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फिर सौ साल बाद ?

अनिल सज्वाण

लगभग सौ साल पहले पूरी दुनिया एक महामारी की चपेट में थी. स्पेनिश फ्लू ने वर्ष 1918 से लेकर 1920 के दो सालों में ही दुनिया भर में करोड़ों लोगों की जान ले ली थी.उस समय प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हो रहा था. युद्ध की थकान और जख्म लिए सैनिक अपने देशों और घरों की तरफ लौट रहे थे. उसी के साथ-साथ यह बीमारी भी दुनिया के अनजान कोनों तक पहुंच रही थी. इस बीमारी में भी एंफ्लुएंजा जैसे लक्षण होते थे.सर्दी-जुकाम-बुखार. और इंसान की मौत हो जाती थी. जहां तक मेरी जानकारी है, यह कौन सा वायरस था, इसके बारे में लोगों को अभी भी पता नहीं. लेकिन, यह छूत की बीमारी थी जो बेहद तेजी से फैलती थी.

तब तक वायरस और उसके जरिए फैलने वाले बीमारियों के बारे में बहुत ज्यादा खोज नहीं हो पाई थी. इसके चलते माना जाता है कि ज्यादातर लोगों को इस बीमारी का संक्रमण अपने ऊपर झेलना पड़ा. बहुत सारे लोगों ने अपनी प्रतिरोधक क्षमता से स्पेनिश फीवर को हरा दिया. लेकिन, बहुत सारे लोग इससे हार गए. यह भी माना जाता है कि इस बीमारी से दुनिया भर में पांच करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे.अभी-अभी मित्र और पत्रकार अरविंद शेखर की खबर पढ़ी. उन्होंने बहुत ही प्रामाणिक तरीके से देहरादून, टिहरी और गढ़वाल के हिस्से पर इस बीमारी के बारे में लिखा है. प्रथम विश्व युद्ध के तत्काल बाद आने वाली इस बीमारी को कई जगहों पर वॉर फीवर या युद्ध ज्वर भी कहा जाता था. अरविंद बताते हैं कि इस बीमारी से पहाड़ों में उस समय अड़तालीस हजार लोगों की मौत हुई थी. बाजारों, सड़कों और जंगलों में भी लोगों की लाशें पड़ी हुई हैं.

मैंने अपनी अब तक की जिंदगी में भारतीय भाषाओं का बहुत सारा साहित्य पढ़ा है. हालांकि, जितना पढ़ा है वह कुल साहित्य का बहुत ही छोटा हिस्सा है. लेकिन, फिर भी इस बीमारी का सजीव चित्रण मेरी याद में मैने कहीं नहीं पढ़ा है. कॉलरा और प्लेग जैसी बीमारी के बढ़े सजीव चित्रण मैंने साहित्य में पढ़े हैं. प्लेग के डरावने विवरण तो शरतचंद के श्रीकांत में भी देखने को मिल जाते हैं.क्या आप लोगों की याद में कोई ऐसी कहानी या उपन्यास है, जिसमें वर्ष 1918 से 1920 के दौरान फैली इस स्पेनिश फ्लू नाम की बीमारी का जिक्र हो. उसकी भयावहता का जिक्र हो. कैसे लोगों ने इसका सामना किया, किन लोगों ने अपना क्या-क्या खोया, इसका जिक्र हो.मित्र अरविंद शेखर ने इस बीमारी का गढ़वाली गीतों में आए प्रसंग का भी उल्लेख किया है. क्या ऐसा ही अन्य लोकगीतों में भी देखने को मिलता है.साभार

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