खैर मुझ्रे याद है घर की रसोई त्यागी जी की पत्नी खुद संभालती थी कोई नौकर नहीं था .वे सुबह चार बजे उठती और करीब साढ़े चार बजे चूल्हे पर धीमी आंच पर दाल चढ़ा देती  .उड़द की दाल अपनी तरफ कम बनती है .दक्षिण में कुछ खास मौकों पर .लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसका ज्यादा प्रचलन है . .यह दाल दिन में करीब डेढ़ बजे उतारी जाती इसे घोटा भी जाता ताकि यह खड़ी न रह जाए .और फिर इसमें देसी घी का हल्का तड़का लगता .पर घी की मात्रा काफी ज्यादा होती .दाल के ही लगभग बराबर .दाल तो थालीन में परोसी जाती जो जरा सा भी नहीं बहती पर उसपर पड़ा घी जरुर थोडा बहता .अदरक का लच्छा पड़ा रहता और तडके वाली कुछ हद तक जली लाल मिर्च भी .यह रोटी के साथ परोसी जाती .रोटी का आटा भी सिर्फ गेंहू का नहीं होता कुछ मोटा अनाज भी होता ही .बहुत हुआ एक सूखी सब्जी जैसे करेला ,तुरई आदि .त्यागी परिवार मूल रूप से गांव से जुड़ा था और आतिथ्य भाव भी बहुत ज्यादा था .अक्सर यह दाल खाने को मिली .पर इस दाल का स्वाद कभी भुला नहीं जा सका .हालांकि मैंने कभी भी तड़का आदि में टमाटर का प्रयोग नहीं देखा जो पंजाब की तरफ बढ़ने पर सभी जगह दिखता है . अपने पूरब में भी बघार में टमाटर का इस्तेमाल बहुत बाद में शुरू हुआ .

मुझे याद है एक बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक छात्रावास में मेहमान था .दोपहर में जब खाना खाने बैठा तो देखा सभी छात्र अपना देसी घी का डब्बा भी साथ लेकर आए थे .रसोइया हर किसी की दाल में उन्ही का घी लेकर लहसुन /लाल मिर्च का तड़का लगाकर लाता .छौंक ,तड़का या फिर बघार है एक ही विधि पर बोलते अलग अलग हैं .गुजरात में वघार तो बंगाल में बगार या फोडन .मराठी में फोडणी तो उर्दू में तड़का या बघार ,कोंकणी में फोण्ण,नेपाली में झानेको तो तमिल में थालीत्तल.कुल मिलकर यह स्वाद बढ़ा दे और सोंधी गंध से भर दे .इसके लिए राई ,जीरा ,लहसुन ,मिर्च ,मेथी से लेकर प्याज टमाटर तक इस्तेमाल करते है .पर तड़का अगर किसी एक का ही हो तो उसका स्वाद बेहतर होता है .दाल अरहर में लहसुन या जीरे का तड़का ज्यादा चलता है पूरब में .पंजाब ने टमाटर को हर व्यंजन से जोड़ दिया .पंजाबी ढाबे में दाल तड़का में टमाटर ,प्याज न हो यह हो ही नहीं सकता .लेकिन यूपी बिहार में टमाटर का कोई प्रचलन नहीं है .बहुत सात्विक तरीके से बनाई दाल में सिर्फ जीरा ही इस्तेमाल होता है .तडके के लिए दाल भी जब ठीक से गर्म हो तभी तड़का अपना ज्यादा असर छोड़ता है .चने की दाल में सादा तड़का नहीं चलता इसमें कुछ और मसाले प्याज आदि भी इस्तेमाल करते हैं लोग .दाल पख्तूनी यानी धुली उड़द की दाल में लहसून ,जीरा ही ठीक रहता है पर देसी घी की मात्रा जरुर बढ़ा दी जाती है क्योंकि यह बहुत कम पानी में बनाई जाती है और बनने के बाद सूखी रहती है .घी डालने के बाद यह दाल निखर जाती है .

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