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श्रेय लेना भी तो बड़ी खबर है !

संजय कुमार सिंह 

अजहर मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने का मामला आज दूसरे दिन भी कई अखबारों में पहले पन्ने पर है. नवभारत टाइम्स ने लिखा है कि पाकिस्तान को 24 घंटे में उसपर बैन लगाना पड़ा पर यह नहीं बताया है कि बैन क्या है? अमर उजाला ने पहले पन्ने पर छोटी सी खबर छापी है, पुलवामा हमले के बाद ही मसूद पर कसा शिकंजा. नवोदय टाइम्स ने लिखा है, जेतली ने कहा कि राजनीतिक कीमत चुकाने का डर है विपक्ष को. उपशीर्षक है, अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने की सराहना होनी चाहिए. 

जेटली की बात गलत नहीं है पर सराहना करने और श्रेय लेने में फर्क है. विरोध श्रेय लेने का हो रहा है, सराहना तो अपनी जगह पर है और सराहना का मतलब वोट देना नहीं है ना ही वोट देने की अपील करना. मांगना तो बिल्कुल नहीं पर सारा खेल इसी का है. अखबार सराहना की खबर को से ज्यादा प्रमुखता श्रेय लेने को दे रहे हैं और वैसे भी श्रेय लेना बड़ी खबर है. आप समझ सकते हैं कि यह विदेश मंत्रालय का मामला है पर नवोदय टाइम्स में इस विषय पर प्रेस कांफ्रेंस करते विदेश मंत्री अरुण जेटली और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की फोटो छपी है.   

मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिए जाने को सरकारी उपलब्धि के रूप में पेश करने की सरकार की इच्छा के तहत यह खबर गुरुवार को ज्यादातर अखबारों में लीड बनी पर किसी ने इससे इस स्तर का फायदा नहीं बताया. क्या पाकिस्तान उसे गिरफ्तार करके वहां की जेल में रखने को मजबूर होगा – अभी यह भी साफ नहीं है. और इसे जानने समझने में की कोशिश में पता चला कि अमेरिका ने दाउद इब्राहिम को 2003 में ही अल कायदा से उसके संबंधों के कारण वैश्विक आतंकवादी घोषित किया था. उसपर 25 मिलियन डॉलर का ईनाम भी है. भारत में मोस्ट वांटेड है. 

पांच साल दिल्ली में नरेन्द्र मोदी की सरकार रहने के बावजूद उसे पाकिस्तान से लाया नहीं जा सका है. अजहर मसूद की ही तरह दाउद भी पाकिस्तान में है और अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई के तहत 2017 में दाउद की संपत्ति जब्त की गई थी. तब उसे भी यहां सरकार के मास्टर स्ट्रोक की तरह पेश किया गया था. ऐसे में मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किया जाना सरकार की उपलब्धि हो भी तो उससे देश को, आम जनता को क्या लाभ होगा या उसे क्या नुकसान होगा – ऐसा कुछ बहुत विस्तार से खबर छापने वाले दैनिक भास्कर ने भी नहीं बताया है.   

दैनिक भास्कर ने पूर्व विदेश सचिव शशांक और चीनी मामलों के विशेषज्ञ जयदेव रानाडे के हवाले से इस मामले में बिन्दुवार कई जानकारियां दी हैं. एक में लिखा है, पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करने की तैयारी थी, इसलिए चीन ने मसूद की कुर्बानी देने के लिए पाकिस्तान को राजी किया. यह जानकारी जितना बताती है उससे ज्यादा उलझाती है. अगर ऐसा ही था तो बेहतर क्या होता? निश्चित रूप से पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित कराना. फिर भारत ने पाकिस्तान को छोड़कर अजहर पर दांव क्यों खेला? वह भी तब जब अखबारों के अनुसार वह बीमार है, उसके गुर्दे खराब हो चुके हैं और उसकी हालत बहुत खराब है.

यहां सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान को खुद यह समझ नहीं थी कि उसे आतंकी देश घोषित कर दिया जाएगा तो क्या होगा? उसे चीन को समझाना क्यों पड़ा? सरकार यह सब चाहे न बताए पर अखबारों को क्या यह सब नहीं बताना चाहिए? इसी खबर में है, केंद्र सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि चीन के लिए अजहर का बचाव करना लगातार मुश्किल हो रहा था. अगर ऐसा है तो यह कैसी उपलब्धि? दैनिक भास्कर की खबर यह सब बताती है तो यह भी लिखा है कि भारत ने इसे कूटनीतिक जीत बताई है. सरकार अगर ऐसा दावा कर रही है तो क्या यह पूछा नहीं जाना चाहिए कि जब चीन मजबूर था तो भारत की उपलब्धि कैसे है? अगर सरकार इसका जवाब नहीं देती तो क्या अखबारों का काम नहीं है कि वे यह तथ्य अपने पाठकों को बताएं? 

एक तरफ तो अखबारों ने इस सामान्य सी खबर को बहुत महत्व दिया है दूसरी ओर कई शंकाओं के समाधान नहीं हैं. नवभारत टाइम्स ने इस खबर को लीड बनाया था और शीर्षक है, चीन की दीवार टूटी, मसूद घिरा. पर भास्कर की खबर से तो लगता है कि दीवार टूटनी ही थी. हालांकि भास्कर में भी शीर्षक ऐसा ही है, चीन की दीवार ढही. पर फ्लैग शीर्षक है, दबाव में वीटो वापस लिया. नवभारत टाइम्स ने लिखा है, चुनाव के बीच आए इस फैसले का श्रेय लेते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि जब से बीजेपी सरकार आई है पाकिस्तान को कूटनीतिक पटखनी देने का काम हुआ है. संयुक्त राष्ट्र में भारत में स्थायी प्रतिनिधि (2016 से) सैयद अकबरुद्दीन ने कहा है, इस फैसले में छोटे-बड़े सभी साथ आए. हम उन सभी देशों के आभारी है जिन्होंने हमें समर्थन दिया है. हम कई वर्षों से इसके इंतजार में थे.


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