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मोदी जीत रहें हैं , चुनाव आयोग हार रहा है

संजय कुमार सिंह 

नई दिल्ली .देश का यह पहला चुनाव है जिसमे चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल की मनमानी से हार रहा है .मोदी के नेतृत्त्व में सत्तारूढ़ दल चुनाव आचार सहिंता की धज्जियां उड़ा रहा है .मोदी रोज आचार संहिता तोड़ रहें है और चुनाव आयोग इसपर शोध कर रहा है .छोटे नेताओं को नोटिस थमाने वाले चुनाव आयोग ने अभि९ तक मोदी को कोई नोटिस नहीं दी बल्कि अपने अफसर को ही दंडित कर दिया .

इस साल दस मार्च को चुनाव की घोषणा के साथ ही लोकतंत्र के त्यौहार आम चुनाव की शुरुआत हो गई और आचार संहिता लागू हो गया था. वैसे तो चुनाव लोकसभा के सदस्यों के लिए होता है पर प्रधानमंत्री और उनकी भारतीय जनता पार्टी ने इसे प्रधानमंत्री का चुनाव बना दिया है. पिछली बार इसमें उनका 56 ईंची सीना था इस बार सेना को आदेश और छूट देने की उनकी ‘शक्ति’ का उपयोग किया जा रहा है. इसी क्रम में अंतरिक्ष में उपग्रह मार गिराने की पुरानी क्षमता, ‘मिशन शक्ति’ की घोषणा ऐसे की गई जैसे प्रधानमंत्री की निजी उपलब्धि हो. इसपर शोर मचना स्वाभाविक था. पर प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को इसमें कुछ गलत नहीं लगा और चुनाव आयोग ने घोषणा सरकारी दूरदर्शन ने मूल रूप से तैयार नहीं की थी जैसे तकनीकी कारण से इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन नहीं माना. 

इसके बाद क्या था – प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी लगभग रोज चार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं. जब सत्तारूढ़ दल को ही चिन्ता नहीं है तो दूसरों की कौन कहे – वो भी पीछे नहीं हैं और विपक्षी उम्मीदवारों या उनके प्रचारकों को भी सजा मिली. लेकिन सत्तारूढ़ दल इस मामले में बहुत आगे है. और ऐसा लग रहा है कि विपक्ष के खिलाफ तो कार्रवाई भी हुई चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल के मामले में बहुत ही ढीला है. और तो और प्रधानमंत्री के हेलीकॉप्टर की जांच के मामले में आईएएस अफसर, मोहम्मद मोहसिन को जल्दबाजी में निलंबित करने की कार्रवाई करके आयोग ने अपना पूर्वग्रह भी स्पष्ट कर दिया. दिलचस्प बात यह रही कि केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने इस पर रोक लगा दी. इस तरह, एक तरफ तो चुनाव आयोग कार्रवाई करता नजर नहीं आ रहा है. दूसरी ओर, जहां कार्रवाई की उसे रोक दिया गया. 

ऐसे में चुनाव आयोग भी क्या करे. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ द्वारा आयोजित एक समारोह में कहा था कि ‘अगर कोई महत्वपूर्ण एलान करना है, मेरी राय में… मैंने देखा है कि पीएमओ पूछता है कि क्या ऐसा किया जा सकता है, क्या कोई समस्या हो सकती है? क्योंकि कोई पीएम शर्मिंदगी नहीं उठाना चाहता … . कहने की जरूरत नहीं है कि अभी स्थिति बिल्कुल अलग है और प्रधानमंत्री ऐसी कोई चिन्ता करते नजर नहीं आते हैं. यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि आपरेशन शक्ति की घोषणा का विकल्प था और यह एलान अगर करना ही ता तो डीआरडीओ द्वारा किया जाता था.’ पर यह घोषणा प्रधानमंत्री ने खुद की. बिल्कुल रहस्य और रोमांच से भरे अंदाज में की और डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर संदीप सक्सेना कह चुके हैं कि पीएम मोदी ने इस भाषण के लिए चुनाव आयोग से कोई अनुमति नहीं ली थी. 

इसके बाद जो सब हुआ उसमें तो प्रधानमंत्री जानते हैं कि वे जो कर रहे हैं वह चुनाव आयोग के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है. लोग-बाग इसका विरोध कर रहे हैं. पर प्रधानमंत्री इन सब से बेपरवाह चुनाव आयोग की सलाह का खुलेआम उल्लंघन करते रहे हैं. उदाहरण के लिए नौ अप्रैल को लातूर में प्रधानमंत्री ने बयान दिया कि क्या पहली बार वोट देने वाले मतदाता अपना वोट पुलवामा के शहीदों के नाम समर्पित नहीं कर सकते हैं. इस बयान के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत की गई है, कोई फैसला नहीं हुआ है. दूसरी ओर, इतनी देरी क्यों हो रही है. आयोग क्या कर रहा है – यह सब कैसे पता चलेगा. आप जानते हैं कि यह काम मीडिया का है और मीडिया ने पूरी तरह समर्पण कर रखा है. मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा ना अपनी पहल पर कोई काम करता है और ना ऐसा कुछ करता है जिससे सरकार या भाजपा नाराज हो जाए. इसलिए चुनाव आयोग से पूछा ही नहीं गया है कि प्रधानमंत्री के भाषण आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले होते हैं उसपर उसने क्या किया है.

अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ ने इस बारे में खबर छापी थी और काररवाई नहीं करने का कारण दिलचस्प है. खासकर तब जब प्रधानमंत्री के मामले में चुनाव आय़ोग अपने ही अधिकारी को निलंबित करके बदनामी मोल ले चुका है. माकपा के पोलित ब्यूरो के सदस्य निलोत्पल बसु ने चुनाव आयोग के अधिकारियों से मुलाकात करके टेलीग्राफ से कहा था इससे उनकी निष्पक्षता पर उंगली उठती है. वे कुछ प्रतीकात्मक कार्रवाई करते हैं पर अभी तक प्रधानमंत्री के खिलाफ कुछ नहीं किया है. वे शर्मिन्दा थे पर कुछ कहा नहीं कि कार्रवाई कब करेंगे. इस संबंध में अखबार ने लिखा है, मंगलवार को उप चुनाव आयुक्त चंद्र भूषण कुमार ने रिपोर्टर्स से कहा, एक अप्रैल को हमें लातूर से एक पन्ने की रिपोर्ट मिली. इसपर हमने भाषण में क्या कहा गया उसकी अधिकृत कॉपी मांगी और यह आयोग के पास 14 अप्रैल को आई. अब इस मामले में विचार चल रहा है ... आयोग ने तय किया है कि सभी मामलों में पूरा भाषण देना होगा इसलिए पूरे भाषण की प्रति मांगी जा रही है.      

द टेलीग्राफ ने कल ही चुनाव आयोग से संबंधित है एक खबर छापी थी, “द वंडर दैट इज ईसी एंड इट्स पेशेंस” (चुनाव आयोग और उसका धैर्य जो अजीब है) . इसमें बताया गया है कि ईश्वर अगर रहस्यमयी ढंग से अपनी इच्छा के अनुसार काम करते हैं तो भारत का चुनाव आयोग और भी रहस्यमयी तरीकों से काम करता है. अखबार ने तारीखवार प्रधानमंत्री के भाषणों का उल्लेख किया है और कहा है कि यह चुनाव आयोग की सलाह के खिलाफ है. अखबार ने प्रधानमंत्री के भाषण के मामले में कार्रवाई नहीं होने पर आयोग की तरफ से बताए गए कारण भी छापे हैं और उनमें एक यह भी है कि महाराष्ट्र में आयोग की टीम अंग्रेजी और मराठी जानती है पर हिन्दी (से) अनुवाद कराने में समय लगता है. इससे आप चुनाव आयोग की लाचारी समझ सकते हैं और मीडिया की भी. पहले (अब भी) ऐसे भाषण भिन्न भाषाओं में अनुवाद होकर छपते ही हैं पर अब अनुवाद को अधिकृत नहीं माना जा सकता है और उसके अलग जोखिम हैं. 

चुनाव आयोग की लाचारी और पूरी स्थिति का वर्णन करने के लिए राजस्थान के राज्यपाल का मामला आदर्श है. असल में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में कल्याण सिंह ने कहा कि देश में नरेन्द्र मोदी फिर से पीएम बनं् यही हम सब लोगों की कामना है. जनता भी यही चाहती है. चुनाव आयोग ने उन्हें चुनाव आचार संहिता के उल्लघंन का दोषी माना है क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो संवैधानिक पद पर हो, किसी भी राजनैतिक दल या राजनीतिज्ञ के लिए प्रचार नहीं कर सकता है और ना ही अपना समर्थन दे सकता है. इसलिए, चुनाव आयोग ने इस मामले में कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति को पत्र लिखा और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इसे गृह मंत्रालय भेज दिया और जरूरी कार्रवाई करने के लिए कहा है. हो सकता है यही प्रक्रिया हो और अगर ऐसा है तो कहने की जरूरत नहीं है कि इस मामले में कुछ होने की गुंजाइश नहीं है.

ऐसी स्थिति में भाजपा और तमाम लोग भाजपा के ही हैं, अगर चाहती तो 87 साल के कल्याण सिंह जो सितंबर 2014 से राज्यपाल हैं, 2015 से उनके पास हिमाचल प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार भी है इस्तीफा दे देते तो बहुत त्याग नहीं करते. दूसरी ओर, नैतिक होने का दिखावा कर सकते हैं और चुनाव आयोग अगर संकट में है तो उसे भी मुक्त कर सकते थे. पर भाजपा में इस्तीफे नहीं होते. इसलिए होगा नहीं जबकि राज्यपाल इस्तीफा दे दें तो नई नियुक्ति होगी नहीं और कार्यभार उन्हें ही संभालना है. पर वे नहीं देंगे क्योंकि यह पार्टी है, यही रणनीति है और इन सबकी नजर में संविधान का सम्मान भी कुछ खास नहीं है. 

अगर किसी संवैधानिक संस्था का आदेश प्रधानमंत्री, सत्तारूढ़ दल का अध्यक्ष और किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री न माने तो संस्था भी क्या कर सकती है. योगी आदित्यनाथ पर पाबंदी लगाई गई तो वे मंदिर-मंदिर घूमने लगे. चुनाव प्रचार में सेना का नाम नहीं लेना है पर गुरुवार की रात एक टेलीविजन कार्यक्रम में भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन (जिन्हें टिकट नहीं मिला है) ने घुस कर मारा और हवाई हमले आदि की चर्चा की. यह कहने पर कि बालाकोट में कोई नहीं मरा और मरे तो कितने क्योंकि अलग-अलग संख्या बताई जा रही है वो आतंकवादी मारने पर कांग्रेस के रोने जैसी बात करने लगे और यह बताया गया कि सुषमा स्वराज ने कहा है (जो अखबारों में कम छपा) कि कोई नहीं मरा तो उन्होंने मानने से इनकार कर दिया. ऐसे नेताओं की पार्टी के मामले में चुनाव आयोग भी क्या करे? होना तो यही चाहिए था कि जनता को सब पता होता और वह सब सोच समझकर निर्णय देती. पर इस पार्टी ने मीडिया के बड़े हिस्से को भी गुलाम बना लिया है. 

चुनाव के दौरान आयकर छापे भी आचार संहिता का उल्लंघन है. आइए देखें कैसे. चुनाव के दौरान छापों से यह संदेश जाता ही है कि जो राजनीतिक दल सत्ता में है वह पहले की सरकारों के मुकाबले 'अच्छी' या 'निष्पक्ष' कार्रवाई कर रही है. इसमें सत्तारूढ़ दल पर छापे नहीं पड़ने या उसकी खबर अपेक्षाकृत कम छपने की संभावना शामिल है. चूंकि पहले चुनाव के दौरान छापे कम (या नहीं के बराबर) पड़ते थे इसलिए अब छापे पड़ रहे हैं उसका भी मतलब है. ऐसे में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके करीबियों तथा इससे पहले कर्नाटक, तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश में आयकर छापों और उस पर मचे शोर के मद्देनजर चुनाव आयोग ने राजस्व सचिव को पत्र लिखकर कहा था कि चुनाव के दौरान सभी एजेंसियों की कार्रवाई निष्पक्ष होनी चाहिए. 

सलाह दी गई थी कि चुनाव के दौरान प्रवर्तन एजेंसियों की कोई भी कार्रवाई निष्पक्ष और भेदभाव रहित हो. आयोग ने यह भी कहा था कि ऐसी किसी भी कार्रवाई के बारे में चुनाव आयोग के अधिकारियों को सूचित किया जाए. इसपर राजस्व विभाग ने चुनाव आयोग को लिखा कि आयकर छापों के संबंध में पूर्व सूचना (चुनाव आयोग को) नहीं दी जा सकती है. पत्र में यह भी कहा गया था कि उसका मकसद आगामी चुनाव में गलत उपयोग किए जा सकने वाले अवैध धन का पता लगाना है. इसके बाद राजस्व सचिव अजय भूषण पांडे और सीबीडीटी के चेयरमैन प्रमोद चंद मोदी की चुनाव आयुक्त के साथ मंगलवार को बैठक हुई. इस बीच ये आरोप चलते रहे कि आयकर के छापे राजनीति से प्रेरित हैं और भाजपा सरकार के इशारे पर मारे जा रहे हैं. 

इसके साथ यह आरोप भी चल रहा था कि चुनाव आयोग कमजोर है और कई मामलों में आवश्यक कार्रवाई नहीं की. इसपर राजस्व सचिव के नाम लिखे पत्र में चुनाव आयोग ने राजस्व विभाग के रुख पर कड़ी नाराजगी जाहिर की. अंग्रेजी में लिखे इस पत्र में कहा गया है, “एक संवैधानिक संस्था को संबोधित करने के लिए जिस भाषा और लहजे का प्रयोग किया गया है वह पूरी तरह से स्थापित प्रोटोकॉल के खिलाफ है. आयोग बेहद नाखुशी के साथ इसे संज्ञान में ले रहा है. आयोग राजस्व विभाग की अनुचित प्रतिक्रिया की निंदा करता है और उम्मीद करता है कि सात अप्रैल को आयोग की ओर से जारी किए गए निर्देश को सही ढंग से सही भावना के साथ लागू किया जाएगा.”  

पत्र पर्याप्त सख्त है और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है. इसे पढ़कर लगता है कि आयोग कुछ और कर सकता तो जरूर करता. इसके बावजूद तमिलनाडु में डीएमके नेता कनिमोझी के घर पर आयकर छापा पड़ा. लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान से पहले दक्षिण भारत में आयकर विभाग की यह बड़ी कार्रवाई इलाके में चुनाव प्रचार की अवधि खत्म होने के बाद शुरू हुई और ज्यादातर अखबारों में यह नहीं बताया गया है कि बरामद क्या हुआ या कितनी राशि बरामद हुई. यह छापा कहीं गलत सूचना पर तो नहीं था इसकी जांच करने पर पता चला कि आशंका सही है. इंडियन एक्सप्रेस की खबर इसी तरह लिखी गई थी पर ज्यादातर अखबारों में छापा पड़ा - यही सूचना थी.

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