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लॉकडाउन का चालीसवां पर कैसे हो घर वापसी

अंबरीश कुमार 

लॉकडाउन का चालीसवां होने जा रहा रहा .देश के इतिहास में कभी समूचा देश इतने वक्त तक बंद नहीं रहा .लॉकडाउन तो ठीक था पर अगर थोड़ी सी समझदारी और तैयारी दिखाई गई होती तो हजार मौतों के बाद मजदूरों की इतनी बड़ी सामूहिक यात्रा तो न होती .यह भी पलायन ही है .जान बचाने के लिए यह पलायन हो रहा है .पलायन सिफ गांव से शहर की तरफ ही नहीं होता है .ये शहर से गांव की तरफ भी होता है .सिर्फ पांच दिन का समय तब देते और रेल चला देते तो समस्या इतनी विकट न होती .पर जब बस चला रहे हैं तो फिर रेल क्यों नहीं .इन मजदूरों की संख्या देखिए ,इनके राज्यों की दूरी देखिए और फिर सोचिए .क्या इन्हें रेल से नहीं भेजना चाहिए .पर सोचना ही तो नहीं पड़ा .एक दिन घंट घड़ियाल तो एक दिन आतिशबाजी और फिर अचानक सारा देश बंद .यह देश सिर्फ बड़े लोगों का ही तो नहीं है .जिनके घर परिवार वाले चार्टर्ड प्लेन से दूसरे देशों से लौट आए .चार्टर्ड प्लेन तो बाद में भी चले .कोलकाता की स्पाइस जेट की हाल की फ्लाइट की फोटो तो सोशल मीडिया पर भी दिखीं .और तो और विधायक सांसद तो गाड़ी से कोटा पटना भी एक कर दिए .पर किसी को याद है दिल्ली ,मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों से यूपी बिहार बंगाल तक पैदल चलने वाले मजदूरों में कितनो ने रास्ते में दम तोड़ दिया .कितने घर के पास पहुंचने से पहले ही गुजर गए .कुछ घर पहुंच कर गुजर गए .इसका पता करना चाहिए .

ये आंकडे महत्वपूर्ण है .लोगों की याददाश्त कमजोर होती है .बहुत कुछ भूल जाते हैं .इस अस्सी साल की बुजुर्ग की यह फोटो सहेज कर रख लें .यह तो एक बानगी है .बच्चे ,बूढ़े और जवान सभी तो निकले थे .क्या तर्क और कुतर्क चला था .इनकी वापसी से कोरोना और फ़ैल जाएगा .तब मौत का आंकड़ा सौ भी पार नहीं था .और आज हजार पार हो चुका है .एक समय वह था जब नमस्ते ट्रंप हो रहा था और एमपी की घोड़ामंडी खुली हुई थी .इस खुली हुई मंडी के चलते तब कैसे लॉकडाउन होता .हजारों लोगों को साथ लेकर आए ट्रंप को हम अमदाबाद से आगरा दिल्ली तक नमस्ते करने में जुटे थे .पंद्रह मार्च तक हवाई अड्डों पर बेरोकटोक आवाजाही चल रही थी .कनिका कपूर उदाहरण हैं .खैर देर से ही आए पर कुछ तैयारी के साथ तो आते .अचानक सब बंद .लाखों लोग किस तरह देश भर में अलग अलग फंस गए .जो इंतजाम अब कर रहे हैं तब भी हो सकता था .

अगर मुख्यमंत्रियों की बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिफरे न होते तो आज भी यह नहीं होता .सारे मुख्यमंत्री चाहते हैं कि प्रवासी मजदूर हिफाजत के साथ घर लौट जाएं .पर किसी को इतना भी ध्यान नहीं कि चेन्नई ,हैदराबाद ,मुंबई और दिल्ली से यूपी बिहार बंगाल की दूरी कितनी है .क्या कभी इतनी लंबी यात्रा कोई बस से करता है .अभी भी वक्त है .रेलगाड़ी से इन मजदूरों को वापस भेजना चाहिए .सारी सावधानी बरतनी चाहिए ताकि ये संक्रमण लेकर अपने घर न जाए .रेलगाड़ी आज भी सुविधाजनक सवारी है .इन्हें आरक्षण देकर ही भेजा जाए .यह मुश्किल काम तो है पर असंभव नहीं .बस से जो जायेगा वह दस बीस बार उतरेगा .कुछ खाने पीने का सामान लेगा .शौचालय इस्तेमाल करेगा .यह कोई कम जोखम भरा नहीं है .

 दूसरे मध्य वर्ग के उन लोगों पर भी नजर डालें जो देश के अलग अलग हिस्सों में फंसे हुए है .इनमे जिनकी ज्यादा उम्र है वे लंबी यात्रा बस से कैसे कर सकते हैं .क्यों नहीं जहाज की सेवा शुरू कर इन्हें भी अपने अपने घर भेजा जाए .सड़क का तो यह हाल है कि एक राज्य बस ,कार का पास दे तो दूसरा अपने यहां सीमा पर ही रोक दे .ये दो राज्यों से सहमती कौन ले सकता है .ये क्या आसान काम है .बेहतर है जिस तरह उद्यमियों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम होता है उसी तरह अपने घर लौटने वालों को लौटने की प्रक्रिया आसान बनाई जाए .कुछ लोग निजी वाहन से जा सकते हैं तो उन्हें यह सुविधा देनी चाहिए .लॉकडाउन बढे पर कोई अन्न के बिना भूखे मरे यह तो न हो .न ही एक कमरे में आठ दस मजदूर रहने वालों को उनके दड़बे में इसलिए जबरन रखा जाए कि उनके लौटने का कोई साधन नहीं है .बेहतर हो प्रवासी ,तीर्थयात्री ,सैलानी या और भी जो कहीं फंसे हो उन्हें वापस भेजने का सुरक्षित इंतजाम किया जाए .फोटो फेसबुक से साभार 

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