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कोलकाता में मछली आनलाइन भी मिलने लगी !

प्रभाकर मणि तिवारी

कोलकाता .कोरोना की वजह से जारी देशव्यापी लॉकडाउन ने पश्चिम बंगाल के लोगों की खान-पान की आदतें बदल रही हैं. यहां तो मछली और मिठाई के बिना भोजन अधूरा माना जाता है. इसी वजह से सरकार आम लोगों की भावनाओं को देखते हुए इन दोनों क्षेत्रों में ढील दे रही है. इसी के तहत राज्य की ममता बनर्जी सरकार ने मिठाई की दुकानों को पहले चार घंटे तक खोलने की अनुमति दी थी जिसे बीते सप्ताह बढ़ा कर आठ घंटे कर दिया गया. मिठाई में भी रसगुल्ले और संदेश के बिना बंगाल के आम परिवारों की दिनचर्या की कल्पना तक करना मुश्किल है. दुनिया भर में होने वाली तमाम प्रमुख घटनाओं के मौके पर यहां उसी स्वरूप में मिठाइयां बनती हैं. वह चाहे क्रिकेट विश्वकप हो या फिर फुटबाल विश्वकप. इसी तरह कोरोना के मौके पर इसी तरह के कोरोना संदेश बनाए गए हैं. लॉकडाउन के दौरान मछली की बढ़ती मांग और इस वजह से कीमतों में होने वाली वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए सरकार अब खुद ही ऑनलाइन मछलियां बेच रही है. इसके अलावा 20 अप्रैल के बाद मछुआरों को भी समुद्र में उतरने की अनुमति दे दी जाएगी. अकेले राजधानी कोलकाता में रोजाना औसतन साढ़े पांच सौ टन मछली की खपत होती है.

हिल्सा या इलिश मछली को आम बंगाली परिवार की शान माना जाता है. सीमा पार बांग्लादेश से आने वाली पद्मा नदी की इन मछलियों की खांसकर बांग्ला नववर्ष के मौके पर भारी मांग रहती हैं. लेकिन कोरोना औऱ लॉकडाउन की वजह से अंतरराष्ट्रीय सीमा सील होने के कारण वहां से मछलियां नहीं आ रही हैं. नतीजतन लोगों को स्थानीय हिल्सा मछलियों से ही संतोष करना पड़ रहा है. माछ-भात यानी मछली-भात का जिक्र होते ही मन में बंगाल और बंगालियों की तस्वीर उभरती है. हिल्सा एक तैलीय मछली है. इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड भरपूर मात्रा में होता है. बंगाली लोग इस मछली को पचास से भी ज्यादा तरीकों से पका सकते हैं और हर व्यंजन का स्वाद एक से बढ़ कर एक होता है. कोलकाता के विभिन्न होटलों और रेस्तरां में बांग्ला नववर्ष और दुर्गापूजा के मौके पर आयोजित हिल्सा महोत्सवों में उमड़ने वाली भीड़ से इसकी लोकप्रियता का अंदाजा मिलता है. 

लॉकडाउन के दौरान मछली की कीमतों में अचानक बेतहाशा वृद्धि को ध्यान में रखते हुए राज्य मत्स्य विकास निगम ने इसकी आनलाइन बिक्री के लिए एक एप्प लांच किया है. मत्स्य पालन मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा बताते हैं, “हमें कीमतों में वृद्धि की शिकायतें मिली थीं. इसलिए हमने इसकी ऑनलाइन बिक्री का फैसला किया. परिवहन के साधन नहीं होने की वजह से मछली की कीमतें बढ़ गई थीं. मांग ज्यादा थी और सप्लाई कम. अब मोबाइल एप्प के जरिए मछली खरीदनों वालों के घर बैठे इसकी जिलवीर मिल रही है.” दरअसल, कोलकाता में मछली की मांग का बड़ा हिस्सा आंध्र प्रदेश से आने वाली मछलियों से पूरा होता है. लेकिन लॉकडाउन की वजह से वहां से बी इनका आना ठप है.


बंगाल के लोगों का मिठाई प्रेम भी किसी से छिपा नहीं है. इस राज्य को रसगुल्ले का जन्मस्थान कहा जाता है. कुछ साल पहले इस मुद्दे पर पड़ोसी ओडीशा के साथ उसकी लंबी कानूनी लड़ाई चली थी. लेकिन बाद में बंगाल के रसगुले को जीआई टैग मिल गया था. लॉकडाउन की वजह से पहले सप्ताह के दौरान मिठाई की दुकानें बंद हो जाने की वजह से जहां पहली बार रसगुल्ला और संदेश जैसी लोकप्रिय मिठाइयां बाजारों औऱ आम बंगाली के घरों से गायब हो गईं थी, वहीं इसके चलते रोजाना औसतन दो लाख लीटर दूध नालों में बहाना पड़ रहा था. लॉकडाउन के चलते इन दुकानों के बंद होने से डेयरी उद्योग को रोजाना 50 करोड़ का नुकसान झेलना पड़ रहा था. उसके बाद मिठाई निर्माताओं के संगठन पश्चिम बंग मिष्ठान व्यवसायी समिति ने राज्य सरकार को पत्र लिख कर मिठाई की दुकानों को लॉकडाउन से छूट देने की अपील की थी. बंगाल में मिठाई की लगभग एक लाख दुकानें हैं.

समिति ने ईमेल से सरकार को भेजे एक पत्र में कहा था कि जब आनलाइन खाने का आर्डर लेने औऱ डिलीवरी करने वाली कंपनियों को लॉकडाउन से छूट दी गई है तो मिठाई दुकानों को भी यह सुविधा दी जा सकती है. समिति के सचिव जगन्नाथ घोष कहते हैं, “वर्ष 1965 में तत्कालीन प्रफुल्ल चंद्र सेन सरकार ने बंगाल में घरेलू उद्योग के तौर पर चीज औऱ मिठाई के निर्माण पर पाबंदी लगाई थी. तब इस उद्योग को भारी नुकसान सहना पड़ा था. हम चाहते हैं कि मिठाइयों को भी जरूरी वस्तुओं की सूची में शामिल कर लिया जाए.” कोलकाता की जोड़ासांको मिल्क मर्चेंट्स सोसायटी के सचिव राजेश सिन्हा ने भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र भेज कर इस मामले में हस्तक्षेप की अपील की थी. उसके बाद ही सरकार ने पहले इन दुकानों को चार घंटे खोलने की अनुमति दी थी. सरकार ने बीच में इसका समय बढ़ा कर आठ घंटे कर दिया था. लेकिन लॉकडाउन के उल्लंघन के बढ़ते मामलों को ध्यान में रखते हुए इसे फिर चार घंटे कर दिया गया.

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